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Friday, August 14, 2020

बाल कथा : प्रकृति और जीवन

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अफ्रीकी और एशियाई हाथियों के बीच शारीरिक अंतर। 1. कान का आकार 2. माथे का आकार 3. TUSKS केवल कुछ एशियाई हाथियों के पास ही है 4. ट्रंक के छल्लों की संख्या  5. Toenail की संख्या  6. पूंछ का आकार 7. पीठ का आर्च / डिप (चित्र विकिपीडिया से सभार)
प्रकृति और जीवन

     विश्व के दो महाद्वीपों के कुछ हिस्सों में हाथियों का साम्राज्य है। एशिया महाद्वीप में ऍलिफ़स और उसके संतान मैक्सिमस, इन्डिकस और सुमात्रेनस का साम्राज्य है और अफ्रीका में लॉक्सोडॉण्टा और उसके संतान अफ़्रीकाना और साइक्लोटिस का।
     गर्मियों के दिन शुरू होने वाले थे। मैक्सिमस, इन्डिकस और सुमात्रेनस ने अपने पिता से कहा, “आपने एक बार कहा था कि हमलोगों को आप अपने बड़े भाई के देश घुमाने ले चलेंगे। तो क्यों न इन गर्मियों की छुट्टियों में हम सभी अफ्रीका चलें?”
     ऍलिफ़स ने कहा, “तो चलो! अगले महीने की एक तारीख को हमलोग अफ्रीका यात्रा पर चलेंगे, परन्तु अभी तुमलोगों की स्कूल में परीक्षा चल रही है, इसलिए तुमलोग पढ़ाई पर ध्यान दो।” और हिदायत देते हुए कहा कि परीक्षा के बाद ही यात्रा की तैयारी करनी है।
     बच्चों ने भी अपने पिता जी के कथनानुसार कार्य किया और परीक्षा के बाद अफ्रीका जाने की तैयारी शुरू कर दी। समान को जब बैग में भर कर तैयार कर लिया, तो तीनों उस बैग को ख़ुशी-ख़ुशी अपने पिता जी को दिखाने गए। कुल चार बैग देखकर उसके पिता जी बोले, “तुमलोग तीन हो तो चौथा बैग किसका है?”
   तीनों उत्साह में एक साथ बोले, “तीन छोटे बैग तो हमलोगों के हैं और सबसे बड़े बैग में सूंढ़ पर लगाने वाला एयर-फ़िल्टर मास्क और प्यूरिफाईड  कम्प्रेसड एयर के सिलिंडर हैं।”
     “अरे हाँ! मैं तुम्हें यह बताना तो भूल ही गया कि वहाँ, तुम्हारे इस चौथे बैग की जरूरत नहीं है, क्योंकि वहाँ का पर्यावरण बहुत स्वच्छ एवं स्वास्थ्य के लिए अच्छा है।”- उनके पिता जी ने कहा।
     बच्चों को यह सुनकर आश्चर्य हुआ और उन्होंने अपने पिता जी से पूछा, “क्या दुनिया में ऐसी भी कोई जगह है, जहाँ हवा और पानी बिना फ़िल्टर के इस्तेमाल में लाया जा सके।” 
     ऍलिफ़स ने बच्चों से मुस्कुराते हुए कहा, “अब तो तुमलोग वहाँ जा ही रहे हो तो देख लेना। वैसे भी कहावत है कि हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े-लिखे को फ़ारसी क्या।”
