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Thursday, August 28, 2014

संवेदनहीनता

चित्र इन्टरनेट से साभार 









संवेदनहीनता


वहाँ का मंजर,

जब से देखा है,

आँखों में समुन्दर का,

बोझ लिए चलता हूँ। 


कभी देखा है उनके आसुओं को,

जो कभी छलके ही नहीं।

 कभी सुना है उनके चीखों को,

जो कभी निकले ही नहीं।


 जिसका जीने का मकसद,

एक निवाला हो।

 न तन पे कपड़ा,

न रहने का ठिकाना हो।


ऐसी स्थिति में,

किसी को देख कर,

मानवीय संवेदनाएं,

सहानुभूति जगाती हैं,

पर स्वार्थ की चादर ओढ़,

ज़िन्दगी आगे निकल जाती है।


संवेदनहीनता की आग में,

आँखों का समुन्दर सूख गया,

मस्त हूँ अपनी ज़िन्दगी में,

जब से वो मंजर पीछे छूट गया.

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव 


Thursday, August 21, 2014

समाजवाद


समाजवाद


तेरी मेरी चाहत का 

मेल नहीं हो सकता है,

तुम्हें चाहिए चाँद-सितारे,

मुझे रोटी में ही सुख दिखता है। 


तुम्हें चाहिए ऋतु- भादों, शरद, बसंत,

मुझे जून में पसीना बहाना अच्छा लगता है.

तुम ढूढ़ते हो सुख- धन-दौलत में,

मुझे माँ के साये में सच्चा सुख मिलता है। 


तुम्हें पसंद है छल-प्रपंच,

मैं मासूम मुस्कानों में बिक जाता हूँ। 

तुम्हें मुबारक हो महल-चौबारे,

जहाँ नींद नहीं तुम्हें आती है। 

मुझको मेरी झोपड़ी ही प्यारी,

जहाँ टाट पे ठाठ से सो जाता हूँ। 


तेरी चाहत, मेरी चाहत

एक तभी हो सकते है,

समाजवाद का फूल खिलेगा,

सब को समान अधिकार मिलेगा,

सब को शिक्षा, सब हो स्वस्थ,

सबको रोटी, कपड़ा और मकान मिलेगा। 


आओ ! ऐसा समाज बनाएं,

जिसमें किसी को किसी से बैर न होगा,

तेरी चाहत, मेरी चाहत में,

बुनियादी कोई फर्क न होगा। 

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव 



Wednesday, August 13, 2014

बैधनाथ धाम एवं वैशाली गणराज्य की यात्रा भाग-4 (अंतिम भाग)

बैधनाथ धाम एवं वैशाली गणराज्य की यात्रा

भाग-4 (अंतिम भाग)


भाग-3 पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। 


विश्व का पहला गणराज्य लिच्छवि की राजधानी वैशाली के वैभवशाली इतिहास को कौन नहीं जानता है। इस स्थान का संबंध महात्मा बुद्ध, भगवान महावीर, चन्द्रगुप्त प्रथम, वैशाली की नगरवधू या राज नर्तकी आदि से है। भारत के वृज्जि गणराज्य की वैशाली नगरी के निकट कुण्डग्राम में पिता सिद्धार्थ और माता त्रिशला के यहाँ 599 ई. पूर्व जैन तीर्थंकर महावीर का जन्म हुआ। वैशाली, मेरे गृह नगर मुजफ्फरपुर से महज़ 32 कि.मी. एवं पटना से 60 कि. मी. पर स्थित है। अतः हमलोग दोपहर का खाना खाकर निजी वाहन से वैशाली दर्शन के लिए निकल पड़े। जापान सरकार के सहयोग से निर्मित सड़कों पर सफ़र आरामदायक रहा परन्तु जून की गर्मी ने स्थानीय भ्रमण को थोडा कष्टकारक बना रहा था। हमलोगों का पहला पड़ाव निप्पोंजान म्योहोजी और राजगीर बुद्ध विहार सोसाईटी के सहयोग से बनी विश्व शांति स्तूप था। यह सुबह 7 बजे से शाम 5 बजे तक खुला रहता है। शांत वातावरण और सुंदर बागवानी के बीच बना शांति स्तूप वाकई शांति का संदेश देता प्रतीत हो रहा था। द्वितीय विश्व-युद्ध के अंतिम चरण में जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर परमाणु बम के हमलों से आहत हो प्रेम और शांति का उपदेश देने हेतु विश्व-शांति के प्रवर्तक एवं निप्पोंजान म्योहोजीके अध्यक्ष निचिदात्सु फुजीई गुरूजी ने सद्धर्भ पुण्डरीक सूत्र (लोटस सूत्र) कि शिक्षा के अनुरूप पुरे विश्व में विश्व-शांति स्तूप का निर्माण करवाया।  इन्हीं के 99 वें जन्मदिवस के शुभ अवसर पर 20 अक्टूबर 1983 को वैशाली के इस विश्व-शांति स्तूप का शिलान्यास हुआ। गौतम बुद्ध के अवशेषों को स्तूप के नींव एवं कंगूरे को सुशोभित किया गया। बुद्ध की चार प्रतिमायें और कंगूरा का निर्माण पूरी के सुदर्शन साह (पदम श्री) एवं धर्म-चक्र एवं शेरों का निर्माण पटना के श्री लक्ष्मी पंडित ने फाईबर ग्लास से किया एवं उस पर सोने कि पालिश की हुई है।

