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Friday, October 12, 2018

आओ छोटा चार धाम यात्रा पर चलें – (भाग – 4)


(भाग – 4)
लक्ष्मण झुला दर्शन एवं बड़कोट की यात्रा







आपने अभी तक “आओ छोटा चार धाम यात्रा पर चलें – (भाग – 1) यात्रा पूर्व, आओ छोटा चार धाम यात्रा पर चलें – (भाग – 2) यात्रा पूर्व” एवं आओ छोटा चार धाम यात्रा पर चलें – (भाग – 3)  हरिद्वार (प्रथम पड़ाव एवं विधिवत रूप से चार धाम यात्रा का श्री गणेश) में पढ़ा कि कैसे ब्लॉग एवं अन्य माध्यम से जानकारी जुटा कर मैंने यात्रा से संबंधित एक बारह दिवसीय कार्यक्रम की रूप-रेखा बनाई. जब विश्वसनीय वेब-साईट से पता चला कि सड़क एवं मौसम यात्रा के लिए अनुकूल है तब जाकर हमलोग ने अपनी यात्रा प्रारंभ की. रास्ते में लकड़ी माफ़िया का कारवाँ देख कर जंगल एवं पहाड़ों की दुर्दशा का कारण सहज ही समझ में आ रहा था. हरिद्वार में यातायात समस्या से दो-चार होते हुए सुबह 6:30 बजे “हर की पौड़ी” पहुँचे और गंगा स्नान एवं शाम की आरती देख कर सहज ही मन में भक्ति भाव की लहरें उमड़ रही थी. “हर की पौड़ी” की मनोरम दृश्य को दिल में सहेज कर यात्रा का  अगला पड़ाव बड़कोट जाने का सपना लिए हम  सभी अपने-अपने बिस्तर पर सो गए.      
अब आगे ....

सुबह 5: 30 बजे हमलोग बड़कोट के लिए रवाना हो गए. इससे दो फायदा हुआ एक तो हरिद्वार से “हर की पौड़ी” के बीच की वाहनों की भीड़ से बच गए और हमें अतिरिक्त दो घंटे मिले जिसमें ऋषिकेश का संक्षिप्त भ्रमण हो सका. तो हमलोगों का पहला पड़ाव ऋषिकेश था. हमलोग करीब 6:30 बजे ऋषिकेश पहुँचे. लक्ष्मण झुला से लगभग एक किलोमीटर पहले कार पार्किंग में कार खड़ी की कार पार्किंग के पीछे गंगा बह रही थी. गंगा के शीतल जल को छू कर आने वाली सुबह की हवा, मन-मस्तिष्क में आनंद संचार कर रही थी. कुछ समय वहाँ बिताने के बाद 7 बजे हमलोग लक्ष्मण झुला देखने पहुँचे. रास्ते में एक चौक पर श्री लक्ष्मण जी  की आदम कद प्रतिमा लगी हुई थी जो बरबस सभी को आकर्षित कर रही थी .



लक्ष्मण झुला जाते समय एक रास्ता गंगा किनारे जा रहा था. नदी के किनारे छोटे-बड़े पत्थर फैले हुए थे और कहीं पत्थरों के ढेर लगे हुए थे. नदी के बीच कुछ लोग राफ्टिंग का आनंद ले रहे थे. नदी के दोनों तटों पर पुरुष, महिलाएँ एवं बच्चे जल-क्रीड़ा का आनंद ले रहे थे. हम सभी भी गंगा की मंद गति से बहते  जल और मंद गति से बहती शीतल हवा के प्रभाव में आकर वहाँ पहुँचने के लिए उतावले हो रहे थे. परन्तु हमलोगों ने खुद को समझाया कि पहले हमलोग लक्ष्मण झुला देखेंगे उसके बाद आस-पास के  मंदिरको  देख  कर लौटेंगे फिर यहाँ आकर मस्ती करेंगे.

कुछ ही देर में गंगा नदी के दोनों किनारों पर दो-दो स्तम्भ एवं लोहे के रस्सियों पर टिका एवं हवा में लटका हुआ विशाल सेतु हमलोगों के सामने था. सेतु के दुसरे छोड़ पर, बायीं तरफ एक बहुमंजिला पिरामिड के आकार का भव्य "तेरा मंजिला मंदिर", सेतु के नीचे बहती गंगा नदी और पहाड़ी से घिरा यह सेतु, सभी मिलकर अनुपम छटा बिखेर रहे थे और सभी तीर्थ यात्री कुछ पल के लिए ठिठक कर  रुकते और इस नयनाभिराम स्थल को अपलक देख हुए सेतु की तरफ बढ़ते. सेतु, झूले जैसा लगता है जब आप इस सेतु से गुजरते है और रामायण काल में श्री लक्ष्मण जी जूट के रस्सी से बने सेतु से गंगा जी को पार किया था. इसलिए इसका नाम लक्ष्मण झुला पड़ा. सेतु को पार करते ही शंकर जी की मूर्ति चौक पर विराजमान मिलती है. आस-पास के मंदिर दर्शन कर हमलोग आधा घंटा गंगा नदी के लहरों के साथ मौज-मस्ती कर बड़कोट के लिए प्रस्थान किए तो रास्ते में राम झुला दिखा जिसका रामायण काल से कोई लेना-देना नहीं है. आइए आप लोग यहाँ की झलकियाँ तस्वीरों के माध्यम से देखें :