     बच्चे ख़ुशी-ख़ुशी अपने बड़े बैग को छोड़ कर अफ्रीका के लिए रवाना हो गए। हवाई यात्रा के दौरान बच्चे अफ्रीका के प्राकृतिक सौन्दर्य को देख मुग्ध हो रहे थे। दूध जैसी सफ़ेद बलखाती चौड़ी नदियाँ और हरे-भरे जंगल देख उन्हें लग रहा था कि वे किसी परियों के शहर में आ गए हैं। वे मन ही मन दुखी थे कि उनकी मातृभूमि में ऐसा प्राकृतिक नज़ारा क्यों नहीं है? और इसी बात की चर्चा उसने अपने पिता से की तो उन्होंने लंबी सांस लेते हुए कहा, “बच्चों! कभी हमलोगों की मातृभूमि पर भी इसी तरह का प्राकृतिक नज़ारा था, परन्तु हमारे पूर्वजों की प्रकृति के प्रति असंवेदनशीलता और हमारी विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति का शोषण इसका मुख्य वजह है। कई दशक पहले हमारी प्राकृतिक संपदा यहाँ से अधिक और मनोरम थी। कुछ दशक पहले यहाँ की स्थिति भी हमारे जैसी थी। मेरे यहाँ आने का एक कारण यह भी है कि इनलोगों के प्रयास एवं तकनीक को सीख कर, अपने यहाँ लागू कर अपनी प्राकृतिक संपदा को पुनर्जीवित कर पाऊं।” – इतना कह कर वे उदास हो गए।
     लम्बी यात्रा के बाद जब साउथ अफ्रीका की राजधानी केप टाउन में उनका हवाई जहाज लैंड किया तो उनके चाचा लॉक्सोडॉण्टा और उसके भाई अफ़्रीकाना और साइक्लोटिस ने शाही अंदाज में उनका स्वागत किया। घर पहुँचने पर उनका स्वागत नाना प्रकार के फलों से हुआ। उदर तृप्ति हो जाने के बाद बच्चे नदी में खेलने चले गए। बच्चे सूंढ़ में पानी भर कर एक दूसरे के ऊपर फेंकने लगे। नदी में सभी बच्चों ने खूब उछल-कूद मचाई। जब मैक्सिमस, इन्डिकस और सुमात्रेनस थक गए, तब वे नदी से निकलने लगे, तभी उनके चचेरे भाइयों ने उन्हें रोका और कहा, “नदी में हम मस्ती करने के बाद सूंढ़ में पानी भर कर जंगल जाते हैं और वहाँ के छोटे-छोटे पौधों को पानी देकर ही घर वापस जाते हैं। इस नियम का पालन यहाँ के छोटे बच्चों से लेकर बड़े-बुजुर्ग तक करते हैं। और जंगल से लौटते वक्त, जरूरत के अनुसार फलों को प्यार से ऐसे तोड़ते है, जिससे पेड़ को कोई नुकसान न हो।”
     पाँचों ख़ुशी-ख़ुशी जंगल गए, पौधों को पानी दिया और अपनी-अपनी पसंद का फल तोड़ कर घर वापस आ गए। रात का खाना खाने के बाद ऍलिफ़स और लॉक्सोडॉण्टा आपस में बात करने लगे। परिवार का हालचाल पूछने के बाद ऍलिफ़स ने कहा, “भैया! मैं यहाँ आपसे पर्यावरण को समृद्ध एवं स्वच्छ बनाने के लिए आपके द्वारा उपयोग में किए जाने वाली तकनीक के बारे में जानने आया हूँ।”
