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Friday, July 27, 2018

FACE OF COMMON MAN - 5




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-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"



Wednesday, July 25, 2018

भाप इंजन से बुलेट ट्रेन तक का भारतीय रेल का सफ़र ( भाग- 2 )

भाप इंजन से बुलेट ट्रेन तक का भारतीय रेल का सफ़र ( भाग- 2 )

पिछले भाग में आप मेरे साथ भारत में भाप इंजन से बुलेट ट्रेन तक के सफ़र पर थे ।  जिसमें रेलगाड़ी को गति के नज़रिये से तीन घटकों में बाँट कर मैं आपको समझा रहा था। आप अबतक इसके दो घटकों से परिचित हो चुके है जिसमें - पहला घटक था रेल-पथ एवं दूसरा घटक था इंजन। अब आपको तीसरे घटक से परिचय करा दें। 

भाप इंजन से बुलेट ट्रेन तक का भारतीय रेल का सफ़र ( भाग- 1 ) पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। 

तो, तीसरा घटक है बोगी एवं कोच : सन् 1955 के पहले लकड़ी के कोच बनते थे । उसके बाद तीन तरह के बोगी एवं कोच भारत में इस्तेमाल होते हैंजिसमें सबसे पुराना है स्विस डिजाईन से निर्मित आई.सी.एफ. टाइप कोच एवं बोगीजिसकी अधिकतम गति सीमा 130 कि.मी./घंटा है। यह  परंपरागत यात्री कोच हैं, जो कि भारत में अधिकांशतः मुख्य लाइन ट्रेनों पर इस्तेमाल होते हैं।  कोच एवं बोगी का डिजाइन 1950 के दशक में स्विस कार एंड एलेवेटर मैन्युफैक्चरिंग कंपनीस्लिएरेनस्विटजरलैंड के सहयोग से इंटीग्रल कोच फैक्ट्रीपेरामबूरचेन्नईभारत द्वारा विकसित किया गया था। स्विस कंपनी के स्थान के आधार पर इस डिजाइन को स्लिएरेन डिजाइन भी कहा जाता है। अब इस परंपरागत यात्री कोच के युग का अंत जल्द ही होने वाला है। 

सवारी रेलगाड़ी के गति में बढ़ोतरी के लिए सन् 1990 के अंत में संयुक्त राष्ट्र संघ के सहायता कार्यक्रम के तत्वावधान में यूरोफिमा डिजाइन स्विट्जरलैंड पर आधारित आईआरवाई कोच एवं  आईआर 20 बोगी का निर्माण रेल डिब्बा कारखानाकपूरथला में किया गया, जिसकी अधिकतम गति सीमा 140 कि.मी./घंटे की थी।  इसके बाद सन् 1995 से  लिंकई हॉफमैन बुश (एलएचबी) एवं फ़िएट द्वारा विकसित कोच एवं बोगी का निर्माण रेल डिब्बा कारखानाकपूरथला में किया जाता है । इन डिब्बों को 160 कि.मी./घंटा तक की  ऑपरेटिंग गति के लिए डिज़ाइन किया गया है और इसकी गति 200 कि.मी./घंटा तक जा सकती है।

गति पर आधारित मुख्यतः भारत में चार प्रकार की ट्रेन चल रही हैंपैसेंजर ट्रेन लगभग 40-80 कि.मी./घंटा की गति से चलती हैं। सुपर फास्ट एक्सप्रेस और मेल ट्रेन 100-110 कि.मी./घंटा तक की गति से चलती हैं। राजधानी और शताब्दी एक्सप्रेस जो क्रमशः सन् 1969 एवं सन् 1988 में नई दिल्ली को भारत की राज्य की राजधानियों से जोड़ने के लिए शुरू की गई थी, इसकी गति सीमा 130 कि.मी./घंटा है। जब हम गति की बात करते हैंतो बुलेट ट्रेन की चर्चा होती है और जब आप मेट्टुपालयम(कोयंबटूर) - उदगमंडलम (ऊटी) यात्रा मेट्टुपालयम(कोयंबटूर) - उदगमंडलम पैसेंजर ट्रैन से 1कि.मी./घंटा की औसत गति  से यात्रा करेंगे तो आप उस अविस्मरणीय एवं सुखद पल को भूल नहीं पाएंगे। अतः हम कह सकते हैं कि तकनीकी विकास के साथ-साथ भारतीय रेल अपनी विरासत को भी बखूबी संभाले हुए है।
अगर आप रेलवे की शाही सवारी कर भारत को करीब से जानना चाहते हैं, तो आप के लिए हैं,  भारत की सबसे शानदार ट्रेन : पैलेस ऑन व्हील्समहाराजा एक्सप्रेसगोल्डन चॅरियटडेक्कन ओडिसीरॉयल राजस्थान ऑन व्हील्समहापरिनिर्वाण एक्सप्रेसभारत दर्शन एवं स्टीम एक्सप्रेस और अगर आप  भारत के मशहूर पहाड़ी स्टेशनों जैसे दार्जिलिंगशिमलाऊटी और माथेरान आदि का रेल द्वारा दर्शन करना चाहते हैं तो भारतीय रेल का नैरो गेज की 4500 किलोमीटर लंबा ट्रैक आपके स्वागत में टॉय ट्रेनों के साथ हाज़िर है।   

