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Friday, August 14, 2020

बाल कथा : प्रकृति और जीवन

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अफ्रीकी और एशियाई हाथियों के बीच शारीरिक अंतर। 1. कान का आकार 2. माथे का आकार 3. TUSKS केवल कुछ एशियाई हाथियों के पास ही है 4. ट्रंक के छल्लों की संख्या  5. Toenail की संख्या  6. पूंछ का आकार 7. पीठ का आर्च / डिप (चित्र विकिपीडिया से सभार)
प्रकृति और जीवन

     विश्व के दो महाद्वीपों के कुछ हिस्सों में हाथियों का साम्राज्य है। एशिया महाद्वीप में ऍलिफ़स और उसके संतान मैक्सिमस, इन्डिकस और सुमात्रेनस का साम्राज्य है और अफ्रीका में लॉक्सोडॉण्टा और उसके संतान अफ़्रीकाना और साइक्लोटिस का।
     गर्मियों के दिन शुरू होने वाले थे। मैक्सिमस, इन्डिकस और सुमात्रेनस ने अपने पिता से कहा, “आपने एक बार कहा था कि हमलोगों को आप अपने बड़े भाई के देश घुमाने ले चलेंगे। तो क्यों न इन गर्मियों की छुट्टियों में हम सभी अफ्रीका चलें?”
     ऍलिफ़स ने कहा, “तो चलो! अगले महीने की एक तारीख को हमलोग अफ्रीका यात्रा पर चलेंगे, परन्तु अभी तुमलोगों की स्कूल में परीक्षा चल रही है, इसलिए तुमलोग पढ़ाई पर ध्यान दो।” और हिदायत देते हुए कहा कि परीक्षा के बाद ही यात्रा की तैयारी करनी है।
     बच्चों ने भी अपने पिता जी के कथनानुसार कार्य किया और परीक्षा के बाद अफ्रीका जाने की तैयारी शुरू कर दी। समान को जब बैग में भर कर तैयार कर लिया, तो तीनों उस बैग को ख़ुशी-ख़ुशी अपने पिता जी को दिखाने गए। कुल चार बैग देखकर उसके पिता जी बोले, “तुमलोग तीन हो तो चौथा बैग किसका है?”
   तीनों उत्साह में एक साथ बोले, “तीन छोटे बैग तो हमलोगों के हैं और सबसे बड़े बैग में सूंढ़ पर लगाने वाला एयर-फ़िल्टर मास्क और प्यूरिफाईड  कम्प्रेसड एयर के सिलिंडर हैं।”
     “अरे हाँ! मैं तुम्हें यह बताना तो भूल ही गया कि वहाँ, तुम्हारे इस चौथे बैग की जरूरत नहीं है, क्योंकि वहाँ का पर्यावरण बहुत स्वच्छ एवं स्वास्थ्य के लिए अच्छा है।”- उनके पिता जी ने कहा।
     बच्चों को यह सुनकर आश्चर्य हुआ और उन्होंने अपने पिता जी से पूछा, “क्या दुनिया में ऐसी भी कोई जगह है, जहाँ हवा और पानी बिना फ़िल्टर के इस्तेमाल में लाया जा सके।” 
     ऍलिफ़स ने बच्चों से मुस्कुराते हुए कहा, “अब तो तुमलोग वहाँ जा ही रहे हो तो देख लेना। वैसे भी कहावत है कि हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े-लिखे को फ़ारसी क्या।”
     बच्चे ख़ुशी-ख़ुशी अपने बड़े बैग को छोड़ कर अफ्रीका के लिए रवाना हो गए। हवाई यात्रा के दौरान बच्चे अफ्रीका के प्राकृतिक सौन्दर्य को देख मुग्ध हो रहे थे। दूध जैसी सफ़ेद बलखाती चौड़ी नदियाँ और हरे-भरे जंगल देख उन्हें लग रहा था कि वे किसी परियों के शहर में आ गए हैं। वे मन ही मन दुखी थे कि उनकी मातृभूमि में ऐसा प्राकृतिक नज़ारा क्यों नहीं है? और इसी बात की चर्चा उसने अपने पिता से की तो उन्होंने लंबी सांस लेते हुए कहा, “बच्चों! कभी हमलोगों की मातृभूमि पर भी इसी तरह का प्राकृतिक नज़ारा था, परन्तु हमारे पूर्वजों की प्रकृति के प्रति असंवेदनशीलता और हमारी विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति का शोषण इसका मुख्य वजह है। कई दशक पहले हमारी प्राकृतिक संपदा यहाँ से अधिक और मनोरम थी। कुछ दशक पहले यहाँ की स्थिति भी हमारे जैसी थी। मेरे यहाँ आने का एक कारण यह भी है कि इनलोगों के प्रयास एवं तकनीक को सीख कर, अपने यहाँ लागू कर अपनी प्राकृतिक संपदा को पुनर्जीवित कर पाऊं।” – इतना कह कर वे उदास हो गए।
