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Friday, November 8, 2019

उपन्यास "ढाई कदम" पर प्रतिक्रिया


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वरिष्ठ रचनाकार लीला तिवानी जी ने 
उपन्यास "ढाई कदम" पढ़ कर आशीर्वाद स्वरुप अपनी प्रतिक्रिया मेल द्वारा भेजीं  हैं जिसे मैं यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ। 

उपन्यास "ढाई कदम" पर प्रतिक्रिया

ढाई दिन के शहंशाह निजाम सिक्का का किस्सा पढ़ा-सुना था, ढाई दिन का झोंपड़ा भी देखा था, ढाई मिनट कदमताल करके एक मील चलने का लाभ घर में ही लिया जा सकता है, इसका अनुभव भी किया था। ढाई कदम उपन्यास पढ़कर यह सब याद आ गया था। उपन्यास "ढाई कदम" की मुख्य पात्र शिवांगी नामक एक स्त्री है, जो स्त्री होने के दंश को झेलती हुई, अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए विभिन्न चुनौतियों का सामना करते हुए आगे बढ़ती है। पहला कदम तो मंजिल का प्रारंभ होता है, यह सोचकर वह संघर्ष करती रही। दूसरे कदम में भी समाज में व्याप्त मनोविकारों से संघर्ष करना ही उसकी नियति में लिखा था। पुरुष तो अक्सर ढाई कदम चलकर सब कुछ भुला देता है, पर स्त्री होने के नाते भावुक शिवांगी ऐसा नहीं कर पाई। 'राधा और मीरा का जीवन कोई पुरुष जी ही नहीं सकता', कहकर वह अनुराग को भी बैरंग लौटा देती है और प्रशांत को भी। पार्वती के समान पवित्रता का जीवन जीने को इच्छुक शिवांगी को अब तीसरा कदम सोच-समझकर उठाना था, इसलिए ही सम्भवतः वह ढाई कदम ही चल पाई। 

राकेश कुमार श्रीवास्तव 'राही' का यह उपन्यास आज-कल के सामाजिक परिवेश में फैले मनोविकार, छद्म आचरण और विश्वासघात के महीन रेशों में फंसी  एक स्त्री के लिए अपने लक्ष्य की तरफ कदम उठाने के संघर्ष एवं सफलता या असफलता के परिणाम पर जीवन दिशा बदलने की जद्दोजहद की कहानी है, जो पाठक को जीवन दिशा बदलने की जद्दोजहद के चलते भी एक नया रास्ता खोजने की प्रेरणा देने में सहायक है। पढ़ाई के लिए अकेले रहने के दौरान छात्रों को क्या-क्या मुश्किलें आती हैं, इसका अनुमान लगाना शायद मुश्किल हो, लेकिन दुनिया ऐसे ही चलती है। विद्यार्थी का कर्म है, अध्ययन करना और यही करना उसकी साधना है, यह तभी तक साधना रहती है, जब तक लक्ष्य पर नजर टिकी रहे, अन्यथा सब बेकार हो जाता है। कच्ची उम्र की दुश्वारियों, एक तरफा प्यार का दुष्परिणाम, संयुक्त परिवार की अपनी एक परम्परा को प्रोत्साहन, असफल होने पर संयुक्त परिवार का छांव बन जाना आदि इस उपन्यास की विशेषताएं हैं।   

110 पेज एवं 8 खंड का यह उपन्यास प्रकृति की सुंदरता की प्रतीकात्मकता से सुसज्जित है। इसे उपन्यास की इन पंक्तियों में देखा जा सकता है-

“आकाश में पूनम का चाँद सदैव की भाँति, अपनी रौशनी से सभी को नहला रहा था। चाँदनी रात में सितारे टिमटिमा रहे थे, तभी पूनम की रात अमावस्या की रात में तब्दील हो गई। एक बहुत बड़े काले बादलों के समूह ने चाँद को पूरी तरह से ढँक लिया था और तारे बेबस होकर बादलों की करतूत को देख रहे थे।''

प्यार के अंत और प्रकृति के सामंजस्य को देखिए- ''सूरज ढल चुका था, अपने घोंसले की तरफ जाने के लिए पक्षी कोलाहल करते हुए आज की अंतिम उड़ान भर रहे थे.''