सब-अर्बन ट्रेनों के लिए डीएमयूडीएचएमयूईएमयू एवं एमईएमयू चलाई जाती हैजिसकी अधिकतम गति सीमा 80 किमी/घंटा होती है। अक्टूबर 1994 में पहली डीएमयू ट्रेन का निर्माण आई.सी.एफ.मद्रास में हुआ। पहली डीसी ईएमयू ट्रेन ने 3 फरवरी 1925 को मुंबई से कुर्ला तक का सफ़र तय किया। सन् 1957 में रेलवे ने विद्युतीकरण के लिए 25 केवी50 चक्र एकल फ़ेज एसी सिस्टम को अपनाने का निर्णय लिया। इसके बाद एसी ईएमयू ट्रेन का चलन प्रारंभ हुआ और साठ दशक के अंत में भारत हैवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड ने स्वदेशी ईएमयू ट्रेन बनाना शुरू कर दिया। ईएमयू ट्रेन की गति बढाने के लिए आई.सी.एफ. ने एमईएमयू ट्रेन का निर्माण सन् 1994 में किया।
कोलकातादिल्ली एवं मुंबई महानगरों में सड़क परिवहन के ऊपर बढ़ते दबाव को कम करने के लिए विभिन्न तरह की ट्रेन चलाई  गई । 24 अक्टूबर 1984  में कोलकाता मेट्रो ट्रेन चली जिसकी अधिकतम गति 55 किमी/घंटा है एवं 24 दिसंबर 2002 को दिल्ली मेट्रो ट्रेन चली जिसकी अधिकतम गति 80 किमी/घंटा है। मुंबई में मोनोरेल ने आंशिक रूप से 2 फरवरी 2014 में व्यावसायिक संचालन शुरू हुआ। अब भारत में मेट्रो ट्रेन छोटे-बड़े शहरों में काम कर रही है या परियोजनाओं को लागू करने का कार्य प्रगति पर है। मेट्रो ट्रेन भारतीय रेल का अंग नहीं है।    

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय रेलवे, ट्रेनों की गति बढ़ाने के लिए सतत  प्रयत्नशील रही है और भारत सरकार के विशेष अनुरोध पर सीमित साधनों में सेमी हाई-स्पीड ट्रेन तेजस का निर्माण कर भारतीयों के आँखों में बुलेट ट्रेन के सपने को पंख लगा दिए। अहमदाबादगुजरात और भारत के आर्थिक केंद्र मुंबईमहाराष्ट्र के शहरों को आपस में जोड़ने वाली एक उच्च-गति वाली रेल लाइन मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर का निर्माण प्रगति पर है। यह भारत की पहली उच्च गति वाली रेल लाइन होगी।

