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Friday, January 4, 2019

वक़्त


वक़्त
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"वक़्त"  

वक़्त तो गुजरने के लिए होता है,
वक़्त ही ख़ुशी-गम का सबब  होता है.

वक़्त एक सा होता है इस शहर में,
उसी पल मातम कहीं जश्न होता है.

अपने आप पर गुरुर ना कर ऐ दोस्त,
एक वक़्त, राजा भी यहाँ रोता है.

मुक़द्दर देगा तेरे दर पर दस्तक,
वक़्त है कर्म का और तू सोता है.

वक़्त खुद ही रंग दिखाएगा इक दिन,
तू सब्र कर, होने दे जो होता है. 

वक़्त आ गया है जब बीज बोने का,
तू सुनहरे मौके को क्यूँ खोता है.

वक़्त की जो कद्र नहीं करते "राही",
वो अपनी किस्मत पर सदा रोता है.

-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"




Friday, March 30, 2018

"इल्तिजा-ए-मुसाफ़िर"








"इल्तिजा-ए-मुसाफ़िर"

मुझको न हमज़बां, न  हमउमर चाहिए, 
मुझको  इक हमनवा, हमसफ़र चाहिए।

हुस्न-ए-मल्लिका से सजा बाज़ार है,
इक हमदम मुझे,  शामो-सहर चाहिए।

मेरी हिमाक़तों को तुम कुफ्र कह दो,
ख़ुदा तुम सा ही मुझको, मगर चाहिए।

इस भीड़ में निहायत अकेला हूँ मैं,
तेरे दामन में, मुझे बसर चाहिए।

जहाँ तेरे सिवा न रहता हो कोई, 
मुझको ऐसा ही एक शहर चाहिए।

तेरे दर पर अब, मैं सजदा करने लगा, 
अब मुझे, इनायत भरी नज़र चाहिए।

भटकता हुआ, अकेला "राही" हूँ मैं  
मुझको बस,  तुम जैसा रहबर चाहिए।
इल्तिजा-ए-मुसाफ़िर=राही की प्रार्थना;विनय;निवेदन 
हमज़बां=जिनकी ज़बान या भाषा एक जैसी हो
हमउमर=जिनकी उम्र एक जैसी हो
हमनवा=जिनकी सोच एक जैसी ही
हमसफ़र=जो सफर में एक साथ हो
हुस्न-ए-मल्लिका=सुंदरता की रानी
हमदम=दोस्त 
शामो-सहर=हर समय 
हिमाक़तों= बेवकूफ़ियों
कुफ्र=अधर्मता 
बसर= गुज़र; निर्वाह;जीवनयापन।
इनायत=कृपा
रहबर= मार्गदर्शक




Friday, December 29, 2017

शिमला – जो देखने मैं गया




शिमला बस स्टैंड के सामने का दृश्य 













मेरी इस रचना की अवधारणा मेरे शिमला प्रवास के दौरान आई। पहाड़ों की दुर्दशा को देख प्रकृति प्रेमियों के घायल मन से उपजी गज़ल :

शिमला – जो देखने मैं गया


बरसों बाद मैं पहाड़  से मिला,
लहूलुहान था, जब मुझको मिला। 

जिस पहाड़ को देखने मैं गया,
मुझको यारों, ना मिला, ना मिला। 

चले करने, दर्शन शिखर हिम का ,
मुझको वो भी,  ना मिला, ना मिला। 

रंग-बिरंगे मकान के पीछे,
अस्मत छुपाते हिम, मुझको मिला। 

गीत चिड़ियों की तो बात छोड़ो,
दर्शन कौओं का मुझे ना मिला। 

छीन कर बसेरा सब चिड़ियों का,
रहने को आसरा, मुझको मिला। 

ख़ाक छानता रहा इस शहर की,
मूल शख्स अमीर, मुझे ना मिला। 

थी तलाश मासूमियत की मुझे,     
एक भी आदमी, मुझको न मिला। 

दर्द ये बस हिम का नहीं “राही”,
हर शहर मुझको, ऐसा ही मिला। 
    
- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

बशीर बद्र साहब की गायन शैली में इस ग़ज़ल को मेरी आवाज़ में सुनने की लिए निचे दिए गए विडिओ लिंक को क्लिक करें। 



Friday, December 15, 2017

इज़हार-ए-मोहब्बत











इज़हार-ए-मोहब्बत

मुझे नहीं लेना-देना है, किसी से,
मेरा जीना-मरना, तेरे ही दम से,
तुम मेरी जान हो, मेरा ईमाँ हो,   
सच कहता हूँ मैं, तुम को ये कसम से। 