     लॉक्सोडॉण्टा ने कहा, “देखो छोटे! तकनीक अपनी जगह है, परन्तु उससे पहले जो तुम्हारे पास प्राकृतिक संपदा है उसके दुरूपयोग को रोकना है।”
     अभी दोनों भाइयों का वार्तालाप चल ही रहा था कि उनके बच्चे वहाँ आ गए। मैक्सिमस ने उत्सुकता से कहा, “बड़े पापा! आप सभी आकार में बड़े एवं शक्तिशाली कैसे हैं? और यहाँ का पर्यावरण, समृद्ध एवं स्वच्छ कैसे है? हमारे यहाँ तो नदी, नाले में बदल गई और हवा इतनी प्रदूषित है कि साँस लेने के लिए भी नाक में फ़िल्टर और साथ में ऑक्सीजन का सिलिंडर रखना पड़ता है।”
     लॉक्सोडॉण्टा ने कहा, “आओ बच्चो आओ! तुम्हारे पिता जी भी मुझ से यही सवाल पूछ रहे थे।” थोड़ी देर चुप रहने के बाद वे गंभीर हो कर बोले, “यहाँ का नज़ारा अभी जो तुमलोग देख रहे हो, वह कुछ दशक पहले ऐसा नहीं था। जिसके कारण हमने अपने एक भाई ‘मैमथ’ एवं एक बेटे ‘अडौरोरा’ की पीढ़ी को खो दिया और इसका मुख्य कारण था- प्राकृतिक संपदाओं का दुरूपयोग। वे लोग नदी का उपयोग स्नान, गर्मी से राहत पाने एवं प्यास बुझाने के लिए करते थे। यहाँ तक तो बात ठीक थी, परन्तु उस दौरान वे सूंढ़ में पानी भर कर आस-पास फेंक कर जल का दुरुयोग करते थे। जंगल में रहते हुए, वहाँ उत्पात मचाते थे। बे-वजह पेड़ों को तोड़ना, आवश्यकताओं से अधिक फलों को तोड़ कर उसे बर्बाद करना और विकास की अंधी दौड़ में प्राकृतिक संपदा के दोहन ने उनके अस्तित्व को मिटा दिया। उन्हीं से सबक लेते हुए, हमलोगों ने अपने दैनिक जीवन में प्रकृति के महत्व को समझते हुए उसकी देखभाल करनी शुरू की। ऐसे-ऐसे नियम बनाए जिससे पर्यावरण दूषित न हो और अधिक से अधिक पेड़ को सिंचित कर सकें। बरसात के पानी को सदुपयोग में लाने के लिए हमलोग रेन हार्वेस्टिंग तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। कार्बन फुटप्रिंट को कम किया। अन्य तकनीक की जानकारी मैं तुम्हारे पापा को दे दूँगा, अगर तुमलोग उनका सहयोग करोगे तो वह दिन दूर नहीं, जब हमलोग भी तुम्हारे घर आ कर अपने बच्चों के साथ छुट्टियाँ मनाएँगे।”
     ऍलिफ़स एक सप्ताह में सभी जानकारी इकठ्ठी कर बच्चों के साथ अपने देश लौट आया। उसने अपने समाज को पर्यावरण के प्रति जागरूक किया और इम्पोर्टेड तकनीक से पर्यावरण को संरक्षित एवं स्वच्छ बनाने लगा। उसके एवं बच्चों के अथक प्रयास से, दो दशक बाद उनके नाले जैसी नदी चौड़ी एवं स्वच्छ हो गई। जंगल में हरियाली छा गई और वह दिन भी आया, जब दो दशक बाद ऍलिफ़स के बच्चे बड़े होकर अपने बुजुर्ग बड़े पापा एवं अपने भाइयों का नई दिल्ली के एअरपोर्ट पर शाही अंदाज में इंतज़ार कर रहे थे।