भारत में सबसे तेज 160 कि.मी./घंटा की गति से चलने वाली गतिमान एक्सप्रेस ट्रेन है, जो 5 अप्रैल 2016 को शुरू की गई।
तेजस एक्सप्रेस का उद्घाटन सीएसटी मुंबई से करमीलीगोवा तक 24 मई 2017 को हुआ । इसके डिब्बों एवं बोगी का निर्माण रेल कोच फैक्टरीकपूरथला में किया जाता है। यह ट्रेन डब्ल्यूडीपी 3 ए इंजन की शक्ति से 130 कि.मी./घंटा की औसत गति से चलती हैलेकिन कुछ हिस्सों पर 180 कि.मी./घंटा की गति को छूने की अनुमति दी गई है।
10,000 कि.मी. की डायमंड चतुर्भुज (दिल्ली-मुंबईमुंबई-चेन्नईचेन्नई-कोलकाता और कोलकाता-दिल्ली) और दो विकर्ण (दिल्ली-चेन्नई और मुंबई-कोलकाता) देश के प्रमुख महानगर और विकास केंद्रों को जोड़ने के लिए, उच्च गति रेल कोरिडोर की परियोजना पर भी काम चल रहा है। इस परियोजना का लक्ष्य सन् 2020 में ट्रेन की वर्तमान गति 110-130 कि.मी./घंटा से बढ़ा कर 160-200 कि.मी./घंटा करने के लिए ट्रैक बनाने का है। भारत के कुछ हिस्सों में मौजूदा लाइनों को उन्नत कर 200 कि.मी./घंटा की गति तक के लिए  सुसज्जित किया गया है और अन्य बची हुई लाइनों को उन्नत करने का कार्य प्रगति पर है।    
अब हमारे कदम उच्च गति वाली बुलेट ट्रेन की तरफ बढ़ गए हैं। उच्च गति वाली रेल लाइन गलियारे का निर्माण कार्यक्रम के अनुसार 14 सितंबर 2017 को शुरू हुआ और पहली बुलेट ट्रेन 320 कि.मी,/घंटा की गति से 15 अगस्त 2022 को अपनी पहली दौड़ के लिए निर्धारित है। मेक इन इंडिया कार्यक्रम का समर्थन करने के लिए प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के साथशिंकानसेन ई-5  (बुलेट ट्रैन) तकनीक को सिखाने के लिए, जापान भारतीय रेल कर्मचारियों को प्रशिक्षण प्रदान करेगा। बेशक बुलेट ट्रेन की  प्रौद्योगिकी जापान की है परन्तु इसके  अधिकांश संसाधन स्वदेशी होंगे। 
मेरे इस कथन में कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि प्रौद्योगिकी का कोई भी युग होये अपने समय- काल में देशसमाज एवं सभ्यता के विकास का इंजन बनते हैंचाहे भाप इंजन का युग हो या अब बुलेट युग। अब वो दिन दूर नहीं जब आने वाली भारत की आज़ादी की हीरक जयंती प्रगति के बुलेट पर सवार होगी।        

विश्व पटल पर भारतीय रेलवे बहुत पिछड़ा हुआ हैपरन्तु जापान ने बुलेट ट्रेन की प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कर एक नई आशा जगाई है। हम भारतीय उम्मीद कर सकते हैं कि जापानी तकनीक की सहायता से बुलेट ट्रेन के इतिहास में भारत नए आयाम स्थापित करेगा। जैसे 21 अप्रैल 2015 को जापान की मैग्लेव ट्रेन ने 603 किलोमीटर प्रति घंटा की गति प्राप्त कर विश्व रिकॉर्ड बनाया हैवैसे ही अत्याधुनिक चुंबकीय तकनीक मैग्नेटिक लेविटेशन से चलने वाली इस ट्रेन को सन् 2027 तक भारत में चलाने की योजना है। 

-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

Friday, July 20, 2018

भाप इंजन से बुलेट ट्रेन तक का भारतीय रेल का सफ़र ( भाग- 1 )


भाप इंजन से बुलेट ट्रेन तक का भारतीय रेल का सफ़र ( भाग- 1 )
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रेलगाड़ी भारतीयों के जीवन में इस तरह रची बसी है कि इसके बिना आम आदमी का जीवन मुश्किल है,  इसलिए भारत में रेल को हम जीवन रेखा के नाम से भी जानते है।   'अनेकता में एकताका सबसे बड़ा उदाहरण भारतीय रेल ही है। तो आइए! आपको ले चलते हैं, भारत में भाप इंजन से बुलेट ट्रेन तक के सफ़र पर।   