शांति स्तूप के बगल में निप्पोंजान म्योहोजी (जापानी बुद्ध मंदिर) का दर्शन कर पुरातत्व संग्रहालय, वैशाली घूमने गए. यह वैशाली के प्राचीन टीलों के उत्खनन् से प्राप्त पुरावशेषों का संग्रह है। यहाँ छठी शताब्दी ई.पू. से बारहवीं शताब्दी ई.पू. की प्रस्तर प्रतिमायें, मृण्मय मानव एवं पशु-पक्षी की आकृतियाँ, हाथी दांत, अस्थि और सीप की बनी वस्तुएं, आभूषण, मुद्रायें एवं मुद्रा छाप, रजत एवं कांस्य के पिटे और ढले सिक्के प्रदर्शित हैं. यहाँ से विश्व-शांति स्तूप बहुत ही मनमोहक लगता है।

इसके बाद हमलोग उत्खनित अवशेष, कोल्हुआ गए। इसके परिसर में प्रवेश करते ही अपने आप को इतिहास में मौजूद होने का आभास मिलता है। इस स्थल को सुंदर पार्क में तब्दील कर दिया गया है. यहाँ पर भगवान बुद्ध ने अनेक वर्षावास व्यतीत किए। भगवान बुद्ध ने आखरी धर्मौपदेश यही पर दिया  और तीन महीने पूर्व अपने शीघ्र संभावित परिनिर्वाण की घोषणा भी यहीं पर की। भगवान बुद्ध ने यहीं पर पहली बार भिक्षुणियों को संघ में प्रवेश की अनुमति दी एवं वैशाली की अभिमानी राजनर्तकी आम्रपाली को एक विनम्र भिक्षुणी में परिवर्तित किया। भगवान बुद्ध के जीवन में आठ अनोखी घटनाओं  में से बंदरों द्वारा बुद्ध को मधु अर्पण यहीं पर घटित हुई थी और यहाँ का मुख्य स्तूप इसी घटना का प्रतीक है। ईटों से निर्मित यह स्तूप मूलतः मौर्य काल का है। उत्खननों के परिणाम स्वरुप कूटागारशाला, स्वस्तिकाकार विहार, पक्का जलाशय, बहुसंख्य मनौती स्तूप एवं लघु मंदिर प्रकाश में आए। इसके अतिरिक्त आंशिक रूप से दबे अशोक स्तम्भ एवं मुख्य स्तूप के अधोभाग को भी अनावृत किया गया। सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए प्रारंभिक स्तंभों में से एक जिस पर उनका कोई अभिलेख नहीं है, बलुए पत्थर का लगभग 11 मी. ऊँचा चमकदार एक एकाश्मक स्तम्भ है. जिसके शीर्ष पर एक सिंह सुशोभित है। कूटागारशाला में बुद्ध के वर्षावास के दौरान प्रवास करते थे। स्वस्तिकाकार विहार संभवतः भिक्षुणियों के लिए बनाया गया था। इसमें शौचालय का भी प्रावधान था। सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने 1861-62 में चीनी उल्लेख के आधार पर सीमित उत्खनन् से मिले साक्ष्यों से प्राचीन वैशाली की पहचान की। विगत वर्षों में पुरातत्ववेत्ताओं द्वारा अवशेषों के आधार पर एतिहासिक गाथाओं में वर्णित महान परम्पराओं से परिपूर्ण छठी शताब्दी ई.पू. लिच्छवी गणराज्य की राजधानी वैशाली थी। चौबीसवें जैन तीर्थकर भगवान महावीर की जन्म-स्थली भी वैशाली ही है। चौथी शताब्दी ई. के प्रारंभ में लिच्छवी राजकुमारी कुमार देवी का विवाह चन्द्रगुप्त प्रथम से हुआ। गुप्त साम्राज्य के पतन के साथ-साथ वैशाली का वैभव समाप्त हो गया। 