(नोट- ऍलिफ़स, लॉक्सोडॉण्टा और मैमथ हाथियों की प्रजाति है। ऍलिफ़स की तीन जातियां मैक्सिमस, इन्डिकस और सुमात्रेनस तथा लॉक्सोडॉण्टा की तीन जातियां अडौरोरा, अफ़्रीकाना और और साइक्लोटिस हैं।)

-----समाप्त----

©  राकेश कुमार श्रीवास्तव 'राही'

Wednesday, July 25, 2018

भाप इंजन से बुलेट ट्रेन तक का भारतीय रेल का सफ़र ( भाग- 2 )

भाप इंजन से बुलेट ट्रेन तक का भारतीय रेल का सफ़र ( भाग- 2 )

पिछले भाग में आप मेरे साथ भारत में भाप इंजन से बुलेट ट्रेन तक के सफ़र पर थे ।  जिसमें रेलगाड़ी को गति के नज़रिये से तीन घटकों में बाँट कर मैं आपको समझा रहा था। आप अबतक इसके दो घटकों से परिचित हो चुके है जिसमें - पहला घटक था रेल-पथ एवं दूसरा घटक था इंजन। अब आपको तीसरे घटक से परिचय करा दें। 

भाप इंजन से बुलेट ट्रेन तक का भारतीय रेल का सफ़र ( भाग- 1 ) पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। 

तो, तीसरा घटक है बोगी एवं कोच : सन् 1955 के पहले लकड़ी के कोच बनते थे । उसके बाद तीन तरह के बोगी एवं कोच भारत में इस्तेमाल होते हैं, जिसमें सबसे पुराना है स्विस डिजाईन से निर्मित आई.सी.एफ. टाइप कोच एवं बोगी, जिसकी अधिकतम गति सीमा 130 कि.मी./घंटा है। यह  परंपरागत यात्री कोच हैं, जो कि भारत में अधिकांशतः मुख्य लाइन ट्रेनों पर इस्तेमाल होते हैं।  कोच एवं बोगी का डिजाइन 1950 के दशक में स्विस कार एंड एलेवेटर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी, स्लिएरेन, स्विटजरलैंड के सहयोग से इंटीग्रल कोच फैक्ट्री, पेरामबूर, चेन्नई, भारत द्वारा विकसित किया गया था। स्विस कंपनी के स्थान के आधार पर इस डिजाइन को स्लिएरेन डिजाइन भी कहा जाता है। अब इस परंपरागत यात्री कोच के युग का अंत जल्द ही होने वाला है। 

सवारी रेलगाड़ी के गति में बढ़ोतरी के लिए सन् 1990 के अंत में संयुक्त राष्ट्र संघ के सहायता कार्यक्रम के तत्वावधान में यूरोफिमा डिजाइन स्विट्जरलैंड पर आधारित आईआरवाई कोच एवं  आईआर 20 बोगी का निर्माण रेल डिब्बा कारखाना, कपूरथला में किया गया, जिसकी अधिकतम गति सीमा 140 कि.मी./घंटे की थी।  इसके बाद सन् 1995 से  लिंकई हॉफमैन बुश (एलएचबी) एवं फ़िएट द्वारा विकसित कोच एवं बोगी का निर्माण रेल डिब्बा कारखाना, कपूरथला में किया जाता है । इन डिब्बों को 160 कि.मी./घंटा तक की  ऑपरेटिंग गति के लिए डिज़ाइन किया गया है और इसकी गति 200 कि.मी./घंटा तक जा सकती है।

गति पर आधारित मुख्यतः भारत में चार प्रकार की ट्रेन चल रही हैं, पैसेंजर ट्रेन लगभग 40-80 कि.मी./घंटा की गति से चलती हैं। सुपर फास्ट एक्सप्रेस और मेल ट्रेन 100-110 कि.मी./घंटा तक की गति से चलती हैं। राजधानी और शताब्दी एक्सप्रेस जो क्रमशः सन् 1969 एवं सन् 1988 में नई दिल्ली को भारत की राज्य की राजधानियों से जोड़ने के लिए शुरू की गई थी, इसकी गति सीमा 130 कि.मी./घंटा है। जब हम गति की बात करते हैं, तो बुलेट ट्रेन की चर्चा होती है और जब आप मेट्टुपालयम(कोयंबटूर) - उदगमंडलम (ऊटी) यात्रा मेट्टुपालयम(कोयंबटूर) - उदगमंडलम पैसेंजर ट्रैन से 10 कि.मी./घंटा की औसत गति  से यात्रा करेंगे तो आप उस अविस्मरणीय एवं सुखद पल को भूल नहीं पाएंगे। अतः हम कह सकते हैं कि तकनीकी विकास के साथ-साथ भारतीय रेल अपनी विरासत को भी बखूबी संभाले हुए है।
अगर आप रेलवे की शाही सवारी कर भारत को करीब से जानना चाहते हैं, तो आप के लिए हैं,  भारत की सबसे शानदार ट्रेन : पैलेस ऑन व्हील्स, महाराजा एक्सप्रेस, गोल्डन चॅरियट, डेक्कन ओडिसी, रॉयल राजस्थान ऑन व्हील्स, महापरिनिर्वाण एक्सप्रेस, भारत दर्शन एवं स्टीम एक्सप्रेस और अगर आप  भारत के मशहूर पहाड़ी स्टेशनों जैसे दार्जिलिंग, शिमला, ऊटी और माथेरान आदि का रेल द्वारा दर्शन करना चाहते हैं तो भारतीय रेल का नैरो गेज की 4500 किलोमीटर लंबा ट्रैक आपके स्वागत में टॉय ट्रेनों के साथ हाज़िर है।   