प्राची डिजिटल पब्लिकेशन, मेरठ, उत्तर प्रदेश द्वारा प्रकाशित इस उपन्यास की साहित्यिक हिंदी भाषा का अनवरत प्रवाह आगे की कथा को जानने की उत्सुकता बढ़ाने में तो समर्थ है ही, अनेक सामाजिक समस्याओं के समाधान में भी सक्षम है. 


-लीला तिवानी 
शिक्षा- हिंदी में एम.ए., एम.एड.
ब्लॉग  https://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/rasleela/ 

Thursday, September 26, 2019

उपन्यास 'ढाई कदम' की विषयवस्तु ।


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उपन्यास 'ढाई कदम' की विषयवस्तु ।

कहाँ आसान होता है, सामाजिक बेड़ियों को तोड़ना परन्तु इसको चुनौतियों के रूप में लेकर कुछ स्त्रियाँ छोटे-छोटे शहरों से महानगरों में आकर अपने बड़े सपनों को पूरा करने के लिए, अपनी जी-जान लगा देती हैं और पुरुष-प्रधान समाज को नए मापदंड स्थापित करने को मजबूर करती हैं। ऐसी ही तमाम संघर्षरत महिलाओं को समर्पित है, यह उपन्यास, जो अपनी अस्मिता की शुचिता बरकरार रखते हुए अपना जीवन गरिमामय तरीके से जीकर दूसरी महिलाओं का मनोबल बढ़ा रहीं हैं।


उपन्यास "ढाई कदम" की मुख्य पात्र शिवांगी नामक एक स्त्री है। वह स्त्री होने के दंश को झेलती हुई, अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए विभिन्न चुनौतियों का सामना करते हुए आगे बढ़ी। जब वह प्रेम और वासना शब्द से अनजान थी तब भी उसे जीवन में प्रेम और वासना से संघर्ष करना पड़ा। समाज में व्याप्त मनोविकारों से ग्रसित उसकी  अपनी सहेली से खुद को मुक्त कर 'एकला चलो रे' के सिद्धांत को आत्मसात किया। जब उसने प्रेम में बढ़ाए गए ढाई कदम को समझा तो उसने अपने मित्र की ओर अपनी अस्मिता की शुचिता को ध्यान में रखते हुए अपने कदम बढ़ाए पर जीवन में सफलता सभी को मिले ऐसा होता है क्या? आज-कल के सामाजिक परिवेश में फैले मनोविकार, छद्म आचरण और विश्वासघात के महीन रेशों में फंसी  एक स्त्री के लिए अपने लक्ष्य की तरफ कदम उठाने के संघर्ष एवं सफलता या असफलता के परिणाम पर जीवन दिशा बदलने की जद्दोजहद की कहानी कहता है यह उपन्यास "ढाई कदम"।
ढाई कदम

-© राकेश कुमार श्रीवास्तव 'राही'

Tuesday, August 27, 2019

ढाई कदम


सभी मित्रों से आग्रह है कि इस पोस्ट को शेयर कर मेरे उपन्यास "ढाई कदम" का प्रचार एवं प्रसार में मेरा सहयोग करें. नीचे दिए गए चित्र को क्लिक कर उपन्यास "ढाई कदम" का आर्डर कर सकते हैं.









Wednesday, May 15, 2019

राष्ट्रीय पत्रिका में मेरी कविता


मेरी कविता वनिता पत्रिका मई'2019 अंक में प्रकाशित हुई है।



Monday, April 29, 2019

सूचना

दोस्तों! 

किन्ही  परिहार्य कारणों से, मैं कुछ समय के लिए इस ब्लॉग जगत पर अनुपस्थित रहूँगा।

जल्द मिलने की आशा में आपका - 
राकेश कुमार श्रीवास्तव 'राही'