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Monday, April 11, 2022

कस्तूरबा गाँधी


कस्तूरबा गाँधी -जन्म 11 April 1869
(रचनात्मक परिवर्तनों की नेता और पोषणकर्ता)

कस्तूरबा थी नारी एक महान,
उन्होंने बनाई अपनी पहचान,
साज-श्रृंगार को छोड़ा था उसने,
अपने जीवन के उद्देश्य को जान। 
पहले थी वह एक नारी निरक्षर,
लगन और मेहनत से बनी साक्षर 
आजादी की पहली अलख जगी तब,  
नारी आवाज की बनी हस्ताक्षर। 
गाँधी जी ने जो देखे थे सपने,
बा ने उसको बना लिए थे अपने,
गाँधी जी को पग-पग साथ दिया था,
लगीं स्वतंत्रता की माला जपने। 
खुद को बदलना, ना होता आसान,
बा बदली, परिस्थितियों को पहचान,
जीवन बदली, रंग-ढ़ंग भी  बदला,
तब मोहनदास गाँधी बने महान। 
©  राकेश कुमार श्रीवास्तव 'राही'

Friday, March 8, 2019

नारी - हिम्मत कर हुंकार तू भर ले



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#नारी - हिम्मत कर हुंकार तू भर ले#

नारी के हालात नहीं बदले,
हालात अभी, जैसे थे पहले,
द्रौपदी अहिल्या या हो सीता,
इन सब की चीत्कार तू सुन ले। 

राम-कृष्ण अब ना आने वाले,
अपनी रक्षा अब खुद तू कर ले,
सतयुग, त्रेता, द्वापर युग बीता,
कलयुग में अपना रूप बदल ले।

लक्ष्य कठिन है, फिर भी तू चुन ले,
मंजिल अपनी अब तू तय कर ले,
अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ,
अपना जीवन तू जी भर जी ले। 

जो भी हैं अबला कहने वाले,
हक़ यूँ नहीं तुम्हें देने वाले,
उनसे क्या आशा रखना जिसने,
मुँह से छीन ली तेरे निवाले। 

बेड़ियाँ हैं अब टूटने वाली,
मुक्ति-मार्ग सभी तेरे हवाले,
लक्ष्मी, इंदरा, कल्पना जैसी,
दम लगा कर हुंकार तू भर ले।

-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"




Friday, February 8, 2019

मेरे तो करतार हैं।


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"मेरे तो करतार हैं।"

अब जुबाँ, पर है, सिर्फ, एक नाम तेरा
और मेरे, दिल में, है तस्वीर तेरी,
अब तू, भी, नहीं है, इस, नश्वर जगत में,
पर अक्सर, दिखते हो, नज़रों को मेरी। 

खोया, रहता हूँ, मैंख्यालों में तेरे,
बरसती है अक्सर, फैज़, मुझ पर तेरी
तेरे बिन, अब तो, मैं, जी ना पाऊँगा,
मेरी धड़कने, हो गई, अब तो तेरी। 

मैं तो, अधम था, तभी, मिला साथ तेरा,
तू ना होता, तो, क्या, गत होती मेरी,
इस नाचीज राहीको, जानते हैं सब
और, कुछ भी नहीं, बस, रहमत है तेरी। 

अक्सर, मदद, के लिए, बढ़ा हाथ तेरा,
देखा है करिश्मा , मैंने भी तेरा,
वास्ता, जिसका ना था, कभी भी तुमसे
वो, क्या जानता, क्या, शख्सियत थी तेरी। 

हम सब, बैठे हैं, अब ख्यालों में तेरे,
मेरी आँखों, में बस, मूरत है तेरी,
तू ही, महबूब हो, हो, करतार मेरे,
 इन नैनों को है, अब चाहत, बस तेरी।


अब जुबाँ, पर हैसिर्फ, एक नाम तेरा
और मेरे, दिल में, है तस्वीर तेरी

-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"




Friday, January 4, 2019

वक़्त


वक़्त
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"वक़्त"  

वक़्त तो गुजरने के लिए होता है,
वक़्त ही ख़ुशी-गम का सबब  होता है.

वक़्त एक सा होता है इस शहर में,
उसी पल मातम कहीं जश्न होता है.

अपने आप पर गुरुर ना कर ऐ दोस्त,
एक वक़्त, राजा भी यहाँ रोता है.

