मेम्बर बने :-

Showing posts with label हास्य. Show all posts
Showing posts with label हास्य. Show all posts

Wednesday, September 20, 2017

जय अपराधी बाबा की

 जय अपराधी बाबा की 

सर्वप्रथम जेल में सज़ा काट रहे सभी बाबाओं को साष्टांग प्रणाम अर्थात  सिर, हाथ, पैर, हृदय, आँख, जाँघ, वचन और मन इन आठों से युक्त होकर भूमि पर सीधे लेटकर मेरा प्रणाम। एक ही बात को बार-बार लिखने या कहने की विधा मैंने इन्हीं बाबाओं से सीखी है और यहाँ तो मजबूरी है कि एक तो बाबाओं की शैक्षणिक योग्यता कम है या हिंदी की कुछ शब्दों के भाव को नहीं जानते है। साष्टांग प्रणाम इन बाबाओं के भक्तों को भी, जो इन बाबाओं के विरुद्ध साक्ष्य होने के बाद भी अपनी भक्ति में कोई कमी नहीं रखी। इसके साथ ही मैं वैधानिक ढंग से क्षमा चाहता हूँ उन बाहुबली भक्तों से जो महाबली बन कर भारत के सम्प्रभुता को चुनौती देते आए है तो मैं किस खेत की मूली हूँ। 

वस्तुतः  इस हास्य-व्यंग का मूल उद्देश्य बाबाओं को महिमामंडित करने का है फिर भी अगर किसी को लगे कि मैंने इन महापुरुषों के प्रति गुस्ताख़ी की हो तो उन पाठकों से विनम्र निवेदन है कि इस आलेख को पुनः पढ़ कर अपनी प्रतिक्रिया बदलें या अपनी प्रतिक्रिया फिर भी ना बदल पाएं तो मेरे इस विशेष अनुरोध पर किसी नास्तिक से इस लेख के बारे में राय लें। 

इन बाबाओं के चरणों में अपना श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए मैं यह कहना चाहता हूँ कि आपलोग यूथ आइकॉन है. आपकी महिमा का डंका सम्पूर्ण सोशल मीडिया में बजता है। इस चराचर जगत में सबसे ज्यादा पैसा, शोहरत, आनंद और  रुतबा है तो इस बाबागिरी में है। अब वह दिन दूर नहीं जब कॉर्पोरेट जगत या आईआईटियन सुनियोजित ढंग से आपके ही रास्तों पर चल कर अतुल्य भारत का निर्माण कार्य में सहयोग देंगे। ऐसे भी आपका जीवन अनुकरणीय है क्योंकि आप हिन्दू शास्त्रों के अनुरूप जीवन व्यतीत करते है पहले आप किसी ना किसी गुरुकुल में रहते है। ज्ञान अर्जन के उपरांत आप गृहस्थ आश्रम वरण करते हुए अपने एवं अपने वंशजो के लिए अकूत सम्पति अर्जित करते है फिर अंगुलिमाल डाकू की तरह कुख्यात हो जाते है तो कोई जज रुपी बुद्ध आपको आध्यात्मिक राह दिखाते है और तब आप सभी सांसारिक मोह-माया को त्याग कर वानप्रस्थ आश्रम को वरण करते है और स्वं को जानने हेतु तपस्या करने के लिए जेल की सेवा लेते हैं। अंत में 20 से 25 वर्ष का वानप्रस्थ काल को भोग कर संन्यास आश्रम को वरण करेंगे इसी मनोकामना के साथ इस आलेख के समापन के पूर्व मैं कहना चाहता हूँ कि "हे भक्तों, बाबा अपने क्रम-संन्यास का भोग कर रहें है और मोक्ष की ओर अग्रसर है। अतः यह शोक की घडी नहीं है। इस स्वर्णिम अवसर को लपको और तुम भी बाबा बन जाओ। तुम्हें तो पता ही होगा कि इस सत्संग परिपाटी में एक बाबा के जाने के बाद अनेकों बाबाओं की उत्पत्ति होती है। इसलिए तुम सभी चिंताओं से मुक्त होकर बाबा बनने की प्रक्रिया में शामिल हो जाओ और परम पद को प्राप्त करो। भक्त ही तुम्हारा कल्याण करेंगे। जय अपराधी बाबा की। इति।।

-© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"