भारतीय रेल की परिकल्पना सर्वप्रथम लॉर्ड डलहौज़ी ने सन् 1843 में की थी।  सोलानी जलसेतुरुड़की के निर्माण के दौरान,  22 दिसंबर 1851 में भाप इंजन का इस्तेमाल कर भारत में एक नए युग की शुरुआत हुई । परन्तु भारतीय रेलवे का प्रथम भाप इंजन "फ़ॉकलैंड" नामक इंजन थाजिसका उपयोग शंटिंग के लिए किया गया। यह इंजन 18 फरवरी 1852 को मुम्बई आया और  मुम्बई के गवर्नर के नाम पर ही इसे  "फ़ॉकलैंड" का नाम दिया गया था। भारतीय रेल की सार्वजनिक परिवहन की परिकल्पना तब साकार हुई, जब सन् 1853  में आठ (2-4-0 प्रकार के) भाप इंजनों को भारतीय रेल-पथ पर उतारा गया और इन्हीं में से साहबसिंध और सुलतान नामक तीन इंजनों ने शाही अंदाज में 21 तोपों की सलामी लेकर 14 डिब्बों और 400 सवारी को लगभग 40 कि.मी./घंटा  की रफ़्तार से मुम्बई के उपनगर बोरीबंदर से ठाणे तक का सफर 16 अप्रैल 1853 को दोपहर 3:35 बजे पर चल कर 4:32 बजे पूरा किया। भारत में  ब्रॉड गेज का फेयरी क्वीन इंजन (2-2-2डब्लूटीडब्लूटीदुनिया में सबसे पुराने काम कर रहे स्टीम इंजनों में से एक है।
रेलगाड़ी को गति के नज़रिये से देखेंतो इसको तीन घटकों में बाँट कर समझ सकते हैं। 
पहला घटक है रेल-पथ : भारत में  रेल पथ 80 से 200 कि.मी./घंटा तक की गति से गुजरने वाली रेलगाड़ी के लिए सक्षम हैपरन्तु अभी तक 200 कि.मी./घंटा की गति का स्वाद इसने नहीं चखा है। भारतीय रेलवे में रेल-पथ के तीन गेज हैं : नैरो गेजमीटर गेज एवं ब्रॉड गेज और वर्तमान में इन तीनों गेजों पर आप सवारी का आनंद उठा सकते हैं।   
दूसरा घटक है इंजन:  इसके विकास की गतिविधियों पर संक्षिप्त नज़र डालते हैं। 
डब्ल्यूपी क्लास लोकोमोटिव 110 कि.मी./घंटा की गति तक काम करने में सक्षम थे और आसानी से इनके शंकु के आकार की उभरी हुई नाक से पहचाना जा सकता थाजिसके ऊपर एक रजत रंग का तारा सुशोभित था। विवेकानंद” नामक  पहला डब्ल्यूपी इंजन सन् 1947 में संयुक्त राज्य अमेरिका में बाल्डविन लोकोमोटिव वर्क्स से आयात किया गया था। 