     लम्बी यात्रा के बाद जब साउथ अफ्रीका की राजधानी केप टाउन में उनका हवाई जहाज लैंड किया तो उनके चाचा लॉक्सोडॉण्टा और उसके भाई अफ़्रीकाना और साइक्लोटिस ने शाही अंदाज में उनका स्वागत किया। घर पहुँचने पर उनका स्वागत नाना प्रकार के फलों से हुआ। उदर तृप्ति हो जाने के बाद बच्चे नदी में खेलने चले गए। बच्चे सूंढ़ में पानी भर कर एक दूसरे के ऊपर फेंकने लगे। नदी में सभी बच्चों ने खूब उछल-कूद मचाई। जब मैक्सिमस, इन्डिकस और सुमात्रेनस थक गए, तब वे नदी से निकलने लगे, तभी उनके चचेरे भाइयों ने उन्हें रोका और कहा, “नदी में हम मस्ती करने के बाद सूंढ़ में पानी भर कर जंगल जाते हैं और वहाँ के छोटे-छोटे पौधों को पानी देकर ही घर वापस जाते हैं। इस नियम का पालन यहाँ के छोटे बच्चों से लेकर बड़े-बुजुर्ग तक करते हैं। और जंगल से लौटते वक्त, जरूरत के अनुसार फलों को प्यार से ऐसे तोड़ते है, जिससे पेड़ को कोई नुकसान न हो।”
     पाँचों ख़ुशी-ख़ुशी जंगल गए, पौधों को पानी दिया और अपनी-अपनी पसंद का फल तोड़ कर घर वापस आ गए। रात का खाना खाने के बाद ऍलिफ़स और लॉक्सोडॉण्टा आपस में बात करने लगे। परिवार का हालचाल पूछने के बाद ऍलिफ़स ने कहा, “भैया! मैं यहाँ आपसे पर्यावरण को समृद्ध एवं स्वच्छ बनाने के लिए आपके द्वारा उपयोग में किए जाने वाली तकनीक के बारे में जानने आया हूँ।”
     लॉक्सोडॉण्टा ने कहा, “देखो छोटे! तकनीक अपनी जगह है, परन्तु उससे पहले जो तुम्हारे पास प्राकृतिक संपदा है उसके दुरूपयोग को रोकना है।”
     अभी दोनों भाइयों का वार्तालाप चल ही रहा था कि उनके बच्चे वहाँ आ गए। मैक्सिमस ने उत्सुकता से कहा, “बड़े पापा! आप सभी आकार में बड़े एवं शक्तिशाली कैसे हैं? और यहाँ का पर्यावरण, समृद्ध एवं स्वच्छ कैसे है? हमारे यहाँ तो नदी, नाले में बदल गई और हवा इतनी प्रदूषित है कि साँस लेने के लिए भी नाक में फ़िल्टर और साथ में ऑक्सीजन का सिलिंडर रखना पड़ता है।”
     लॉक्सोडॉण्टा ने कहा, “आओ बच्चो आओ! तुम्हारे पिता जी भी मुझ से यही सवाल पूछ रहे थे।” थोड़ी देर चुप रहने के बाद वे गंभीर हो कर बोले, “यहाँ का नज़ारा अभी जो तुमलोग देख रहे हो, वह कुछ दशक पहले ऐसा नहीं था। जिसके कारण हमने अपने एक भाई ‘मैमथएवं एक बेटे ‘अडौरोरा’ की पीढ़ी को खो दिया और इसका मुख्य कारण था- प्राकृतिक संपदाओं का दुरूपयोग। वे लोग नदी का उपयोग स्नान, गर्मी से राहत पाने एवं प्यास बुझाने के लिए करते थे। यहाँ तक तो बात ठीक थी, परन्तु उस दौरान वे सूंढ़ में पानी भर कर आस-पास फेंक कर जल का दुरुयोग करते थे। जंगल में रहते हुए, वहाँ उत्पात मचाते थे। बे-वजह पेड़ों को तोड़ना, आवश्यकताओं से अधिक फलों को तोड़ कर उसे बर्बाद करना और विकास की अंधी दौड़ में प्राकृतिक संपदा के दोहन ने उनके अस्तित्व को मिटा दिया। उन्हीं से सबक लेते हुए, हमलोगों ने अपने दैनिक जीवन में प्रकृति के महत्व को समझते हुए उसकी देखभाल करनी शुरू की। ऐसे-ऐसे नियम बनाए जिससे पर्यावरण दूषित न हो और अधिक से अधिक पेड़ को सिंचित कर सकें। बरसात के पानी को सदुपयोग में लाने के लिए हमलोग रेन हार्वेस्टिंग तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। कार्बन फुटप्रिंट को कम किया। अन्य तकनीक की जानकारी मैं तुम्हारे पापा को दे दूँगा, अगर तुमलोग उनका सहयोग करोगे तो वह दिन दूर नहीं, जब हमलोग भी तुम्हारे घर आ कर अपने बच्चों के साथ छुट्टियाँ मनाएँगे।
     ऍलिफ़स एक सप्ताह में सभी जानकारी इकठ्ठी कर बच्चों के साथ अपने देश लौट आया। उसने अपने समाज को पर्यावरण के प्रति जागरूक किया और इम्पोर्टेड तकनीक से पर्यावरण को संरक्षित एवं स्वच्छ बनाने लगा। उसके एवं बच्चों के अथक प्रयास से, दो दशक बाद उनके नाले जैसी नदी चौड़ी एवं स्वच्छ हो गई। जंगल में हरियाली छा गई और वह दिन भी आया, जब दो दशक बाद ऍलिफ़स के बच्चे बड़े होकर अपने बुजुर्ग बड़े पापा एवं अपने भाइयों का नई दिल्ली के एअरपोर्ट पर शाही अंदाज में इंतज़ार कर रहे थे।