हमलोगों का काफिला राम झुला का दर्शन कर आगे बढा तो ऋषिकेश में सैलानियों का हुजूम चारों तरफ मौजूद था परन्तु  सब के मकसद अलग-अलग थे . कोई गर्मी से निजात पाने के लिए, तो कोई एड्वेंचर के लिए, कोई प्रकृति का नज़ारा लेने के लिए, तो कोई  तीर्थ यात्रा के लिए और कुछ विदेशी सैलानी भारत को जानने के लिए. खैर! कुछ दुर  भीड़-भाड़ का नज़ारा देखने को मिला. उसके बाद भीड़-भाड़ से निजात मिल गई  और  हमारी कार  चमकते हुई चौड़ी सड़कों पर सरपट भागने लगी, लगा ही नहीं कि हम दुर्गम पहाड़ी पर चढ़ रहें हैं. वहाँ की सड़कें जी.टी. रोड जैसी   लग रही  थी  और उस पर सुविधा यह कि टोल टैक्स भी नहीं देना पड़ रहा था.



हमलोग एक घंटे के बाद रास्ते में टी-ब्रेक लिए और दोपहर के भोजन के लिए चंबा में रुके. 
चंबा होटल के पीछे का दृश्य 


अखरोट का पेड़ 

हरा अखरोट 

जब हमलोग धरासू से बड़कोट के तरफ जैसे ही मुड़े थे कि मौसम अपना तेवर दिखाना शुरू कर दिया. अचानक काले बादलों  ने पहाड़ों को चारों तरफ से  घेर लिया और सामने जो सड़क दिखी वो दिल दहलाने केलिए काफी थी. सड़क के नाम पर पत्थर एवं गड्ढ़े थे. सड़क निर्माण का कार्य अभी शुरू ही हुआ  था . करीब दो किलोमीटर हमलोगों की कार रेंगती हुई आगे बढ़ रही थी. खास्ता हाल सड़क एवं बूंदा-बांदी के कारण, हम सभी भगवान् से प्रार्थना कर रहे थे कि किसी तरह हमलोग बड़कोट पहुँच जाए. मुसलाधार बारिश हो रही थी परन्तु सड़कें अब अच्छी थी. कुछ देर के बाद मौसम और अधिक ऊचाई के कारण बच्चों को उल्टी और अचानक से ठंड लगने लगी. हमलोग घबड़ा गए. अभी भी बड़कोट पहुँचने में आधा घंटा लगना था, तभी अचानक एक छोटा पत्थर हमलोगों के कार के आगे गिर कर लुढ़कता हुआ गहरे खाई में चला  गया. भगवान्-भगवान् करते हुए करीब 7 बजे हमलोग  बड़कोट पहुँचे. जहाँ पर पहला होटल दिखा  हमलोग वहीं  रूक गए. जहाँ हमलोग रुके थे वहाँ से दाहिने तरफ यमनोत्री का रास्ता था और सीधा दो किलोमीटर पर बड़कोट क़स्बा था. हम सब असमंजस में थे कि बड़कोट क़स्बा चलें या यहीं पर रुकें. रास्ते में फर्स्ट-एड किट से उल्टी की दवा देने से बच्चों की स्थिति अब सामान्य लग रही थी. तब हमलोगों ने निर्णय लिया कि अभी यहीं रुकते है. बच्चे को आराम की आवश्यकता है और ख़ुदा न करे अगर तबियत ख़राब हुई तो कार से जाकर बच्चे को किसी डॉक्टर से दिखा लेंगे और अगर तबियत ज्यादा ख़राब हुई तो आगे की यात्रा नहीं करेंगे. कुछ देर आराम करने के बाद बच्चे फिर से सामान्य हुए तब जाकर सभी ने खाना खाया और बच्चे सो गए. 




बड़कोट होटल के पीछे का दृश्य 
शेष  19-10-2018 के  अंक में .................................

भाग -1  पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें :
“आओ छोटा चार धाम यात्रा पर चलें – (भाग – 1) यात्रा पूर्व

भाग -2 पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें :

“आओ छोटा चार धाम यात्रा पर चलें – (भाग – 2) यात्रा पूर्व


भाग -3 पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें :

आओ छोटा चार धाम यात्रा पर चलें – (भाग – 3)  हरिद्वार (प्रथम पड़ाव एवं विधिवत रूप से चार धाम यात्रा का श्री गणेश)

©  राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

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