सन् 1949 में चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स कोभाप इंजनों का उत्पादन करने के लिए स्थापित किया गया था। देश की आज़ादी के बाद,  ब्रॉड गेज का पैसेंजर भाप इंजन 100 कि.मी./घंटा की गति से चल सकता था और मीटर गेज का भाप इंजन 75 कि.मी./घंटा की गति से ही चल सकता था। अतः इसकी गति सीमा बढाने के लिए डीजल इंजन एवं विद्युत इंजन की आवश्यकता पड़ी। भारतीय रेल ने लगभग सभी भाप इंजन को सन् 1990 तक डीज़ल इंजन में परिवर्तित कर दिया और मीटर गेज के भाप इंजन को अगस्त 1998 में  पूर्णतया बंद कर दिया गया। ब्रॉड गेज के शेर ए पंजाब’ नामक भाप इंजन ने अपनी अंतिम यात्रा 6 दिसम्बर 1995 को तय कर भाप इंजन के युग का अंत किया। चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स ने भाप और डीजल इंजनों का उत्पादन क्रमशः सन् 1973 और सन् 1994 में पूर्णतया बंद कर दिया।  
डीज़ल इंजन डब्लूडीएम-1 स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अमेरिका से आयात होने वाला पहला डीजल इंजन था। इसकी अधिकतम गति सीमा 110 कि.मी./घंटा और क्षमता 1950 हॉर्स पावर थी। डीजल रेल इंजन कारखानाबनारस की स्थापना अगस्त 1961 में हुई और जनवरी 1964 में डब्लूडीएम-2 का निर्माण कर राष्ट्र को समर्पित किया गया।  इसकी अधिकतम गति सीमा 120 कि.मी./घंटा और क्षमता 2,600 हॉर्स पावर थी। इसके बाद 1995  में डब्लूडीपी-1  का निर्माण किया गयाजिसकी अधिकतम गति सीमा 140 कि.मी./घंटा थी। सन् 2001 में डब्लूडीपी-4   का निर्माण किया गयाजिसकी अधिकतम गति सीमा 160 कि.मी./घंटा और क्षमता 4,000 हॉर्स पावर थी।भारत में विद्युत इंजन के इतिहास में डब्लूएएम-1 महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारत में अल्टरनेट करंट (AC) से चलने वाला पहला इंजन था। यह 30 नवंबर 1959 को भारत में लाया गया। सन् 1961 से विद्युत लोको और सन् 1980 में विद्युत यात्री लोको श्रृंखला डब्लूएपी-1  का निर्माण आरडीएसओ के विनिर्देशों पर  चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स  द्वारा  शुरू हुआ । डब्लूएपी-1 अधिकतम गति सीमा 130 कि.मी./घंटा और क्षमता 3,800 हॉर्स पावर थी। इस लोको को पहली बार हावड़ा-दिल्ली राजधानी के लिए इस्तेमाल किया गया था। जुलाई 1993 में 3 फ़ेज के तीस इंजन एबीबीस्विट्ज़रलैंड से खरीदने का करार हुआ। नवंबर 1998 में, डब्लूएजी-9  भारत में बनाया जाने वाला सबसे पहला  3-फेज़ एसी इलेक्ट्रिक लोको सीएलडब्ल्यू में निर्मित हुआ था। इसे "नवयुग" नाम दिया गया और नए युग और नई सहस्राब्दी की शुरुआत में सीएलडब्ल्यू ने भारत को डब्लूएपी -5 क्लास के "नवोदित" और "नवजागरण" नामक दो इलेक्ट्रिक इंजन उपहार स्वरुप दिये। डब्ल्यूएपी -7 आरडीएसओ और एडट्रान्ज़ के परामर्श से सीएलडब्ल्यू ने एक हैवी ड्यूटी यात्री इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव डिजाइन का विकास किया था और इस प्रोटोटाइप का नाम "नवकिरण" रखा गया था। डब्लूएपी 5 इंजन की अधिकतम गति सीमा 160 कि.मी./घंटा है। तीन फेज लोकोमोटिव का मुख्य पार्ट कर्षण कनवर्टर है, जो एकल फ़ेज को 3 फ़ेज में परिवर्तित करता है। हमलोग अभी जिटियो तकनीक आधारित कनवर्टर का इस्तेमाल करते हैं, जबकि उच्चगति के लिए आईजीबीटी तकनीक आधारित कनवर्टर चाहिए और इसके लिए जिटियो तकनीक आधारित कनवर्टर को आईजीबीटी तकनीक आधारित कनवर्टर में बदलने का कार्य चल रहा है। डब्लूएपी-5 इंजन को आईजीबीटी तकनीक से लैस कर देने से इसकी वर्तमान गति सीमा बढ़कर 200 कि.मी./घंटा तक की हो गई है।

भाप इंजन से बुलेट ट्रेन तक का भारतीय रेल का सफ़र ( भाग- 2 ) पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। 
  
-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

Wednesday, July 18, 2018

MEME SERIES - 11


Biweekly Edition (पाक्षिक संस्करण) 18 July'2018 to 31 July'2018

मीम (MEME)

"यह एक सैद्धांतिक इकाई है जो सांस्कृतिक विचारों, प्रतीकों या मान्यताओं आदि को लेखन, भाषण, रिवाजों या अन्य किसी अनुकरण योग्य विधा के माध्यम से एक मस्तिष्क से दूसरे मस्तिष्क में पहँचाने का काम करती है। "मीम" शब्द प्राचीन यूनानी शब्द μίμημα; मीमेमा का संक्षिप्त रूप है जिसका अर्थ हिन्दी में नकल करना या नकल उतारना होता है। इस शब्द को गढ़ने और पहली बार प्रयोग करने का श्रेय ब्रिटिश विकासवादी जीवविज्ञानी रिचर्ड डॉकिंस को जाता है जिन्होने 1976 में अपनी पुस्तक "द सेल्फिश जीन" (यह स्वार्थी जीन) में इसका प्रयोग किया था। इस शब्द को जीन शब्द को आधार बना कर गढ़ा गया था और इस शब्द को एक अवधारणा के रूप में प्रयोग कर उन्होने विचारों और सांस्कृतिक घटनाओं के प्रसार को विकासवादी सिद्धांतों के जरिए समझाने की कोशिश की थी। पुस्तक में मीम के उदाहरण के रूप में गीत, वाक्यांश, फैशन और मेहराब निर्माण की प्रौद्योगिकी इत्यादि शामिल है।"- विकिपीडिया से साभार.