मुक़द्दर देगा तेरे दर पर दस्तक,
वक़्त है कर्म का और तू सोता है.

वक़्त खुद ही रंग दिखाएगा इक दिन,
तू सब्र कर, होने दे जो होता है. 

वक़्त आ गया है जब बीज बोने का,
तू सुनहरे मौके को क्यूँ खोता है.

वक़्त की जो कद्र नहीं करते "राही",
वो अपनी किस्मत पर सदा रोता है.

-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"




Wednesday, October 31, 2018

सतर्कता-जागरूकता मिशन


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"सतर्कता-जागरूकता मिशन" 

सब हो जाए ईमानदार और, रहूँ मैं भ्रष्टाचारी
भ्रष्टाचार मुक्त समाज बने कैसे, यही है लाचारी

नैतिकता का हुआ पतन, सब बन बैठे है भ्रष्टाचारी
भ्रष्टाचार मुक्त समाज बने कैसे, यही है लाचारी

सब सुधर जाएँ पर मैं ही, करूँ बस अपनी ही मनमानी
भ्रष्टाचार मुक्त समाज बने कैसे, यही है लाचारी

हम सब शपथ लें और ख़त्म करे, बस अपनी ये लाचारी
अपनाएं सार्वजनिक जीवन में, हम सभी ईमानदारी

पारदर्शिता-जवाबदेही को अब अपना कर्म बनाएं
सतर्कता-जागरूकता में हो जनता की भागीदारी.

रिश्वत लेने-देने की रोग को, मिलकर हम सब  मिटाएँ
सतर्कता-जागरूकता मिशन को, हम सभी सफल बनाएं. 

-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

एक नागरिक के रूप में उपरोक्त सत्यनिष्ठा प्रतिज्ञा प्रमाण पत्र आप भी प्राप्त कर सकते हैं। 
यहाँ क्लिक करें। 



Friday, June 29, 2018

अतृप्त


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अतृप्त 

बादल, ख्वाहिशों का,
चाहत अब तक की, 
उसको, तुमसे मिलने से पहले 
टाँग आई मैं,
पहाड़ की चोटी पर,
इस आस के साथ कि
तुम्हारे प्यार की ऊष्मा में,
संघनित हो,
मेरी ख्वाहिशों के बादल,
मेरे दामन को खुशियों से भर देंगे,
पर ऐसा अभी तक न हुआ। 

कल्पनाओं की उड़ान भर,
अक्सर मैं देख आती हूँ  उस बादल को,
जो अभी भी सुरक्षित टँगा है  
जिसमें मेरी ख्वाहिशें,
अब भी सुरक्षित हैं,
ठोस अवस्था में,
मृत शरीर सा शांत एवं ठंडा।

और आज मैं क्या देख रही हूँ,
कोई पहाड़ की चोटी को हिला रहा है,
अपनी गर्म साँसों से,
मेरी ख्वाहिशों के बादल को,
बहा कर ले जाना चाहता है,
और टाँगना चाहता है 
अपनी इच्छाओं की चोटी  पर। 

नहीं चाहता वो मुझ से कुछ भी,
केवल चाहता है  संघनित करना 
मेरी ख्वाहिशों के बादल को 
और भरना चाहता है,
मेरा दामन खुशियों से,
पर तुम्हें यह भी मंजूर नहीं।



अतृप्त (Ungratified )            : जिसका मन न भरा हो।; जिसकी कामना या भूख अभी तक बनी हो।
संघनित करना(CONDENSE):  द्रवीकरण होना

-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"


Friday, May 11, 2018

त्रिवेणी - यही दस्तूर है जीवन का




त्रिवेणी - यही दस्तूर है जीवन का-1 

1. 
जो मैंने चाहा ना मिला तो क्या हुआ,
जो तुमने चाहा मिल गया तो क्या हुआ,

नई चाह है अब हम दोनों के पास, यही दस्तूर है जीवन का। 

2.  
फूल खिलने पर तुम खुश होते हो,
उसके मुरझाने पर तुम रोते हो,

कुछ भी करो बस चलते रहो , यही दस्तूर है जीवन का। 

 3. 
जिसे तुम चाहोगे शायद ना मिले,
बिन माँगे तुमको बहुत कुछ मिला,

चुपचाप कर्म करो अपना, यही दस्तूर है जीवन का। 

4.  
जब प्राण संकट में पड़ जाते हैं,
भौतिक सम्पदा काम नहीं आती है.

