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Friday, June 29, 2018

अतृप्त


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अतृप्त 

बादल, ख्वाहिशों का,
चाहत अब तक की, 
उसको, तुमसे मिलने से पहले 
टाँग आई मैं,
पहाड़ की चोटी पर,
इस आस के साथ कि
तुम्हारे प्यार की ऊष्मा में,
संघनित हो,
मेरी ख्वाहिशों के बादल,
मेरे दामन को खुशियों से भर देंगे,
पर ऐसा अभी तक न हुआ। 

कल्पनाओं की उड़ान भर,
अक्सर मैं देख आती हूँ  उस बादल को,
जो अभी भी सुरक्षित टँगा है  
जिसमें मेरी ख्वाहिशें,
अब भी सुरक्षित हैं,
ठोस अवस्था में,
मृत शरीर सा शांत एवं ठंडा।

और आज मैं क्या देख रही हूँ,
कोई पहाड़ की चोटी को हिला रहा है,
अपनी गर्म साँसों से,
मेरी ख्वाहिशों के बादल को,
बहा कर ले जाना चाहता है,
और टाँगना चाहता है 
अपनी इच्छाओं की चोटी  पर। 

नहीं चाहता वो मुझ से कुछ भी,
केवल चाहता है  संघनित करना 
मेरी ख्वाहिशों के बादल को 
और भरना चाहता है,
मेरा दामन खुशियों से,
पर तुम्हें यह भी मंजूर नहीं।



अतृप्त (Ungratified )            : जिसका मन न भरा हो।; जिसकी कामना या भूख अभी तक बनी हो।
संघनित करना(CONDENSE):  द्रवीकरण होना

-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"


Friday, May 18, 2018

अफ़वाह


अफ़वाह 

कानों सुनी बातों का असर,
डाले ये, समझने पर असर
जगाता है झूठा अहंकार,
सजाता है नफ़रत का शहर.

आसां नहीं है सत्य का डगर, 
तय करता है ये लम्बा सफ़र,
टूटती है उम्मीदें कितनी,
शैतान इससे है बे-असर.

कानों में घोलते हैं जहर,
फैलाते हैं उन्मादी लहर,
बचना तुम ऐसे लोगों से,
नहीं तो जल जाएगा शहर.

भाईचारे पर बुरी नज़र,
जो पड़ जाए कहीं भी अगर,
समझ लेना उनकी चाल को,
उनको मिलकर बेनक़ाब कर.

पा लिया अब ज्ञान का सागर
दिखा दो अभी प्यार का मंज़र,
शैतान अंधे हो जाएँगे,
जब देखेंगे यहाँ का सहर.

-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

Friday, January 5, 2018

सामाजिक पशु,



सामाजिक पशु, (एक मुक्त कविता)

काम और युद्ध प्रवृत्ति में बंधा मैं,
हमेशा हिंसा करने को आतुर,
काम-वासना में लिप्त,
पशु जैसा ही तो हूँ मैं,
अंतर है तो बस सामाजिक होने का। 

पशु, जब जो चाहा,
उसे देता है अंजाम,
करता है हमला और हत्या,
विचार आते हैं मुझे भी,
चाहता हूँ पशु की तरह,
परन्तु अंजाम पूर्व सोचता हूँ,
बनाता हूँ सहमति,
अंतर है तो बस सामाजिक होने का। 

अगर नहीं बनती है सहमति,
तो चढ़ा लेता हूँ,
चेहरे पर नक़ाब,
करता हूँ स्वयं से युद्ध,
नहीं हावी होने देता पशुता को,
चंद दे देते हैं अंजाम,
जब जो चाहा,
चाहे हो मतभेद,
बने रहते हैं पशु,
उनमें और मुझमें,
अंतर है तो बस सामाजिक होने का। 