(नोट- ऍलिफ़स, लॉक्सोडॉण्टा और मैमथ हाथियों की प्रजाति है। ऍलिफ़स की तीन जातियां मैक्सिमस, इन्डिकस और सुमात्रेनस तथा लॉक्सोडॉण्टा की तीन जातियां अडौरोरा, अफ़्रीकाना और और साइक्लोटिस हैं)

-----समाप्त----

©  राकेश कुमार श्रीवास्तव 'राही'

Friday, March 8, 2019

नारी - हिम्मत कर हुंकार तू भर ले



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#नारी - हिम्मत कर हुंकार तू भर ले#

नारी के हालात नहीं बदले,
हालात अभी, जैसे थे पहले,
द्रौपदी अहिल्या या हो सीता,
इन सब की चीत्कार तू सुन ले। 

राम-कृष्ण अब ना आने वाले,
अपनी रक्षा अब खुद तू कर ले,
सतयुग, त्रेता, द्वापर युग बीता,
कलयुग में अपना रूप बदल ले।

लक्ष्य कठिन है, फिर भी तू चुन ले,
मंजिल अपनी अब तू तय कर ले,
अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ,
अपना जीवन तू जी भर जी ले। 

जो भी हैं अबला कहने वाले,
हक़ यूँ नहीं तुम्हें देने वाले,
उनसे क्या आशा रखना जिसने,
मुँह से छीन ली तेरे निवाले। 

बेड़ियाँ हैं अब टूटने वाली,
मुक्ति-मार्ग सभी तेरे हवाले,
लक्ष्मी, इंदरा, कल्पना जैसी,
दम लगा कर हुंकार तू भर ले।

-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"




Wednesday, October 31, 2018

सतर्कता-जागरूकता मिशन


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"सतर्कता-जागरूकता मिशन" 

सब हो जाए ईमानदार और, रहूँ मैं भ्रष्टाचारी
भ्रष्टाचार मुक्त समाज बने कैसे, यही है लाचारी

नैतिकता का हुआ पतन, सब बन बैठे है भ्रष्टाचारी
भ्रष्टाचार मुक्त समाज बने कैसे, यही है लाचारी

सब सुधर जाएँ पर मैं ही, करूँ बस अपनी ही मनमानी
भ्रष्टाचार मुक्त समाज बने कैसे, यही है लाचारी

हम सब शपथ लें और ख़त्म करे, बस अपनी ये लाचारी
अपनाएं सार्वजनिक जीवन में, हम सभी ईमानदारी

पारदर्शिता-जवाबदेही को अब अपना कर्म बनाएं
सतर्कता-जागरूकता में हो जनता की भागीदारी.