Wednesday, March 8, 2017

पत्नी पुराण

पाठकों ! मेरी पहली कहानी सास पुराण आप सभी ने पढ़ी और सराही जिसके लिए आप सबको मेरी तरफ से धन्यवाद। साथियों! आप सब बार-बार मुझसे अनुरोध करते रहे कि सास-पुराण के बाद पत्नी-पुराण भी लिखूँ। पत्नी-पुराण की पाण्डुलिपि तो मैंने आपके कहने पर तैयार कर ली थी, परन्तु किसी पति में इतना साहस तो है कि वह अपनी पत्नी के बारे में कुछ लिख ले  और उस कृति को नजरबंद कर  दे, किन्तु  उसे  प्रकाशित कर दे, इतनी हिम्मत कहाँ? पति तो बेचारा एक निरीह प्राणी है, जो शादी के बाद घर में केवल सुनता है, बोलता कुछ नहीं है। इसलिए आप सभी, पतियों को घर  के बाहर, बहस करते, डींगे मारते, बिन पूछे राय देते तो देखा  ही होगा और ऐसे पतियों को भी देखा  होगा, जो राह चलते बड़बड़ाते भी हैं। आप सब से अनुरोध है कि ऐसे व्यक्ति को आपकी सहानभूति की अत्यंत आवश्यकता है परन्तु जरा संभल  के, हो सकता  है कि उनकी मानसिक स्थिति ठीक न हो और आप से  ही उलझ पड़े। तो आइए, फिर से बजरंग बली  का नाम लेते हुए मैं अपना पत्नी पुराण शुरू करता हूँ। मेरी शादी किस तरह से हुई यह तो आपने सास पुराण में तो पढ़ ही लिया।
सास पुराण पढने के लिए नीचे दिए गए लिंक को क्लिक करें :-
http://rakeshkirachanay.blogspot.in/2012/02/blog-post.html


अब आगे .........

मेरी पत्नी बहुत सुंदर एवं सुशील थी और वाणी मधुर जैसे की प्रत्येक पति को लगता है। मेरी पत्नी का व्यवहार शुरू में तो सभी के साथ मधुर था, परन्तु जैसे-जैसे समय बीतता गया उसने अपना पहला निशाना मेरी माँ को बनाया, फिर क्या था? मेरा घर युद्ध के मैदान में बदल गया। एक तरफ मेरी माँ एवं मेरे भाई-बहन तो दूसरी तरफ मेरी पत्नी।

मेरी सरकारी नौकरी का कार्यस्थल घर से दूर था और साल में दो ही बार घर जा पाता था। शादी के शुरूआती दिनों में तो घर जाने के नाम पर रौनक आ जाती थी, क्यूंकि घर पहुँचते ही माँ, बहू का गुणगान करती और उनकी बहू मेरी सेवा! फिर क्या था? दोनों हाथो में लड्डू अर्थात शादी का लड्डू जिसे खा कर मैं बहुत खुश था। इन्हीं खुशियों के बीच मुझे एक पुत्री-रत्न प्राप्ति की ख़ुशी मिली।

मेरी माँ भी बहुत खुश थी और हो भी क्यों ना, किसी को पराधीन रखने का जो असीम सुख स्त्रियों को मिलता है, वह सभी सुखों में सर्वोपरी है। यही कारण है कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी सास-बहुओं के बीच ताल-मेल कभी बैठ नहीं पाता। सामान्यतः सास अपनी बहू को पराधीन रखती है, परन्तु कहीं-कहीं स्थिति विपरीत भी हो जाती है अर्थात बहू दबंग हो तो सास को पराधीन बना लेती है। खैर ! साधारणतः जब किसी स्त्री के बेटे की शादी होती है तो बहू को बेटी बनाने का सपना देखती है, परन्तु वह उसे अपने अनुशासन में रखना चाहती है। पर क्या किसी की बेटी, किसी के अनुशासन में रह सकती है? अरे ! बेटी तो लक्ष्मी होती है और लक्ष्मी तो चंचल होती है, लक्ष्मी किसी के अधीन नहीं रह सकती, वो तो उसी के पास रहेगी, जो उसको सर पर चढ़ा कर रखेगा। इसलिए स्त्री या तो पिता के साथ ख़ुशी से रहती है या पति के साथ।