सब-अर्बन ट्रेनों के लिए डीएमयू, डीएचएमयू, ईएमयू एवं एमईएमयू चलाई जाती है, जिसकी अधिकतम गति सीमा 80 किमी/घंटा होती है। अक्टूबर 1994 में पहली डीएमयू ट्रेन का निर्माण आई.सी.एफ., मद्रास में हुआ। पहली डीसी ईएमयू ट्रेन ने 3 फरवरी 1925 को मुंबई से कुर्ला तक का सफ़र तय किया। सन् 1957 में रेलवे ने विद्युतीकरण के लिए 25 केवी, 50 चक्र एकल फ़ेज एसी सिस्टम को अपनाने का निर्णय लिया। इसके बाद एसी ईएमयू ट्रेन का चलन प्रारंभ हुआ और साठ दशक के अंत में भारत हैवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड ने स्वदेशी ईएमयू ट्रेन बनाना शुरू कर दिया। ईएमयू ट्रेन की गति बढाने के लिए आई.सी.एफ. ने एमईएमयू ट्रेन का निर्माण सन् 1994 में किया।
कोलकाता, दिल्ली एवं मुंबई महानगरों में सड़क परिवहन के ऊपर बढ़ते दबाव को कम करने के लिए विभिन्न तरह की ट्रेन चलाई  गई । 24 अक्टूबर 1984  में कोलकाता मेट्रो ट्रेन चली जिसकी अधिकतम गति 55 किमी/घंटा है एवं 24 दिसंबर 2002 को दिल्ली मेट्रो ट्रेन चली जिसकी अधिकतम गति 80 किमी/घंटा है। मुंबई में मोनोरेल ने आंशिक रूप से 2 फरवरी 2014 में व्यावसायिक संचालन शुरू हुआ। अब भारत में मेट्रो ट्रेन छोटे-बड़े शहरों में काम कर रही है या परियोजनाओं को लागू करने का कार्य प्रगति पर है। मेट्रो ट्रेन भारतीय रेल का अंग नहीं है।    

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय रेलवे, ट्रेनों की गति बढ़ाने के लिए सतत  प्रयत्नशील रही है और भारत सरकार के विशेष अनुरोध पर सीमित साधनों में सेमी हाई-स्पीड ट्रेन तेजस का निर्माण कर भारतीयों के आँखों में बुलेट ट्रेन के सपने को पंख लगा दिए। अहमदाबाद, गुजरात और भारत के आर्थिक केंद्र मुंबई, महाराष्ट्र के शहरों को आपस में जोड़ने वाली एक उच्च-गति वाली रेल लाइन मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर का निर्माण प्रगति पर है। यह भारत की पहली उच्च गति वाली रेल लाइन होगी।