मुक्ति मिलते ही फिर भागते हो, यही दस्तूर है जीवन का। 

5.  
नैतिकता नहीं है अब तुम में,
फिर भी ढूंढते हो तुम औरों में,


जो बोया है वही काटोगे, यही दस्तूर है जीवन का।

-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

Friday, May 4, 2018

ना समझो नादान हमें

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ना समझो नादान हमें

ना समझो नादान हमें,
हम नए युग के बच्चे हैं। 

है कठिन मंजिल अपनी,
समस्या को तो आना है,
समस्याओं को सुलझाकर,
आगे बढ़ते जाना है। 
ना समझो नादान हमें,
हम नए युग के बच्चे हैं। 

विकास-पथ पर निकले हम,
आगे बढ़ते जाना है,
रक्षा करें पर्यावरण की,
यह भी प्रण उठाना है। 
ना समझो नादान हमें,
हम नए युग के बच्चे हैं। 

सभी धर्मों के लोग यहाँ,
मिलजुल कर यूँ रहना है    
बस प्यार हो आपस में,
नया समाज बनाना है। 
ना समझो नादान हमें,
हम नए युग के बच्चे हैं। 

निरक्षरता ना रहे यहाँ,
यह अभिशाप मिटाना है,
साक्षर हो यहाँ हम सभी,
यह जागृति जगाना है। 
ना समझो नादान हमें,
हम नए युग के बच्चे हैं। 

सूचना “औ” तकनीक की 
लहरों पर सवार है हम,
हर मुश्किल को पार करें,
हम में है अब इतना दम। 
ना समझो नादान हमें,
हम नए युग के बच्चे हैं। 
  
हम ऐसा काम करेंगे,
दुनिया करे हमें सलाम,
हर क्षेत्र विकसित  होगा,
चमकेगा भारत का नाम। 
ना समझो नादान हमें,
हम नए युग के बच्चे हैं। 

हम सब की अभिलाषा है,
मिले भारत को शोहरत,
विश्व फिर से पुकार उठे,  
सोने की चिड़िया “भारत” 
ना समझो नादान हमें,
हम नए युग के बच्चे हैं। 
-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"



Friday, April 6, 2018

दंगा




      दंगा
                   
शासन करना हो जनता पर,
सजा लो राजनीति का समर.
तुम को हित साधना हो अगर,
तो, तुम सदा ही विष-वमन कर.

मतलब रखो अपने ताज़ से,
अपनी चाल पर विश्वास कर.   
सभी तैयार हैं मरने को,
तुम उनमें एक उन्माद भर.

किसी के उपदेश सुनकर भी  
नहीं रेंगती जूं कानों पर.
ये सभी तेरी ही सुनेंगे,
बस यूँ ही सदा, विष-वमन कर.

सभी के मसीहा तुम बन कर,
हाथ रखो तुम दुखती रग पर,  
जनता को तुम मिलकर बाँटो,
धर्मों-जातियों के नाम पर.

तुम जो कह दो जां भी दे दें,
दंगा करें बस इशारे पर.  
ये तो यकीं करेंगे भैया
कोरी फैली अफवाहों पर.

इस देश का भाग्य टिका है,   
इन चोरों और गद्दारों पर.
कैसे देश महान बनेगा,
भारत बन्द के नारों पर.

निज स्वार्थ से ऊपर उठ कर,
जनकल्याण का कार्य करें.
आओ इनको सबक सिखाएं,
वोट देंगे हम पहचान कर.
  
आओ आज संकल्प उठाए,
धर्म-जाति का भेद मिटाए,
न देश का नुकसान करेंगे,
कभी इन दंगों के नाम पर. 
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-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"  

Friday, March 30, 2018

"इल्तिजा-ए-मुसाफ़िर"








"इल्तिजा-ए-मुसाफ़िर"