तो, जब तक मेरी पत्नी को मेरे घर वालों ने सर चढ़ा कर रखा तब तक तो सब ठीक था , परन्तु जैसे-जैसे अनुशासन में रखने के लिए टोका-टाकी शुरू हुई, वैसे ही सास-बहू का तालमेल  बिगड़ा और मेरे शादी के लड्डू खा कर पछताने के दिन शुरू हो गए। अब मुझे घर जाने की ख़ुशी नहीं रहती, बल्कि घर जाने के नाम से ही पसीने आ जाते।किसी तरह घर पहुंचता, तो माँ अपने बहू की करतूतों से दिनभर अवगत कराती और रात  को खाना खाकर सोने जाता तो पत्नी रातभर अपनी सफाई देने में बिता देती। मैं तो बेचारा उल्लू की भाँति ऑंखें गोल-गोल घुमाकर दोनों की बातें सुनता रहता।

जब आपके अपनों के बीच युद्ध हो, तो आप तटस्थ नहीं रह सकते और अगर मैं  केवल किसी एक के पक्ष में दलील देता तो यकीन मानिए या तो मेरा  सारा दिन ख़राब होता या सारी रात। तो,  मैं यह खतरा मोल नहीं लेना चाहता था। अतः दोनों की बातों में हाँ-में-हाँ मिलाने लगा। पर मैं जानता था कि यह कोई स्थाई समाधान नहीं है। इसी उधेड़-बुन में मैंने बीमारी का बहाना बना कर घर आना-जाना बंद कर दिया। लेकिन क्या परिस्थितियों से निपटने के लिए पलायनवादी सोच कभी काम आती है, जो मेरे काम आती। अतः ऐसी स्थिति से निपटने के लिए मैंने पत्नी को समझाने से अच्छा, माँ को ही समझाना अच्छा समझा और हिम्मत करके घर गया। घर पहुँचते ही माँ ने मेरी तबियत के बारे में पूछा।

मैंने माँ से कहा – माँ! तबियत तो अब ठीक है परन्तु कमजोरी महसूस करता हूँ। बाहर का खाना खाने का मन नहीं करता।

माँ ने कहा – तो बहु को ले जा। मैं तो तुम्हारे भाई-बहन की पढ़ाई एवं पिता जी की नौकरी के कारण, तुम्हारे साथ जा नहीं सकती। 

इतना सुनते ही, मेरी बिन माँगे मुराद पूरी हो गई। मैं अपनी पत्नी को अपने साथ ले आया। पत्नी जी अपने नई गृहस्थी को संभालने में लग गई और मेरी माता जी अपने छोटी बहू को ढूढ़ने में। अब मेरे दोनों हाथों में लड्डू और सर कड़ाही में था। उधर माँ अपनी छोटी बहु के लिए योग्य लड़की की बातें मुझको बता कर खुश होती और इधर मेरी पत्नी अपने स्वयं की  गृहस्थी को सजाने एवं नई सहेलियाँ बनाने में खुश थी। मैं भी उसकी सेवा एवं ख़ुशी को देख निहाल हो रहा था, परन्तु यह सिलसिला ज्यादा दिन नहीं चला। शुरू में तो बैंक में रखे पैसों से गृहस्थी चली, परन्तु मुझे लगने लगा कि मासिक वेतन से घर खर्च चलाना मुश्किल है, तो इस पर मैंने पत्नी को टोकना शुरू किया, जैसे ही मैंने अपनी पत्नी को टोकना शुरू किया, वो तो नागिन की तरह फुफकारने लगी और कहने लगी – देखो जी ! मुझे इस तरह की टोका-टाकी पसंद नहीं है, क्या मैंने गहने गढ़वा लिए? जो खर्च हो रहा है, वह केवल राशन पर ही हो रहा है। ना मैंने अपने मायके में खाने-पीने में कटौती देखी है और ना ही मुझसे खाने-पीने के समान में कटौती  होती है।

ये सिलसिला जो चला वो कभी रुका ही नहीं। मैं इन सब से बचने के लिए ऑफिस से आता और चुपचाप अपने साहित्यिक लेखन में जुट जाता परन्तु उसे मेरा यह पलायनवादी तरीका पसंद नहीं आया। कुछ दिन तू-तू-मैं-मैं होती रही और अंत में मुझे ही उसकी  हाँ में हाँ मिलाकर अपना हथियार डालना पड़ा और मैंने लाफिंग बुद्धा का शांति वाला चोंगा पहन लिया। आए दिन किसी न किसी बात पर मुझको लड़ने के लिए उकसाती परन्तु मैंने अपनी शांति का चोंगा नहीं उतारा।