भारत में सबसे तेज 160 कि.मी./घंटा की गति से चलने वाली गतिमान एक्सप्रेस ट्रेन है, जो 5 अप्रैल 2016 को शुरू की गई।
तेजस एक्सप्रेस का उद्घाटन सीएसटी मुंबई से करमीली, गोवा तक 24 मई 2017 को हुआ । इसके डिब्बों एवं बोगी का निर्माण रेल कोच फैक्टरी, कपूरथला में किया जाता है। यह ट्रेन डब्ल्यूडीपी 3 ए इंजन की शक्ति से 130 कि.मी./घंटा की औसत गति से चलती है, लेकिन कुछ हिस्सों पर 180 कि.मी./घंटा की गति को छूने की अनुमति दी गई है।
10,000 कि.मी. की डायमंड चतुर्भुज (दिल्ली-मुंबई, मुंबई-चेन्नई, चेन्नई-कोलकाता और कोलकाता-दिल्ली) और दो विकर्ण (दिल्ली-चेन्नई और मुंबई-कोलकाता) देश के प्रमुख महानगर और विकास केंद्रों को जोड़ने के लिए, उच्च गति रेल कोरिडोर की परियोजना पर भी काम चल रहा है। इस परियोजना का लक्ष्य सन् 2020 में ट्रेन की वर्तमान गति 110-130 कि.मी./घंटा से बढ़ा कर 160-200 कि.मी./घंटा करने के लिए ट्रैक बनाने का है। भारत के कुछ हिस्सों में मौजूदा लाइनों को उन्नत कर 200 कि.मी./घंटा की गति तक के लिए  सुसज्जित किया गया है और अन्य बची हुई लाइनों को उन्नत करने का कार्य प्रगति पर है।    
अब हमारे कदम उच्च गति वाली बुलेट ट्रेन की तरफ बढ़ गए हैं। उच्च गति वाली रेल लाइन गलियारे का निर्माण कार्यक्रम के अनुसार 14 सितंबर 2017 को शुरू हुआ और पहली बुलेट ट्रेन 320 कि.मी,/घंटा की गति से 15 अगस्त 2022 को अपनी पहली दौड़ के लिए निर्धारित है। मेक इन इंडिया कार्यक्रम का समर्थन करने के लिए प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के साथ, शिंकानसेन ई-5  (बुलेट ट्रैन) तकनीक को सिखाने के लिए, जापान भारतीय रेल कर्मचारियों को प्रशिक्षण प्रदान करेगा। बेशक बुलेट ट्रेन की  प्रौद्योगिकी जापान की है परन्तु इसके  अधिकांश संसाधन स्वदेशी होंगे। 
मेरे इस कथन में कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि प्रौद्योगिकी का कोई भी युग हो, ये अपने समय- काल में देश, समाज एवं सभ्यता के विकास का इंजन बनते हैं, चाहे भाप इंजन का युग हो या अब बुलेट युग। अब वो दिन दूर नहीं जब आने वाली भारत की आज़ादी की हीरक जयंती प्रगति के बुलेट पर सवार होगी।        

विश्व पटल पर भारतीय रेलवे बहुत पिछड़ा हुआ है, परन्तु जापान ने बुलेट ट्रेन की प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कर एक नई आशा जगाई है। हम भारतीय उम्मीद कर सकते हैं कि जापानी तकनीक की सहायता से बुलेट ट्रेन के इतिहास में भारत नए आयाम स्थापित करेगा। जैसे 21 अप्रैल 2015 को जापान की मैग्लेव ट्रेन ने 603 किलोमीटर प्रति घंटा की गति प्राप्त कर विश्व रिकॉर्ड बनाया है, वैसे ही अत्याधुनिक चुंबकीय तकनीक मैग्नेटिक लेविटेशन से चलने वाली इस ट्रेन को सन् 2027 तक भारत में चलाने की योजना है। 

-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

Friday, July 20, 2018

भाप इंजन से बुलेट ट्रेन तक का भारतीय रेल का सफ़र ( भाग- 1 )


भाप इंजन से बुलेट ट्रेन तक का भारतीय रेल का सफ़र ( भाग- 1 )
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रेलगाड़ी भारतीयों के जीवन में इस तरह रची बसी है कि इसके बिना आम आदमी का जीवन मुश्किल है,  इसलिए भारत में रेल को हम जीवन रेखा के नाम से भी जानते है।   'अनेकता में एकता' का सबसे बड़ा उदाहरण भारतीय रेल ही है। तो आइए! आपको ले चलते हैं, भारत में भाप इंजन से बुलेट ट्रेन तक के सफ़र पर।   