मुझको न हमज़बां, न  हमउमर चाहिए, 
मुझको  इक हमनवा, हमसफ़र चाहिए।

हुस्न-ए-मल्लिका से सजा बाज़ार है,
इक हमदम मुझे,  शामो-सहर चाहिए।

मेरी हिमाक़तों को तुम कुफ्र कह दो,
ख़ुदा तुम सा ही मुझको, मगर चाहिए।

इस भीड़ में निहायत अकेला हूँ मैं,
तेरे दामन में, मुझे बसर चाहिए।

जहाँ तेरे सिवा न रहता हो कोई, 
मुझको ऐसा ही एक शहर चाहिए।

तेरे दर पर अब, मैं सजदा करने लगा, 
अब मुझे, इनायत भरी नज़र चाहिए।

भटकता हुआ, अकेला "राही" हूँ मैं  
मुझको बस,  तुम जैसा रहबर चाहिए।
इल्तिजा-ए-मुसाफ़िर=राही की प्रार्थना;विनय;निवेदन 
हमज़बां=जिनकी ज़बान या भाषा एक जैसी हो
हमउमर=जिनकी उम्र एक जैसी हो
हमनवा=जिनकी सोच एक जैसी ही
हमसफ़र=जो सफर में एक साथ हो
हुस्न-ए-मल्लिका=सुंदरता की रानी
हमदम=दोस्त 
शामो-सहर=हर समय 
हिमाक़तों= बेवकूफ़ियों
कुफ्र=अधर्मता 
बसर= गुज़र; निर्वाह;जीवनयापन।
इनायत=कृपा
रहबर= मार्गदर्शक




Wednesday, March 21, 2018

मेरी कविता




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                 मेरी कविता

शब्दों में सब की भावनाओं को, जब मैं ढाल पाता हूँ,
तब मैं अपनी कविता को, कोरे कागज़ पर लिख पाता हूँ.

आपके सुख और दुःख को, जब मैं शिद्दत से महसूस करूँ,
सब की हँसी और आँसू को, जब भी मैं  स्वयं महसूस करूँ,
या पल ऐसा हो, जो मेरी अंतरात्मा पर भी चोट करे
तब भावनाओं के रंगों से, मैं कविता की रचना करूँ.

मेरी कविता अश्रु  बहाती , जब मैं मज़लूमों को देखूँ ,
मेरी कविता हँसने लगती, जब हँसते बच्चों को देखूँ ,
मैं कविता के प्रत्येक शब्द के साथ जीता व मरता हूँ
मैं कविता तब लिखता हूँ , जब मैं दर्द या ख़ुशी को देखूँ .

प्रकृति की छटा निराली देख, मानव हर्षित हो जाता है,
नील गगन में उड़ते पक्षी  और फूल जब खिल जाता है,
मेरी कविता  इस  अनुभूति से कैसे दूर रह सकती है  
कहो कौन है, जो इसे  देख, अभिभूत नहीं हो जाता है.

मानव निर्मित  कृतियों को देख कर मैं अचंभित होता हूँ,
इसके विनाशकारी कृत्यों को, कहाँ भूल मैं पाता हूँ ,
भूत-वर्तमान में घटित कर्मों के अवलोकन से उपजे
हर्ष-विषाद के इस रंग को अपनी कविता में लिखता हूँ .

मैं ना कहता मेरी कविता समाज को राह दिखाएगी,
मैं नहीं कहता मेरी कविता  ज्ञान की ज्योति जलाएगी,
आशा है, जब कभी, आप मेरी कविताओं को पढ़ लेंगे
मेरी कविता की पंक्तियाँ, सोई संवेदना जगाएँगी.  

-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"




Friday, March 16, 2018

बे-वफ़ा









बे-वफ़ा 


मेरा आसमां, तेरे लिए,   
ये मेरी दुआ, तेरे लिए, 
मेरी चाहतें औ'  जुस्तुजू-2
ये इश्क भी, तेरे लिए।  

मेरी जान है, तेरे लिए, 
ये ईमान भी, तेरे लिए,  
हर शै में तुमको ही देखूँ -2
ये नज़र भी है, तेरे लिए। 

साया गम का, तुम पर, न पड़े, 
आँखों से आँसू भी न गिरे,
तू खुश रहे यूँ ही सदा-2
दामन ख़ुशी से  तेरा भरे।    

तुमसे कभी न मिल पाऊंगा,
तेरे बिना जी न पाऊंगा,
जानता हूँ, बेवफा है तू -2
सिला तुम से न ले पाऊंगा। 

यकीं से कहता हूँ, सुन ले तू,
याद किया गर, मुझ को तू , 
हिचकी ले ले, मर जाऊँगा-2
अब न याद करना, दिल से तू। 

मेरी स्वरचित कविता का स-स्वर आनंद लें और अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें.

 












-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"