रिश्वत लेने-देने की रोग को, मिलकर हम सब  मिटाएँ
सतर्कता-जागरूकता मिशन को, हम सभी सफल बनाएं. 

-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

एक नागरिक के रूप में उपरोक्त सत्यनिष्ठा प्रतिज्ञा प्रमाण पत्र आप भी प्राप्त कर सकते हैं। 
यहाँ क्लिक करें। 



Wednesday, August 8, 2018

जीवन की साँझ

जीवन की साँझ

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रामदीन का पुश्तैनी पेशा मिट्टी के बर्तन एवं खिलौने बनाना था और उसके द्वारा बनाए गए सामान, उसके गाँव के पास के हाट में हाथों-हाथ बिक जाते थे। घर-गृहस्थी बड़े आराम से चल रही थी। रमेश उसका एकलौता बेटा था जो पढ़ने में बहुत ही  ज़हीन था। 

रमेश के मास्टर साहब, एक दिन रामदीन से बोले – “रामदीन ! देखना, रमेश एक दिन इस गाँव का नाम रौशन करेगा जैसे कमल ने किया।

रामदीन ने भी रमेश की पढ़ाई के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी और एक दिन रमेश इंजीनियरिंग की पढ़ाई समाप्त कर शहर की एक फैक्ट्री में नौकरी करने लगा। जब रमेश की नौकरी लगी तो वह अपने पिता जी को अपने साथ, शहर ले जाने के लिए घर आया और अपने पिता जी से बोला – “बाबू जी, आप मेरे साथ शहर चलें, वहाँ मुझे बंगला मिला है। आपने मेरे लिए बहुत मेहनत की है, अब आराम करने की बारी आपकी है।”

रामदीन बोला – “ बेटा, हमलोग मजदूर आदमी है, बिना मेहनत किए हम कहीं नहीं रह सकते।

रमेश जिद्द करके बोला – “बाबू जी, आप चलिए, वहाँ आपके मित्र, कमल के पिता जी भी तो रहते ही हैं।”

बेटे के जिद्द के आगे रामदीन को झुकना पड़ा और अपनी पत्नी एवं बेटे के साथ शहर में आ गया। अभी दो दिन ही बीते थे कि रामदीन ने अपने बेटे से कहा – “ बेटा ! बिना मेहनत किए मैं रह नहीं सकता, बैठे-बैठे मेरा सारा बदन टूट रहा है।”

रमेश ने कहा - “बाबू जी ! दिन भर आप अकेले रहते है इसलिए आपका यहाँ मन नहीं लग रहा। ऐसा करते है, कल रविवार की छुट्टी है। मैं आपको अपने प्रिय मित्र कमल के पिता जी, सुरजचंद जी से मिलवाने ले चलूँगा।” 

रमेश अपने पिता जी को को ले कर कमल के यहाँ पहुँचा। रामदीन ने एक लॉन के बीच बंगले को देखकर अपने बेटे से पूछा – “सुरजचंद यहीं रहता है?”

रमेश ने कहा - “हाँ बाबू जी ! कमल जी ही मेरे बॉस हैं।”

न चाहते हुए भी रामदीन को सुरजचंद की किस्मत पर रश्क हो आया। बंगले में प्रवेश करते ही कमल ने नमस्ते काका कह कर रामदीन का स्वागत किया, तो आशीर्वाद देकर चहकते हुए कमल से कहा – “ बेटा ! अब जल्दी से सुरजचंद को बुलाओ, लगभग दस साल के बाद उससे मिलूँगा।”

कमल ने कहा – “पिता जी को घुटनों में दर्द रहता है इसलिए उनको चलने-फिरने में तकलीफ़ होती है।”

कमल ने आवाज़ लगाई- “रामू काका!”

रामदीन की ही उम्र एक आदमी आया और कमल के सामने खड़ा हो कर कहा – “जी साहेब !”