ऐसे तो मैं लड़के और लड़की में भेद नहीं करता परन्तु लड़का ना होने की कसक इस प्रौढ़ा अवस्था में ज्यादा महसूस हो रही थी। क्योंकि मेरे जिन मित्रों के पुत्र थे, वे अब आनंद में थे। क्योंकि उनकी पत्नियों को अपने-अपने  बहू और बेटों से फुर्सत नहीं थी, जो अपने पति पर चिल्लाये। मैं इस उम्र में भी अपनी पत्नी से प्रताड़ित होता रहा। पहले मैं काल्पनिक सास के डर से नींद में चिल्लाता था, अब स्वप्न में पत्नी श्री के भय से, नींद में भी चीख नहीं निकल पाती। मैं बिस्तर पर छटपटाता रहता हूँ । ऑंखें तभी खुलती हैं जब मेरी धर्मपत्नी साक्षात् दुर्गा का रूप लिए हाथ में झाड़ू लेकर झकझोर कर बोलती है – क्या बंदरों की तरह बिस्तर पर पलटी मार रहे हो?

खैर ! समय बीतता गया और बेटी की शादी के लिए मेरी दौड़-भाग शुरू हो गई। लड़की की शादी एक अच्छे परिवार में तय हो गई। शादी की तैयारी शुरू करनी थी, तभी मेरे दोनों हाथों और पैरों में लकवा मार गया और मैं व्हील चेयर पर आ गया। बेटी की शादी उसने, अपने बचत किए हुए रुपयों एवं गहनों को बेच कर की। मेरी नौकरी चली गई परन्तु अनुकम्पा के आधार पर मेरी पत्नी को नौकरी मिल गई। सदा चहकने वाली स्त्री, अब कर्तव्यों के बोझ तले गंभीर हो गई। मुझसे सदा लड़ने को उत्सुक, अब मेरी सेवा में तल्लीन हो गई। अब वह दफ्तर के काम के साथ-साथ घर की सारी ज़िम्मेदारी अपने कन्धों पर ले ली और मेरी शारीरिक सेवा को उसने पूजा और आराधना का रूप दे दिया।  उसने बड़े ही संयम से अपने सभी कार्यों को अंजाम दिया।

मैंने अक्सर देखा है कि आर्थिक रूप से स्वतंत्र स्त्रियों की दिनचर्या अन्य स्त्रियों की तुलना में बहुत ही कठिन होती है। जहाँ मुश्किल घड़ी में पुरुष धैर्य खो देता है वहीँ स्त्रियाँ दुर्गा बन परिस्थितियों का सामना करती हैं।

मेरी बेबसी के आसुंओं को देख, वह अक्सर मुझे सांत्वना देती - " देखना! तुम एक दिन चलने-फिरने लगोगे, तो फिर, मैं तुम से झगड़ा करुँगी।"

एक दिन मैंने उससे पूछ लिया – "तो क्या तुमको मुझसे हमेशा झगड़ना ही है ?"

उसने कहा – “हाँ! झगड़ना है, आखिर मैं भी एक इंसान हूँ। मुझे तुम्हारी किसी बात पर गुस्सा आ जाए तो तुमसे लड़ाई ना करूँ तो किससे करूँ। तुम तो जानते ही हो कि स्त्रियों को ता-उम्र  कितनी टोका-टाकी होती है , पर अपने आक्रोश को स्त्री कहाँ प्रकट करें। अगर कोई प्यार करने वाला पति उसे मिले, तो कभी-कभी अपने दबे हुए आक्रोश को अपने पति पर निकाल भी ले, तो क्या यह गुनाह है? आखिर वहीँ स्त्री अपने पति को सदैव प्यार करती है तो वह पुरुष को दिखाई नहीं देता, परन्तु कभी-कभी के झगड़ों को माफ़ करने की जगह, पुरुष सदैव के लिए उसे दिल में रख कर मौन धारण कर ले और पत्नी के प्यार को ना समझे तो इसमें स्त्रियों का क्या दोष?”