शुक्र है तेरा-मेरा संग हुआ है,
मैंने तेरा साथ पाया मुश्किल से,
तेरी नवाज़िश और तेरा करम है,
मैं ये कर्ज चुकाऊँगा किस तरह से।  

मेरे सपनों की रानी बन गई हो,
तुझको ही मैंने माँगा है ख़ुदा से,
तुम्हीं मेरी मंजिल, तुम ही ख़ुदा हो,
तुझको पा लूँगा, अपनी ही वफ़ा से। 

मैंने जो कहना था वो कह दिया है,
अब तुम भी तो बोलो अपनी जुबाँ से।
   
तुम मेरे प्रीतम, मेरे दिलदार हो,
तुम्हें अपनाती हूँ आज, मैं दिल से। 

-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

इस गीत को निचे दिए गए लिंक को क्लिक कर सुन सकते हैं।




Saturday, September 2, 2017

एक हसीना थी














अपराध पर आधारित एक रोमांचक कथा को
ग़ज़ल के माध्यम से कहने की कोशिश की है।
प्रतिक्रिया अवश्य दें - राही

एक हसीना थी

रग-रग से सभी को पहचानती थी वो,
सभी के दिल में क्या है? जानती थी वो।

प्यार में दग़ा दे कर, मशहूर हो गई,
यारों को ही रक़ीब, बना गई थी वो।

शमशीरें निकल पड़ीं, वो देखती रही,
हश्र क्या होगा इसका? जानती थी वो।

अंजाम कुछ भी, उसे फ़र्क नहीं पड़ता,
जीत उनकी तय थी, ये जानती थी वो।

हुस्न व इश्क में तकरार जब भी होगी,
हुस्न ही जीतेगा, ये जानती थी वो।

खंजर थी सीने में, आँखें नम मेरी,
लहराकर यूँ गोद में, आ गिरी थी वो।

आँखें खुलीं थी उसकी, मैंने बंद की,
जीत की गुरुर में, मुस्कुरा रही थी वो।

-©राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"







Tuesday, June 13, 2017

महबूब

















         महबूब    

आँखें बंद कर ली, दीदार हो गया।
तेरी याद में यूँ, जीवन गुज़र गया। 

नहीं था होश में, जो ख्वाहिश मैं करूँ,  
तेरा जलाल देख, मदहोश हो गया।
   
तेरे सजदे को छोड़, कुछ नहीं किया,
बिन मांगे ही मुझे, सब कुछ मिल गया।

तेरी रहमत मुझ पर, कुछ ऐसी हुई,
ग़रीब था कभी, मालामाल हो गया।

आवारा सा था मैं भी, इस जहाँ में  
गले लगाया आपने, मैं सुधर गया।  

कितने रहमों-करम हैं तेरे, मुझ पर,
अपने कर्म देख, शर्मसार हो गया।    

तेरी सोहबत का हुआ है ये असर,
“राही” इस जहाँ में मशहूर हो गया।

©  राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही" 




Wednesday, May 24, 2017

खामोशियाँ

 
       
खामोशियाँ


तेरी खामोशियाँ, मुझको बेचैन करती है,
हमारे बीच की दूरियाँ, बेचैन करती है। 

तेरी जुल्फ़ों को छूकर चली है जो ये हवा,
हवा में बसी खुशबू, मुझे बेचैन करती है। 

सबसे मिलती हो खुल कर, सभी ख़ास हैं तेरे,
यूँ मुझे अजनबी समझना, बेचैन करती है। 

जब तुम थी मेरे साथ, ये इल्म ना था मुझको,
तेरी कमी मेरे घर में, बेचैन करती है। 

माना खता थी मेरी, दिल तेरा दुखाया था,
तुझे नहीं मनाने की जिद, बेचैन करती है। 

बड़ी उम्मीद ले कर तेरे दर पर आया हूँ,
नाउम्मीदी का ख्याल भी, बेचैन करती है। 

अब जो भी हो, दिल की बात कह रहा है “राही”,
तेरी खामोशियाँ, अब भी, बेचैन करती है। 

©  राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही" 




Wednesday, April 26, 2017

ख्वाहिश


ख्वाहिश

चंद साँसों का ये सफ़र, जो मुझको मिला,
किसी को न मिले ये सफ़र , जो मुझको मिला।

गुनगुनाने की चाह अपने घर में और,
रोने को एक कोना भी न मुझको मिला ।

कई   हसीं सपनें   देखे   मैंने भी  और ,
सच करने का आसरा न, सपनों को मिला।

मातम फैला रहता  मेरे घर में  औ',
महफ़िल-ए-रंग  जमाता, मैं सब को मिला।

सुकून ढूंढ़ने  लगा बेगानों में और,
खुल कर हँसने का मौका ना, मुझको मिला।

रूह भटक रही , अपने ही घर में  "राही ",
मुर्दा हूँ,  सुपुर्द-ए-खाक न ,मुझको मिला।


©  राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही" 