भारतीय रेल की परिकल्पना सर्वप्रथम लॉर्ड डलहौज़ी ने सन् 1843 में की थी।  सोलानी जलसेतु, रुड़की के निर्माण के दौरान,  22 दिसंबर 1851 में भाप इंजन का इस्तेमाल कर भारत में एक नए युग की शुरुआत हुई । परन्तु भारतीय रेलवे का प्रथम भाप इंजन "फ़ॉकलैंड" नामक इंजन था, जिसका उपयोग शंटिंग के लिए किया गया। यह इंजन 18 फरवरी 1852 को मुम्बई आया और  मुम्बई के गवर्नर के नाम पर ही इसे  "फ़ॉकलैंड" का नाम दिया गया था। भारतीय रेल की सार्वजनिक परिवहन की परिकल्पना तब साकार हुई, जब सन् 1853  में आठ (2-4-0 प्रकार के) भाप इंजनों को भारतीय रेल-पथ पर उतारा गया और इन्हीं में से साहब, सिंध और सुलतान नामक तीन इंजनों ने शाही अंदाज में 21 तोपों की सलामी लेकर 14 डिब्बों और 400 सवारी को लगभग 40 कि.मी./घंटा  की रफ़्तार से मुम्बई के उपनगर बोरीबंदर से ठाणे तक का सफर 16 अप्रैल 1853 को दोपहर 3:35 बजे पर चल कर 4:32 बजे पूरा किया। भारत में  ब्रॉड गेज का फेयरी क्वीन इंजन (2-2-2डब्लूटीडब्लूटी) दुनिया में सबसे पुराने काम कर रहे स्टीम इंजनों में से एक है।
रेलगाड़ी को गति के नज़रिये से देखें, तो इसको तीन घटकों में बाँट कर समझ सकते हैं। 
पहला घटक है रेल-पथ : भारत में  रेल पथ 80 से 200 कि.मी./घंटा तक की गति से गुजरने वाली रेलगाड़ी के लिए सक्षम है, परन्तु अभी तक 200 कि.मी./घंटा की गति का स्वाद इसने नहीं चखा है। भारतीय रेलवे में रेल-पथ के तीन गेज हैं : नैरो गेज, मीटर गेज एवं ब्रॉड गेज और वर्तमान में इन तीनों गेजों पर आप सवारी का आनंद उठा सकते हैं।   
दूसरा घटक है इंजन:  इसके विकास की गतिविधियों पर संक्षिप्त नज़र डालते हैं। 
डब्ल्यूपी क्लास लोकोमोटिव 110 कि.मी./घंटा की गति तक काम करने में सक्षम थे और आसानी से इनके शंकु के आकार की उभरी हुई नाक से पहचाना जा सकता था, जिसके ऊपर एक रजत रंग का तारा सुशोभित था। “विवेकानंद” नामक  पहला डब्ल्यूपी इंजन सन् 1947 में संयुक्त राज्य अमेरिका में बाल्डविन लोकोमोटिव वर्क्स से आयात किया गया था। 