आज यह शब्द हथौड़े की तरह मस्तिष्क में गूंज रहें हैं। मैंने कितने ख़ुशी के स्वर्णिम अवसर खो दिए। मैं आज बहुत दिनों के बाद अपनी पत्नी श्री की तस्वीर के सामने बैठा, पत्नी पुराण  पाण्डुलिपि  को पढ़ रहा हूँ। उनकी अथक मेहनत और विश्वास से मैं स्वस्थ हो गया परन्तु मेरे देखभाल के चक्कर में वो अपनी स्वास्थ का ख्याल नहीं रख सकीं  और समय से पहले ही और मेरे ठीक होने के बाद उनका निधन हो गया।


"हेलमेट और पत्नी दोनों का स्वभाव एक जैसा है... सिर पर बिठा कर रखो तो जान बची रहेगी।
पतियों को समर्पित।"


- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"


            

Tuesday, March 26, 2013

अपनी -अपनी होली

इंटरनेट से लिया गया है।







अपनी -अपनी होली 

रंग-बिरंगी होली आई,
सबके रंग निराले भाई।

नेता जी की टोली आई,
आपस में कीचड़ उछाले  भाई।

भ्रष्टाचारियों ने उधम मचाई ,
रंगे हाथों पकड़े गए भाई। 

चोरों ने की खूब हाथ सफाई,
पकड़े गए,चेहरे का रंग उड़ गया भाई।

मिलावटी राम ने की खूब कमाई,
रंग तक को नहीं छोड़ा भाई।

आम आदमी का क्या कहना भाई,
तिलक लगाकर होली मनाई।
                                            -राकेश  कुमार श्रीवास्तव 


आप  सब को होली की ढ़ेर  सारी  शुभकामनाएँ !

-

Wednesday, February 29, 2012

सास पुराण





पाठको ! सास का ख्‍याल आते ही मैं कॉंपने लगता था, मेरी सॉंसें उखड़ने लगती थीं । हालाँकि, मैं अपनी पत्‍नी से डरता नहीं हूँ, फिर भी आप से अनुरोध है कि कृपया इस रचना को मेरी पत्‍नी को पढ़ने के लिए नहीं दीजिएगा, क्‍योंकि, इस रचना को अगर मेरी पत्‍नी ने पढ़ लिया तो वह मेरी ऐसी हालत कर देगी कि मैं आपके लिए दूसरी रचना पेश करुँ, ऐसी स्थिति नहीं रहेगी । तो आइए, मैं बजरंग बली का नाम लेकर आपको यह बताऊँ कि मैं अपनी सास का बलि का बकरा कैसे बना?       
यह मेरा दुर्भाग्‍य है कि मेरे कुँआरे जीवन की कोई भी रात ऐसी नहीं बीती जिसमें एक भयानक चेहरा मेरे सपनों में न आया हो और वह भयानक चेहरा किसका हो सकता है यह आप अनुमान लगा लें । वैसे मैं बजरंग बली का भक्‍त हूँ और भूतप्रेत से डरता नहीं हूँ ।

यह बात उन दिनों की है जब मैं कुँआरा था और मेरी नई-नई नौकरी भी लगी थी । मेरे मित्र जो शादीशुदा थे वे अक्‍सर मेरे यहॉं बैठ कर गप्‍पें मारते और अपनी अपनी सास पुरान सुनाते । मित्रों की बातें सुन कर मेरी आत्‍मा कॉंप उठती । कुँआरे जीवन में जो काल्‍पनिक रंगीन स्‍वप्‍नों वाली राते होनी चाहिए थीं वे इन मित्रों की वजह से भयानक स्‍वप्‍नों वाली रातों में बदलने लगी । रामसे प्रोडक्‍सशन फिल्‍म की तरह मेरे सपने भी भयानक हो गए । सपने की प्रथम दो रीलों में प्रेमिका के साथ छेड़छाड़, फिर शादी और शादी के बाद सास से मुलाकात । पहले तो मेरी सास सौम्‍य लगती परन्‍तु हॉरर फिल्‍म की तरह कुछ ही देर में उनके चेहरे पर दो दॉंत उग आते, उनका चेहरा कुरुप हो जाता और वे मुझे तरह-तरह की यातनाएं देती । यह यातना भरी स्‍वप्‍न पंद्रह रील चलती । आप समझ सकते हैं कि मेरी रातें फिर कैसे घुटन भरी हो गई । इस स्‍वप्‍न से छुटकारा पाने की मैंने बहुत कोशिश की मगर कामयाब न हो सका । आप यकीन नहीं करेंगे कि मेरी उम्र चौबीस साल से तीस साल की हो गई मगर यह स्‍वप्‍न बिना नागा किए प्रत्‍येक रात आता और जब चीख मार मैं सुबह उठता तो पसीने से अपने आप को तर पाता । शुरु-शुरु में पड़ोसी दौड़ पड़ते और मुझे तरह तरह सांत्‍वना देते । मगर मेरी चीख बाद में उन लोगों के लिए मुर्गे की बॉंग की तरह हो गई । अब मेरे पड़ोस में अलार्म घड़ी लगा कर कोई सोता, अब वे लोग मेरी चीख सुन कर उठते ।