Wednesday, April 12, 2017

ख़िताबत

ख़िताबत 


बस ! मुझे भी तुम इंसान समझो  तब तो बात हो,
ख़ुद की  ख़िताबतों  पर अमल करो तब तो बात हो, 

फूलों भरी राह हो तो सभी सफ़र आसान हो,
काँटो भरी राह पर सफ़र करो तब तो बात हो ।

मैख़ाने में देख मुझे काफ़िर समझते हैं वे,
यहाँ आकर तुम मुसलमान बनो तब तो बात हो ।







मेरी रोज़ी-रोटी चलती है, ख़ुद को बेच कर,
मुझे ख़रीद, ख़ुदा की बात करो तब तो बात हो ।

मेरी अस्मत लुटती है सरेआम बाज़ार में,  
अपने घर में मुझको पनाह दो तब तो बात हो ।

मेरे दर्द को तुम ना समझ पाओगे उम्र भर,
मेरी जगह पर तुम ख़ुद को रखो  तब तो बात हो।

ना देख हिक़ारत की नज़रों से मुझे ऐ “राही”
मुझ में बसे ख़ुदा को तुम देखो , तब तो बात हो ।

ख़िताबत = 1. संबोधित करना 2. भाषण देना।
मुसलमान  =  मुसल्लम ईमान वाला। 

©  राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"







Wednesday, March 15, 2017

भरोसा

("अत्यधिक  भरोसा  खतरे  को  जन्म  देता  है।")

    



         

     

      भरोसा

असहिष्णु शब्द का मर्म खूब जानते हैं वे। 
देश कैसे बंटे? ये खूब जानते हैं वे। 

जब से मैंने ये लिख दिया है अख़बार में,
मुझको ज़िन्दा देखना नहीं चाहते हैं वे।

तथा-कथित देशभक्त भी जानने लगे मुझे,
उनके मुताबिक़ मैं लिखूँ ये चाहते हैं वे। 

अपना दल बनाकर राजा बन बैठें है जो 
गणतंत्र में राज चले कैसे, ये जानते हैं वे। 

उम्र भर उनको शासन करते हुए देखा है,
अब वंश करेगा शासन ये जानते हैं वे। 

भोली वोटर दुविधा में हैं किस दल को चुने,
कुछ नहीं बदलने वाला ये जानते है वे।

जो तमाम उम्र नहीं की माँ-बाप की सेवा,
उनके चित्र से घर सजाना जानते है वे।

आज हाथ जोड़े नेता खड़ा है जो "राही",
कल सर झुकेगा सभी का, ये जानते है वे।


- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"






Thursday, November 24, 2016

मुक़द्दर का सिकंदर

       






         मुक़द्दर का सिकंदर 


पक्के  इरादे के साथ, जिसका हौसला बुलंद हो,
मंजिल उसे सदैव मिले,ऐसा भला क्यों ना हो।

जोश और जुनूँ बन कर लहू, नस-नस में दौड़े,
दुश्वार कार्य फिर भला, आसान क्यों  ना हो। 

धारा के विपरीत, जो बाजुओं से पतवार चलाए ,
मुश्किल भरी डगर भी, फिर सुगम क्यों  ना हो।

परिस्थितियों से करे सामना, संघर्ष ही कर्म हो,
कितना भी बड़ा हो सपना, साकार क्यों  ना हो। 

तक़दीर को जो ना माने, तदबीर पर ही जिए,
काँटों भरे रास्ते, फिर फूल भरे क्यों  ना हो।

मुसीबतों में धैर्य ना खोकर, जो लक्ष्य की ओर बढ़े,
सफलता उसकी कदमों को चूमें,ऐसा क्यों  ना हो। 

ख़ुदा और ख़ुद पर जो करके भरोसा, मंजिल को पा जाए,
दुनियाँ की नज़रों में वो, मुक़द्दर का सिकंदर क्यों  ना हो। 

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

Thursday, November 10, 2016

विरासत

        

       





         विरासत 

गिर गई हैं चंद दीवारें, और घिस गई मेरी ईटें  सभी,
झड़ गई प्लस्तर की परतें, और उग आए यहाँ पेड़ भी।

खंडहर हूँ पर खड़ा हूँ, मिटा नहीं मेरा अस्तित्व है,
वीरान स्थल में पड़ा हूँ, कोई कहता मुझे अवशेष भी।