सन् 1949 में चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स को, भाप इंजनों का उत्पादन करने के लिए स्थापित किया गया था। देश की आज़ादी के बाद,  ब्रॉड गेज का पैसेंजर भाप इंजन 100 कि.मी./घंटा की गति से चल सकता था और मीटर गेज का भाप इंजन 75 कि.मी./घंटा की गति से ही चल सकता था। अतः इसकी गति सीमा बढाने के लिए डीजल इंजन एवं विद्युत इंजन की आवश्यकता पड़ी। भारतीय रेल ने लगभग सभी भाप इंजन को सन् 1990 तक डीज़ल इंजन में परिवर्तित कर दिया और मीटर गेज के भाप इंजन को अगस्त 1998 में  पूर्णतया बंद कर दिया गया। ब्रॉड गेज के ‘शेर ए पंजाब’ नामक भाप इंजन ने अपनी अंतिम यात्रा 6 दिसम्बर 1995 को तय कर भाप इंजन के युग का अंत किया। चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स ने भाप और डीजल इंजनों का उत्पादन क्रमशः सन् 1973 और सन् 1994 में पूर्णतया बंद कर दिया।  
डीज़ल इंजन डब्लूडीएम-1 स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अमेरिका से आयात होने वाला पहला डीजल इंजन था। इसकी अधिकतम गति सीमा 110 कि.मी./घंटा और क्षमता 1950 हॉर्स पावर थी। डीजल रेल इंजन कारखाना, बनारस की स्थापना अगस्त 1961 में हुई और जनवरी 1964 में डब्लूडीएम-2 का निर्माण कर राष्ट्र को समर्पित किया गया।  इसकी अधिकतम गति सीमा 120 कि.मी./घंटा और क्षमता 2,600 हॉर्स पावर थी। इसके बाद 1995  में डब्लूडीपी-1  का निर्माण किया गया, जिसकी अधिकतम गति सीमा 140 कि.मी./घंटा थी। सन् 2001 में डब्लूडीपी-4   का निर्माण किया गया, जिसकी अधिकतम गति सीमा 160 कि.मी./घंटा और क्षमता 4,000 हॉर्स पावर थी।भारत में विद्युत इंजन के इतिहास में डब्लूएएम-1 महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारत में अल्टरनेट करंट (AC) से चलने वाला पहला इंजन था। यह 30 नवंबर 1959 को भारत में लाया गया। सन् 1961 से विद्युत लोको और सन् 1980 में विद्युत यात्री लोको श्रृंखला डब्लूएपी-1  का निर्माण आरडीएसओ के विनिर्देशों पर  चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स  द्वारा  शुरू हुआ । डब्लूएपी-1 अधिकतम गति सीमा 130 कि.मी./घंटा और क्षमता 3,800 हॉर्स पावर थी। इस लोको को पहली बार हावड़ा-दिल्ली राजधानी के लिए इस्तेमाल किया गया था। जुलाई 1993 में 3 फ़ेज के तीस इंजन एबीबी, स्विट्ज़रलैंड से खरीदने का करार हुआ। नवंबर 1998 में, डब्लूएजी-9  भारत में बनाया जाने वाला सबसे पहला  3-फेज़ एसी इलेक्ट्रिक लोको सीएलडब्ल्यू में निर्मित हुआ था। इसे "नवयुग" नाम दिया गया और नए युग और नई सहस्राब्दी की शुरुआत में सीएलडब्ल्यू ने भारत को डब्लूएपी -5 क्लास के "नवोदित" और "नवजागरण" नामक दो इलेक्ट्रिक इंजन उपहार स्वरुप दिये। डब्ल्यूएपी -7 आरडीएसओ और एडट्रान्ज़ के परामर्श से सीएलडब्ल्यू ने एक हैवी ड्यूटी यात्री इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव डिजाइन का विकास किया था और इस प्रोटोटाइप का नाम "नवकिरण" रखा गया था। डब्लूएपी 5 इंजन की अधिकतम गति सीमा 160 कि.मी./घंटा है। तीन फेज लोकोमोटिव का मुख्य पार्ट कर्षण कनवर्टर है, जो एकल फ़ेज को 3 फ़ेज में परिवर्तित करता है। हमलोग अभी जिटियो तकनीक आधारित कनवर्टर का इस्तेमाल करते हैं, जबकि उच्चगति के लिए आईजीबीटी तकनीक आधारित कनवर्टर चाहिए और इसके लिए जिटियो तकनीक आधारित कनवर्टर को आईजीबीटी तकनीक आधारित कनवर्टर में बदलने का कार्य चल रहा है। डब्लूएपी-5 इंजन को आईजीबीटी तकनीक से लैस कर देने से इसकी वर्तमान गति सीमा बढ़कर 200 कि.मी./घंटा तक की हो गई है।

भाप इंजन से बुलेट ट्रेन तक का भारतीय रेल का सफ़र ( भाग- 2 ) पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। 
  
-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"