कमल ने कहा - “देखो ! चाचा जी को पिता जी के कमरे में ले जाओ।” 
रामदीन, रामू के पीछे-पीछे हो लिए। एक कमरे की ओर इशारा कर रामू वहाँ से चला गया। रामदीन ने जब कमरे में प्रवेश किया तो एक जीर्ण-शीर्ण शरीर वाला व्यक्ति बिस्तर पर लेटा हुआ था। पास जाने पर मुश्किल से सुरजचंद को पहचाना तभी सुरजचंद बोल पड़े – “अरे ! रामदीन भाई, यहाँ कैसे?”
(सुरजचंद का चेहरा खिल उठा।) 

“ लोहे को तपा कर अपने मन-मुताबिक ढालने वाले सुरजचंद, ये क्या हाल बना लिया है?”- रोते हुए रामदीन ने कहा। 

“क्या बताऊँ ? जब मैं यहाँ आया तो कमल ने जैसे मुझे इस महल में कैद ही कर दिया। यहाँ किसी चीज़ की कमी नहीं है, परन्तु, स्वेच्छा से कोई काम नहीं कर सकता था। शुरू में तो बदन दर्द करता था फिर घुटनों में दर्द, अब तो चलना-फिरना भी मुहाल हो गया है।” ये कहते हुए सुरजचंद के आँखों से आँसू निकल पड़े। 

भारी मन से रामदीन अपने बेटे के साथ लौटे। अगली सुबह रामदीन ने अपने बेटे से कहा कि मैं सुरजचंद जैसी ज़िन्दगी नहीं जी सकता। मुझे यहाँ अपना काम करने दो या मुझे गाँव छोड़ दो। 

“कैसी बात करते हैं बाबू जी! यहाँ पर कुम्हार का काम करेंगे तो लोग क्या कहेँगे।”- रमेश ने कहा।  

बाप-बेटे में अभी बहस चल ही रही थी तभी घर में प्रवेश करते हुए कमल ने कहा - “लो काका! आपका चश्मा मेरे यहाँ छूट गया था, वही देने आया हूँ, परन्तु यहाँ किस विषय पर, आप दोनों में बहस छिड़ी हुई है?

रमेश ने नाराजगी दिखाते हुए कहा - “ देखिए ना ! बाबू जी अपनी जिद्द पर अड़े हैं कि या तो मुझे यहाँ कुम्हार का काम करने दो या फिर गाँव भेज दो।  

यह सुनकर कमल गंभीर स्वर में बोला - “काका सही कह रहे हैं, मैंने अपने बाबू जी को अपाहिज बना दिया और मैं नहीं चाहता कि काका का भी यही हाल हो। रमेश ! हमें समझना होगा कि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता, जिस काम को करने में हमें ख़ुशी मिले, उसी काम को करना चाहिए।

परन्तु लोग क्या कहेंगे ?” - रमेश ने झुँझलाते हुए कहा। 

इस समस्या का भी हल है मेरे पास। काश ! मेरी ये सोच पाँच साल पहले होती तो आज मेरे बाबू जी का ये हाल नहीं होता। ” - कमल ने कहा। 

रामदीन और रमेश आशाभरी नज़रों से कमल को देख रहे थे। 

कमल ने कहा - “ आजकल बच्चों की गर्मियों की छुट्टियाँ चल रही हैं, क्यों ना हम एक पॉटरी एवं क्ले टॉय का वर्कशॉप लगाए, जिसमें काका बच्चों को मिट्टी के बर्तन एवं खिलौने बनाना सिखाएंगे।” 

यह सुनकर, रामदीन और रमेश का चेहरा खिल उठा। रमेश ने चहकते हुए कहा - “यह सुझाव बहुत ही अच्छा है।” (यह कहते हुए, रमेश ने  भावुक होकर कमल को गले से लगा लिया।)

रमेश के  दस-पंद्रह दिन की  कड़ी मेहनत ने रंग दिखाया और पॉटरी एवं क्ले टॉय का वर्कशॉप खुल गया, जिसका उदघाटन करने सूरजचंद जी आए थे। 

वर्कशॉप में पॉटरी एवं क्ले टॉय को सीखने आए बच्चों को देख कर रामदीन एवं सूरजचंद की आँखों में ख़ुशी के आंसू आ गए। सूरजचंद ने रामदीन को गले लगाते हुए कहा - “रामदीन ! जीवन की इस ढलती साँझ में सूरज तो डूब रहा है, परन्तु, आज से तुम्हारे जीवन में पूर्णिमा का चाँद निकला है और साथ में तारे रुपी बच्चे तुम्हारे जीने की उम्मीद को जगमगाते रहेंगे। 

“सही कहा है, सूरजचंद भाई !” - रामदीन ने ख़ुशी के आंसू पोछते हुए कहा। 

©  राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"






Friday, May 18, 2018

अफ़वाह


अफ़वाह 

कानों सुनी बातों का असर,
डाले ये, समझने पर असर
जगाता है झूठा अहंकार,
सजाता है नफ़रत का शहर.