करते हैं जो अनैतिक कार्य,
काम-वासना और उत्तेजना में,
और पाए जाते हैं लिप्त, 
किसी वारदात में,
किस में नहीं है,
काम-वासना और उत्तेजना,
परन्तु अंजाम पूर्व,
मैं सोचता हूँ,
क्योंकि मैं हूँ,
सामाजिक पशु,
अवसाद, परिवेश और संगती,
नहीं बनने देते सामाजिक पशु, 
अपराधी और मुझ में 
अंतर है तो बस सामाजिक होने का।

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"



Friday, December 22, 2017

परिवेश





  



  









परिवेश - (एक मुक्त कविता)


जाड़े की नर्म धूप,
खो दी है तुमने,  
अपने हिस्से की। 

तुम्हें पसंद है,
वातानुकूलित परिवेश,
और छूट गया साथ,
जिसे तुम चाहते हो। 

तुम चाहते हो शांति,
तुम छुप जाते हो अपने,
वातानुकूलित विचारों में,
और दिखते हो शांत,
पर तुम्हें नहीं मिलती,
जिसे तुम चाहते हो। 

ऐसा नहीं है कि,
जो तुम्हें मिला वो,
तुम्हारी पसंद नहीं थी। 

वक्त की गर्त में,
धूल की ऐसी परतें,
जम गई है विचारों में,
बन गए हो खुदगर्ज,
नहीं सोचते उसके बारे में,
जिसे तुम चाहते हो। 

जब भी झुलस जाते हो,
वातानुकूलित विचारों से,
और पाते हो खुद के, 
रिश्तों में सर्द मौसम। 
  
नहीं देना चाहते हो,
पर दे जाते हो दुःख,
जिसे तुम चाहते हो। 

अब निकलो तुम अपने,
वातानुकूलित परिवेश से। 

दोनों के विचारों से,
बनाओ नया परिवेश। 

दूर करो उसके आँखों के
सामने छाये कोहरे को,
और कह दो ज़ुबाँ से,
चाहिए नर्म धूप उससे,
जिसे तुम चाहते हो। 

-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

Wednesday, May 27, 2015

नई पीढ़ी










नई पीढ़ी

रुको! सुन लो मेरी बात,
मैं जानता हूँ कि तुम नहीं मानोगे,
सुन लोगे मेरी बात बुजुर्ग मानकर,
लेकिन करोगे अपनी मन-मर्जी,
और पछताओगे समय निकल जाने पर,
जैसे, आज मैं सोचता हूँ,
क्यों नहीं मैंने मानी,
अपने बुजुर्गों की बात!

मैं मानता हूँ पीढ़ी के फासले को,
और मानता हूँ हमदोनों के सोचने के अंतर को,
पर शाश्वत सत्य कभी बदलते हैं भला,
जीवन शैली हमदोनों की जुदा हो सकती है,
मगर सफलता के सूत्र भी कभी बदलते हैं भला,
और छल-कपट से कभी सफल हो भी जाओ,
तो क्या तुम कभी बदल पाओगे,
समाज के घिनौने चेहरों को,

ऐसा नहीं है कि मैंने सफलता प्राप्त नहीं की,
और ऐसा भी नहीं है कि तुम्हें सफलता नहीं मिलेगी,
फर्क है तो बस मापदंड का,
जी रहा होता और खुशहाल ज़िन्दगी,
अगर मैंने मानी होती,
अपने बुजुर्गों की बात!

इसलिए सुन लो मेरी बात,
युवा हो तुम ! है तुम में अनंत ऊर्जा,
हो जाओ तुम उश्रृंखल,
केवल मौज-मस्ती के लिए,
पर ध्यान रहे!
उससे अहित न हो दूसरों का,
शेष ऊर्जा को खर्च करो दिल खोल कर,
जो काम आए अपने और समाज के नव-निर्माण में,
मैं नहीं कहता कि तुम सभी भटके हुए हो,
मेरी सलाह उनके लिए जो युवा है आम,
रुको! सुन लो मेरी बात.
जिनसे मैं भी सीखता हूँ,
ऐसे युवाओं को पहुंचाना मेरा भी सलाम!

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"