जिसकी कल्‍पना मात्र से ही इतना डर लगता हो वह हकीकत में कितनी मुश्किल करेगी, यह सोचकर मैंने फसला कर लिया कि अब मैं शादी नहीं करुँगा । मगर हाय रे समाज ! वह कब किसी को चैन से मरने देता है । सभी मुझे सलाह देने लगे । शादी कर लो, अब नहीं करोगे तो कब करोगे । जब किसी पार्टी में जात तो सभी मित्र सपत्‍नीक होते, तो उनके लिए मैं ही आकर्षण का केंद्र होता । वह मुझे ऐसे घूरते मानो वे किसी पार्टी में नहीं वरन् किसी चिडि़याघर में मुझ जैसे निराले अविवाहित लाचार प्राणी को देखने आए हों । अपने मित्रों को अपनी-अपपनी पत्‍नी के साथ मुस्‍कराते देख मेरे दिल में कोमल भावनाओं का प्रबल आवेश आया और मैंने शादी करने का फैसला कर लिया । मगर अब शादी का एक राज़ पता चलता है कि पति-पत्‍नी के साथ खास कर पार्टियों में पति क्‍यों मुस्‍कराता रहता है, क्‍योंकि मेरी पत्‍नी किसी भी पार्टी में जाने से पहले, एक हिदायत मुझे अवश्‍य देती है देखो जी, पार्टी में मुँह लटका कर मत बैठना । खैर, तो मैंने शादी के लिए लड़की तलाशना शरु कर दिया । मगर सास का खौफ अभी भी मेरे दिलो-दिमाग में छाया हुआ था । अत: मैंने फैसला किया कि लड़की चाहे कैसी भी हो चलेगा लेकिन उसकी मॉं नहीं होनी चाहिए अर्थात् ऐसी लड़की जिसके पिता विधुरर हों । बहुत खोजबीन की परन्‍तु ऐसा कोई पुरुष न मिला हो शातिपूर्वक बिना पत्‍नी के जीवन बिता रहा हो । अलबत्‍ता ऐसी कितनी ही औरतें मिली जो बिना पति के मजे से जिंदगी बसरा कर रही थी । तब मुझे पता चला कि ससुर बिना सास का मिलना कठिन ही नहीं बल्कि असंभव सा है । इधर मित्रों की पत्नियॉं मुझ पर दबाव डालने लगी कि ये क्‍या शर्त हुई, और अंत में मुझे नारी दबाव के आगे झुकना पड़ा एवं उन्‍हीं लोंगों की पसंद से मेरी शादी मेरी श्रीमती जी से हो गई । दुर्भाग्‍य से या सौभाग्‍य से कह लीजिए कि मेरी पत्‍नी की एक मात्र संबंधी उनकी मॉं ही थीं । सुनकर थोड़ा सुकून मिला कि यलो साला, साली एवं ससुर से तो छुट्टी मिली । तो साहब! धड़कते दिल से शादी के लिए घोड़ी पर बैठा और अपनी भावी सास की कल्‍पना करता रहा । फरवरी का महीना और मैं पसीने से लथपथ । सभी दोस्‍त नाच करते हुए लड़की वालों के दरवाजे पर पहँचे । पहुँचते ही मेरी सास से परिचय करावाया गया । लगा स्‍वप्‍न हकीकत बन गई, वही चेहरा । मैंने मन ही मन कहा भगवान्! अब तुम ही बचाना ।