आसां नहीं है सत्य का डगर, 
तय करता है ये लम्बा सफ़र,
टूटती है उम्मीदें कितनी,
शैतान इससे है बे-असर.

कानों में घोलते हैं जहर,
फैलाते हैं उन्मादी लहर,
बचना तुम ऐसे लोगों से,
नहीं तो जल जाएगा शहर.

भाईचारे पर बुरी नज़र,
जो पड़ जाए कहीं भी अगर,
समझ लेना उनकी चाल को,
उनको मिलकर बेनक़ाब कर.

पा लिया अब ज्ञान का सागर
दिखा दो अभी प्यार का मंज़र,
शैतान अंधे हो जाएँगे,
जब देखेंगे यहाँ का सहर.

-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

Friday, May 4, 2018

ना समझो नादान हमें

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ना समझो नादान हमें

ना समझो नादान हमें,
हम नए युग के बच्चे हैं। 

है कठिन मंजिल अपनी,
समस्या को तो आना है,
समस्याओं को सुलझाकर,
आगे बढ़ते जाना है। 
ना समझो नादान हमें,
हम नए युग के बच्चे हैं। 

विकास-पथ पर निकले हम,
आगे बढ़ते जाना है,
रक्षा करें पर्यावरण की,
यह भी प्रण उठाना है। 
ना समझो नादान हमें,
हम नए युग के बच्चे हैं। 

सभी धर्मों के लोग यहाँ,
मिलजुल कर यूँ रहना है    
बस प्यार हो आपस में,
नया समाज बनाना है। 
ना समझो नादान हमें,
हम नए युग के बच्चे हैं। 

निरक्षरता ना रहे यहाँ,
यह अभिशाप मिटाना है,
साक्षर हो यहाँ हम सभी,
यह जागृति जगाना है। 
ना समझो नादान हमें,
हम नए युग के बच्चे हैं। 

सूचना “औ” तकनीक की 
लहरों पर सवार है हम,
हर मुश्किल को पार करें,
हम में है अब इतना दम। 
ना समझो नादान हमें,
हम नए युग के बच्चे हैं। 
  
हम ऐसा काम करेंगे,
दुनिया करे हमें सलाम,
हर क्षेत्र विकसित  होगा,
चमकेगा भारत का नाम। 
ना समझो नादान हमें,
हम नए युग के बच्चे हैं। 

हम सब की अभिलाषा है,
मिले भारत को शोहरत,
विश्व फिर से पुकार उठे,  
सोने की चिड़िया “भारत” 
ना समझो नादान हमें,
हम नए युग के बच्चे हैं। 
-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"



Friday, April 6, 2018

दंगा




      दंगा
                   
शासन करना हो जनता पर,
सजा लो राजनीति का समर.
तुम को हित साधना हो अगर,
तो, तुम सदा ही विष-वमन कर.

मतलब रखो अपने ताज़ से,
अपनी चाल पर विश्वास कर.   
सभी तैयार हैं मरने को,
तुम उनमें एक उन्माद भर.

किसी के उपदेश सुनकर भी  
नहीं रेंगती जूं कानों पर.
ये सभी तेरी ही सुनेंगे,
बस यूँ ही सदा, विष-वमन कर.

सभी के मसीहा तुम बन कर,
हाथ रखो तुम दुखती रग पर,  
जनता को तुम मिलकर बाँटो,
धर्मों-जातियों के नाम पर.

तुम जो कह दो जां भी दे दें,
दंगा करें बस इशारे पर.  
ये तो यकीं करेंगे भैया
कोरी फैली अफवाहों पर.

इस देश का भाग्य टिका है,   
इन चोरों और गद्दारों पर.
कैसे देश महान बनेगा,
भारत बन्द के नारों पर.

निज स्वार्थ से ऊपर उठ कर,
जनकल्याण का कार्य करें.
आओ इनको सबक सिखाएं,
वोट देंगे हम पहचान कर.
  