MEME SERIES - 11

By looking at this picture you might be having certain reaction in your mind, through this express your reaction as the title or the  caption. The selected title or caption of few people will be published in the next MEME SERIES POST.

इस तस्वीर को देख कर आपके मन में अवश्य ही किसी भी प्रकार के प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई होगी, तो उसी को शीर्षक(TITLE) या अनुशीर्षक(CAPTION)के रूप में व्यक्त करें। चुने हुए शीर्षक(TITLE) या अनुशीर्षक(CAPTION)को अगले MEME SERIES POST में प्रकाशित की जाएगी।


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The next edition will be published on  AUGUST 1, 2018. If you have similar type of picture on your blog, leave a link of your post in my comments section. I will link your posts on my blog in the next edition. Thank you very much dear friends for all your valuable captions for MEME SERIES-10 . Your participation and thoughts are deeply appreciated by me. Some of the best captions are listed below.

अगला संस्करण 1 अगस्त , 2018 को प्रकाशित किया जाएगा। यदि आपके ब्लॉग पर इस तरह की कोई तस्वीर है, तो अपने पोस्ट का लिंक मेरी टिप्पणी अनुभाग में लिख दें। मैं अगले संस्करण में अपने ब्लॉग पर आपका पोस्ट लिंक कर दूंगा। मेरे प्रिय मित्रों, आपके सभी बहुमूल्य शीर्षक(TITLE) या अनुशीर्षक(CAPTION) के लिए धन्यवाद। MEME SERIES-10 के पोस्ट पर आपकी भागीदारी और विचारों ने मुझे बहुत प्रभावित किया, उनमें से कुछ बेहतरीन कैप्शन नीचे उल्लेखित हैं। 


MEME SERIES-10 के बेहतरीन कैप्शन
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ले ले गुब्बारा तेरा सपना उड़ेगा कुछ मेरा.....................................सुशील कुमार जोशी (SKJoshi)
saans bech kar pet bharne ko mazboor bachpan..............Pushpendra Dwivedi


Friday, July 13, 2018

FACE OF COMMON MAN - 4







-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"



Wednesday, July 11, 2018

फोटोग्राफी : पक्षी 58 (Photography : Bird 58 )


Photography: (dated 15 06 2018 06 :50 AM )

Place : Ranachatti, Uttarakhand, India

Green-backed tit

The green-backed tit is a species of bird in the family Paridae. It is found in Bangladesh, Bhutan, China, India, Laos, Burma, Nepal, Pakistan, Taiwan and Vietnam. This small bird with generally greenish-blue upper-parts, yellow underparts, black crown, white patch on the side of the head and also black band on the yellow breast and belly. Its double white-wing-bar differentiates it from Great Tit.

Scientific name:  Parus monticolus
Photographer   :  Rakesh kumar srivastava

रामगंगारा  पैरिडी पारिवार का एक पक्षी की प्रजाति है। यह बांग्लादेश, भूटान, चीन, भारत, लाओस, बर्मा, नेपाल, पाकिस्तान, ताइवान और वियतनाम में पाया जाता है। आम तौर पर हरे-नीले रंग के ऊपरी हिस्सों और पीले अंडरपार्ट्स, काले ताज और सिर के किनारे सफेद पैच, पीले स्तन और पेट पर काले बैंड वाला छोटा पक्षी है। । इसके डबल व्हाइट-विंग-बार इसको ग्रेट टिट से भिन्न करता है।

वैज्ञानिक नाम :  पारस मॉन्टिकोलस
फोटोग्राफर   :  राकेश कुमार श्रीवास्तव

अन्य भाषा में नाम:-


Assamese: ভদৰকলি; Bengali: বড় তিত; Gujarati: રાખોડી રામચકલી, રામચકલી; Hindi: रामगंगारा; Marathi: बल्गुली, टोपीवाला, रामगंगारा; Nepali: हरियो चिचिल्कोटे; Sanskrit: सट्वा, हरा बल्गुली; Tamil: சாம்பற் சிட்டு




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-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"