Wednesday, August 6, 2014

बैधनाथ धाम एवं वैशाली गणराज्य की यात्रा, भाग-3

बैधनाथ धाम एवं वैशाली गणराज्य की यात्रा

भाग-3

बैधनाथ धाम की कथा 

भाग-1 पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। 

श्री वैधनाथ धाम की कथा- पार्वती जी के कहने पर भगवान शंकर जी ने सोने का महल बनवाया और गृह-प्रवेश के लिए रावण के पिता विश्वश्रवा  को बुलाया।  विश्वश्रवा ने शंकर जी के कहने पर दक्षिणा स्वरुप सोने का महल ही मांग लिया। भगवान शंकर ने दक्षिणा में सोने का महल विश्वश्रवा को दे दिया जो बाद में लंका के नाम से प्रसिद्ध हुआ। पार्वती जी ने विश्वश्रवा को श्राप दिया “ हे लालची ब्राह्मण ! तेरी आनेवाली पीढ़ी इस महल का उपयोग नहीं कर सकेगी, तुम्हारा सारा वंश एक साथ नष्ट हो जाएगा। "   इसी श्राप को लेकर चिंतित रहने वाली रावण की माँ कैकसी ने रावण से कहा कि यदि भगवान शंकर लंका में नहीं आए तो हम सब का विनाश निश्चित है। यह सुनकर रावण भगवान शंकर को पाने के लिए कैलाश पर्वत पर जाकर घोर तप किया। उसने एक-एक कर अपने नौ सिर काट कर हवन कुंड में चढ़ा दिया। जब वह दसवां सिर चढाने वाला था तो भगवान शंकर प्रकट हुए। उन्होंने उसके चढ़ाये हुए नौ सिरों को यथावत् जोड़ कर वर माँगने को कहा। तब रावण ने भगवान शंकर से कहा कि यदि आप मुझ से प्रसन्न है तो आप मेरी नगरी लंका चल कर रहें। भगवान शंकर ने कहा कि मेरे बारह ज्योतिर्लिंग है। तुम मुझे जिस रूप में ले जाना चाहो ले जा सकते हो और इस लिंग को रास्ते में नीचे मत रखना नहीं तो मैं वहीँ स्थापित हो जाऊँगा। रावण ने जब माता पार्वती द्वारा पूजित आत्मलिंग को चुना तो पार्वती जी ने आचमन कर उसे उठाने को कहा। आचमन कर रावण आत्मलिंग को ले कर पुष्पक विमान से लंका के लिए चल पड़ा। रास्ते में आचमन के प्रभाव से उसे लघुशंका त्यागने कि इच्छा हुई। वहाँ खड़े ग्वाला को आत्मलिंग पकड़ा कर लघुशंका निवारण हेतु कुछ दूर चला गया। बहुत इंतज़ार करने के बाद ग्वाला, आत्मलिंग को धरती पर रख कर चला गया। जब रावण आया तो आत्मलिंग को स्थापित देख उसे उठाने की कोशिश की परन्तु भगवान शिव टस से मस नहीं हुए और रावण को बैरंग लंका लौटना पड़ा। देवघर ही वह स्थान है जहाँ आत्मलिंग स्थापित है।
  आत्मलिंग, माघेश्वरलिंग, कामदलिंग या कामनालिंग, रावणेश्वर महादेव, श्री बैधनाथ लिंग, मर्ग, तत्पुरुष और वामदेव या वैजुनाथ ये बाबा बैधनाथ के आठ नाम है. यहाँ सती का ह्रदय गिरा था और चिता बनाकर अंतिम संस्कार हुआ अतः बाबा बैधनाथ मंदिर शक्ति पीठ भी है। इसलिए इस चिताभूमि को हार्द्रपीठ बैधनाथ भी कहते है। मंदिर के भीतरी प्रकोष्ठ में शिवलिंग के उपर एक चंदोवा लगा है जिससे बूंद-बूंद जल गिरता रहता जो चातुपाश्र्व आकार के अष्टदल कमल के बीच चंद्रकांता मणि से निकलता है। समझा जाता है कि यह मणि कुबेर की राजधानी अलकापुरी में थी जिसे रावण ने लाकर मंदिर में लगवाया था। 



