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Wednesday, February 1, 2017

श्रम एवं परिश्रम












 

श्रम एवं परिश्रम 

माँ ! मुझको तो आसमान में चाँद, गेंद जैसा दिखता है,
फिर क्यूँ ? रामू काका को यही चाँद, रोटी सा दिखता है।

माँ ! मुझको तो केवल, साफ़-सुथरा कपड़ा ही अच्छा लगता है,
फिर क्यूँ ? उनको  सिर्फ मैला व कुचैला कपड़ा अच्छा लगता है।

बेटा ! परिश्रम और श्रम करने में बहुत अंतर होता है,
साक्षर हो कर मेहनत करे जो वो सदा सुखी होता है।

बेटा ! श्रम करने वाले को केवल गेहूँ ही मिलता है,
परिश्रम करने वाले को गेहूँ और गुलाब मिलता है।

सरस्वती माँ की जो आराधना तन व मन से करता है,
विद्या पाकर वही  मानव सुखी जीवन-यापन  करता है।

माँ ! मैं तो रामू काका को लिखना पढ़ना सिखाऊंगा,
अज्ञानता का अँधेरा उनके जीवन से मिटाऊंगा।

श्रम किए बगैर किसी का  जीवन को जीना ही मुश्किल है,
किन्तु परिश्रम करने वालों का ही भविष्य भी उज्ज्वल है।



नोट-श्रम का तात्पर्य शारीरिक श्रम से होता है
        परिश्रम का तात्पर्य जिसमे शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार का श्रम से होता है

        गेहूँ हम खाते हैं, गुलाब सूँघते हैं। एक से शरीर की पुष्टि होती है, दूसरे से मानस तृप्‍त होता है।- "रामवृक्ष बेनीपुरी "

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"



1 comment:

  1. श्रम और परिश्रम के भेद स्पष्टीकरण के लिए आपने साथ में इस कविता संजोकर इसमें चार चाँद लगा दिए😊

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मेरे पोस्ट के प्रति आपकी राय मेरे लिए अनमोल है, टिप्पणी अवश्य करें!- आपका राकेश श्रीवास्तव 'राही'