अपने अंदर समेटा हूँ, न जाने कितनी ही कहाँनियाँ ,
दर्द मेरी बयाँ करेंगी, मेरी टूटी हुई दरों-दीवार भी।

मैं तो कुछ न कह पाउँगा, यादें हो गई मेरी धुंधली ,
पर तुम्हें बेचैन करेगी, मेरी उपस्थिति यूँ ही कभी-कभी।

गर तुम करोगे मेरी सेवा, मुझको शायद महसूस न हो,
खुद को पाओ इस मोड़ पर, बेचैन होगा कोई और भी।

दिख रही है कुछ कंगूरे, ये कभी मेरे ताज थे,
टूट गई है कुछ कंगूरे, जैसे मेरी जिंदगी बरबाद है अभी।

तुम कभी नज़रें न चुराना, किसी खंडहर को देख कर ,
क्योंकि इसी के दम पर है, शेष ज़िन्दगी तुम्हारी अभी।

विरासत में जो तुम को मिला, उसको रखना सहेज कर,
आने वाली नस्लें कर सकेंगी, तेरे होने की पहेचान भी।

तेरी-मेरी पहचान की गवाह है, जब तक खड़े  हैं ये खंडहर,
ये सिलसिला जब तक चलेगा,तब तक चलेगी कायनात भी।


- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"




  

Thursday, July 14, 2016

हादसा


www.flickr.com/photos/palosaari/ से साभार 


हादसा




तुम गई तो, ज़िन्दगी में, छा गई तन्हाईयाँ,

दिख रही है, हर तरफ अब, तेरी ही परछाइयाँ। 


था जगमगाना, जिस महल को, अब अँधेरा है वहाँ,

यहाँ राज है, खामोशियों का, जहाँ बजनी थी शहनाइयाँ। 


क्या खता मुझसे हुई, क्यों सजा मुझको मिली,

ग़र खता मुझसे हुई तो, माफ़ कर देता मेरी नादानियाँ। 


क्यों छीन ली, उसकी ज़िन्दगी, वो चिड़िया थी, मेरे बाग़ की,

सदा चहकती मेरे बाग़ में, अब फैली है खामोशियाँ। 


अब मेरा तो पागलों सा हाल है, जीना मेरे लिए दुःश्वार है,

अब करम मुझ पर करो तो, ख़त्म हो, मेरी परेशानियाँ। 

                                              - © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

Thursday, August 27, 2015

बैरी सावन











    बैरी सावन


सावन में सिमटी रहती हूँ,
सावन में गुमसुम रहती हूँ। 

जब से गए है परदेश सजनवा,
उनसे मिलने की सपने बुनती हूँ। 

जब बारिश आग लगाती सावन में,
आँगन में भीग, चुपचाप रो लेती हूँ। 

जब भी उनसे हो फोन पर बातें,
दिल की बातें नहीं कह पाती हूँ। 

भरा-पूरा है घर-आँगन मेरा फिर भी,
जल बिन मछली जैसी तड़प रही हूँ। 

जब से खबर मिली है उनके आने की
न चाहते हुए भी मैं थोड़ी-सी बदल गई हूँ। 

"राही”, जाने-अनजाने हो जाती है गलती मुझसे
देवर, सास और ननद की ताने सुनती रहती हूँ। 

सावन में सिमटी रहती हूँ,

सावन में गुमसुम रहती हूँ। 

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

Wednesday, July 22, 2015

आवारा आशिक


Picture from  https://www.mihai-medves.com 

आवारा आशिक

समेट लो दामन में मुझको, मैं बिखड़ा हुआ हूँ,

सहारा मुझको दे दो तुम, अंदर से टुटा हुआ हूँ.


बे-वजह तुम से मिला और मेरा ये हाल हुआ,

पहले आवारा बादल सा, मैं जीवन जीता रहा हूँ.


मुझे देख कर दहशत में जीते थे लोग,

अब उन्हीं के ठोकरों पर, मैं जी रहा हूँ.


बहुत ही कठिन है शराफ़त से जीना,

तेरी सोहबत के ख़ातिर, मैं ये कोशिश कर रहा हूँ.


मुफ़लिसी में जीना कोई मुश्किल नहीं है,

बेबसी में जीना है कैसा, मैं अब समझ रहा हूँ.


हौसलों के आगे असफलता कब तक टिकेगी,

जैसा चाहा था उसने वैसा, मैं अब बन गया हूँ.


कुछ भी बन जाना ये मेरे हाथ में है “राही”

वो मेरी बनेगी एक दिन, मैं इंतज़ार कर रहा हूँ.

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"