जब विदाई की घड़ी आई तो मेरी सासु जी ने कहा बेटा जब भी तुम्‍हें मेरी जरूरत हो तो पत्र लिख देना, मैं आ जाऊँगी । मैंने मन ही मन में कहा वाह री बुढि़या । मुझे चारा डाल रही है , पर मैं कच्‍चा खिलाड़ी नहीं था । मैंने भी कहा क्‍यों नहीं मॉं जी, जरुर खत लिखूँगा । मेरी तो इच्‍छा थी कि आप भी मेरे साथ चलती लेकिन क्‍या करुँ, जहॉं मैं रहता हूँ वा मकान, एक कमरे का ही सेट है । अत: आपको बुला नहीं सकता । जैसे ही बड़े मकान की व्‍यवस्‍था हो जाएगी वैसे ही आपको बुला लूँगा । यह सुन कर उसका चेहरा थोड़ा लटक सा गया, परन्‍तु थोड़ा संभलते हुए बोली कोई बात नहीं बेटा । मुझे बुढि़या को यात्रा करने में भी बहुत तकलीफ होती है । किसी तरह से हमेशा के लिए बला टली । मैं अपनी पत्‍नी के साथ मधुर जीवन व्‍यतीत करने लगा । इसी बीच मुझे पुत्री रत्‍न की प्राप्ति भी हुई । सास ने पत्र के द्वारा अपने आने की मंशा जाहिर की ताकि नातिन का मुंह देख सके लेकिन मैंने तुरन्‍त सूचना भेज दी कि जब भी फुर्सत मिलेगी हम लोग मिलने जरुर आऍंगे ।

एक दिन मैं अपने पूर परिवार के साथ स्‍कूटर से बाजार जा रहा था कि रास्‍ते में मेरे स्‍कूटर की टक्‍कर सामने से आ रही कार से हो गई । सपरिवार हम लोग अस्‍पताल कब पहुँच गए पता ही नहीं चला । जब होश आया तो अपनी सास को अपने सामने बैठा पाया । शादी के बाद दूसरी बार अपनी सास को देख रहा था । परन्‍तु आज सासू मॉं कल्‍पना वाली नहीं थी, उनके चहने पर ममता से आत-प्रोत भाव थे । मेरी ऑंखें उनसे मिलते ही, वे फफक कर रो पड़ी और ममता भरा एक ही शब्‍द उनके मुँह से निकला- बेटा और मेरे सीने पर सर रखकर सुबकने लगी । मैं भी अपने ऑंसुओं को रोक न सका । उस स्‍नेहमयी सास की हकीकत से वाकिफ होने लगा, मन उस ममता भरी आवाज बेटा के स्‍वर लहरी में हिलोरों लेने लगा ।

हम लोग अस्‍पताल से अपने एक कमरे के सेट वाले मकान में आ गए । मेरी पत्‍नी को एक महीने का बेड रेस्‍ट था । एक महीना मेरी सास हम लोगों के साथ रहीं । उन्‍होंने हम लोगों को मानसिक, शारीरिक एवं आर्थिक सभी तरह से मदद की । जब मैं ऑफिस जाने लायक हुआ तो उन्‍होंने अपने घर जाने की तैयारी कर ली । मैंने उन्‍हें बहुत रोकने की कोशिश की मगर उन्‍होंने मुस्‍कराते हुए कहा बेटा, यहॉं तुम्‍हारे पास मात्र एक ही कमरा है । यह सुन कर मैं पानी-पानी हो गया ।

खैर! मेरी सासू मॉं की मधुर याद हमेशा ही आती है । पाठकों ! अब समस्‍या यह है कि स्‍वप्‍न में सास से छुटकारा पा तो लिया परन्‍तु उनकी उत्‍तराधिकारी अर्थात् मेरी पत्‍नी ने मेरे स्‍वप्‍नों में प्रवेश कर लिया । अब मेरे सपने में मेरी पत्‍नी का चेहरा ही भयानक लगता है । पहले चीखें मार कर उठ जाता था परंतु अब चीख हलक के अंदर ही रह जाती है । मैं बिस्‍तर पर छटपटाता रहता हूँ । ऑंखें तभी खुलती हैं जब मेरी धर्मपत्‍नी साक्षात् दुर्गा का रूप लिए हाथ में झाडू लेकर झकझोर कर बोलती है क्‍या बंदरों की तरह बिस्‍तर पर पलटी मार रहे हो?
तो पाठको! अपने पढ़ा कि किस तरह एक निर्मूल समस्‍या को लेकर मैं परेशान था मगर जो वास्‍तविक समस्‍या थी उसे प्रेम, प्‍यार, विश्‍वास और पता नहीं, मन में क्‍या-क्‍या सोच रहा था । मौका मिला तो मैं अपनी पत्‍नी पुराण, जो हकीकत है, उसको बयान करुँगा । आज्ञा दें ।