आओ आज संकल्प उठाए,
धर्म-जाति का भेद मिटाए,
न देश का नुकसान करेंगे,
कभी इन दंगों के नाम पर. 
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-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"  

Wednesday, March 21, 2018

मेरी कविता




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                 मेरी कविता

शब्दों में सब की भावनाओं को, जब मैं ढाल पाता हूँ,
तब मैं अपनी कविता को, कोरे कागज़ पर लिख पाता हूँ.

आपके सुख और दुःख को, जब मैं शिद्दत से महसूस करूँ,
सब की हँसी और आँसू को, जब भी मैं  स्वयं महसूस करूँ,
या पल ऐसा हो, जो मेरी अंतरात्मा पर भी चोट करे
तब भावनाओं के रंगों से, मैं कविता की रचना करूँ.

मेरी कविता अश्रु  बहाती , जब मैं मज़लूमों को देखूँ ,
मेरी कविता हँसने लगती, जब हँसते बच्चों को देखूँ ,
मैं कविता के प्रत्येक शब्द के साथ जीता व मरता हूँ
मैं कविता तब लिखता हूँ , जब मैं दर्द या ख़ुशी को देखूँ .

प्रकृति की छटा निराली देख, मानव हर्षित हो जाता है,
नील गगन में उड़ते पक्षी  और फूल जब खिल जाता है,
मेरी कविता  इस  अनुभूति से कैसे दूर रह सकती है  
कहो कौन है, जो इसे  देख, अभिभूत नहीं हो जाता है.

मानव निर्मित  कृतियों को देख कर मैं अचंभित होता हूँ,
इसके विनाशकारी कृत्यों को, कहाँ भूल मैं पाता हूँ ,
भूत-वर्तमान में घटित कर्मों के अवलोकन से उपजे
हर्ष-विषाद के इस रंग को अपनी कविता में लिखता हूँ .

मैं ना कहता मेरी कविता समाज को राह दिखाएगी,
मैं नहीं कहता मेरी कविता  ज्ञान की ज्योति जलाएगी,
आशा है, जब कभी, आप मेरी कविताओं को पढ़ लेंगे
मेरी कविता की पंक्तियाँ, सोई संवेदना जगाएँगी.  

-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"




Wednesday, March 7, 2018

नारी सशक्तिकरण









       नारी सशक्तिकरण
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चल रही है, कब से, परिवर्तन की लहर,
दरवाज़े के पीछे, तुम ऐसे न ठहर,
तुम लाँघ लो इस बार, चौखट को अपनी 
आएगी जीवन में, सुनहरी सी सहर। 

बढ़ रहा, कारवाँ, गाँव-गाँव, शहर-शहर,
तुम शामिल हो इसमें, न सोच अगर-मगर,
अगर इस बार भी तुम ना निकली, तो फिर
रहेगी हरदम , नीची तेरी ये नज़र।
चल रही है,कब से, परिवर्तन की लहर-2  

पहले तू ,अपने-आप पर विश्वास कर,
अबला बनकर यूँ न जीवन, बर्बाद कर,
नहीं आएगा कोई, तुम को बचाने
तुम खुद ही, अपनी शक्ति का विस्तार कर। 
चल रही है,कब से, परिवर्तन की लहर-2 

सम्मान से ऊँचा रहे, ये अपना सर,
तो अपने सपनों को दे दो बस, एक पर,
लाख दुश्वारियाँ आ जाए जीवन में,
अपने हौसलों से ही, उनको फ़तह कर।
चल रही है,कब से, परिवर्तन की लहर-2  

आपस में हमेशा, यूँ ना तुम, लड़-झगड़,
सबला है तू, यूँ शक्ति का न, विनाश कर,
एकजुट हो, कर, अपना शक्ति प्रदर्शन 
और तू अपने दुश्मनों का संहार कर.
चल रही है,कब से, परिवर्तन की लहर-2 

हिम्मत दिखा दे अब, खुद को आज़ाद कर,
बाहर निकल, पैर की जंजीर तोड़ कर, 
कब तक होगी तेरे सब्र की इम्तिहाँ   
अब यूँ ही ना तुम ज़ुल्म को स्वीकार कर.
चल रही है,कब से, परिवर्तन की लहर-2  

बहू-बेटी में तू भी, अब ना फर्क कर,
साथ मिलकर तू, मुक्ति-पथ, प्रशस्त कर,
हो कोई लाचार, हो कोई पीड़िता,     
आगे बढ़ कर उसकी, मदद कर, मदद कर।
चल रही है,कब से, परिवर्तन की लहर-2
-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"