पूर्वी, पश्चिमी एवं उत्तरी दिशा से मंदिर में प्रवेश करने के लिए तीन प्रवेश द्वार बने हैं। मुख्य प्रवेश द्वार उत्तर दिशा में है इसे सिंह द्वार भी कहते है। जब सिंह द्वार से प्रवेश करेंगे तो बायीं तरफ रावण द्वारा निर्मित चंद्रूप कुआं है। इससे आगे बढ़ने पर बायीं तरफ पार्वती जी का मंदिर है जिसके अन्दर दो प्रतिमाएं हैं, बायीं तरफ पार्वती जी एवं दायीं तरफ दुर्गा जी। इनका मुख मध्य में बने बाबा बैधनाथ मंदिर की तरफ है। 
इन दोनो मंदिरों के शिखर लाल धागे से जुड़े रहते हैं। लाल धागा शिव-शक्ति के वैवाहिक संबंध का घोतक है और इस संबंध को अविच्छिन्न बनाए रखने हेतु ही लाल धागा बांधने की यह परम्परा चली आ रही है। 
 शादीशुदा जोड़ा दोनों मंदिरों के शिखर को लाल धागे से जोड़ते है जिसे गठबंधन भी कहते है। इसका मूलभाव यह है कि जैसे शिव-पार्वती का संबंध है वैसा ही संबंध हम दोनों पति-पत्नी में हो।  इन दो मंदिरों के अलावा 21 अन्य मंदिर है जो मंदिर के प्रांगन को भव्य बनाते है। सिंह द्वार से बाहर लगभग 50 मी. उत्तर निकलने पर शिव गंगा जलाशय है जिसका उद्भव रावण के लघुशंका निवारण के बाद हाथ धोने के लिए धरती पर रावण के मुक्का मारने से हुआ। 


समुद्र मंथन का कार्य श्रावण माह में हुआ था और उससे निकले हलाहल का पान भगवान शंकर ने किया। विष के प्रभाव को कम करने के लिए भगवान शंकर ने चन्द्रमा को सर पर धारण किया और विष के जलन को कम करने के लिए सभी देवता, बाबा भोलेनाथ को गंगा जल चढ़ाने लगे। तभी से भक्तगण शिवलिंग पर जल चढ़ाते है और विशेष कर श्रावण माह में शिव भक्त कांवड़ में गंगाजल लेकर नंगे पाँव चलकर बाबा भोलेनाथ को जल चढ़ाते है. देवघर से 105 कि.मी. उत्तर सुल्तानगंज में गंगा उत्तरायण होकर बहती है. वही से भक्त कांवड़ में गंगाजल लेकर नंगे पाँव बाबा बैधनाथ को जल चढ़ाने आते हैं। 
बारह ज्योतिर्लिंग है और प्रत्येक ज्योतिर्लिंग की पूजा से अलग-अलग कार्य सिद्ध होते है जैसे मोक्ष के लिए काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की  पूजा, मरण,मोहन उच्चाटन से मुक्ति के लिए उज्जैन के महाकाल ज्योतिर्लिंग, शांति और शीतलता के लिए सौराष्ट्र में स्थित सोमनाथ ज्योतिर्लिंग आदि. परन्तु सभी मनोकामनाओं की पूर्ति , देवघर स्थित बैधनाथ ज्योतिर्लिंग की पूजा से होती है.



बम-बम भोले आप सभी पर कृपा करें.

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव 

 

Wednesday, July 30, 2014

बैधनाथ धाम एवं वैशाली गणराज्य की यात्रा, भाग-2

बैधनाथ धाम एवं वैशाली गणराज्य की यात्रा

भाग-2

बैधनाथ धाम की यात्रा वृतांत 

सभी धर्मों में मनौती मानने की प्रथा है। जब किसी कठिन कार्य जो केवल आपके कर्म पर आधारित न हो कर, भगवद् कृपा पर भी निर्भर हो तो लोग मनौती मानते हैं।  ऐसे तो प्रत्येक कार्य बिना भगवद् कृपा के संपन्न नहीं हो सकती।  खैर! यह विश्वास का मामला है, मौका मिला तो विस्तार में चर्चा होगी।  हँ! मनौतियों के बारे में मेरी एक धारणा है कि कठिन कार्य सफलता पूर्वक संपादित होने के फलस्वरूप इच्छित मनोकामना पूर्ण होने के बाद लोग अक्सर मनौती या तो भूल जाते हैं या उसको पूरा करने में किसी न किसी कारण से टाल-मटोल करते है और जब सभी तरफ से निश्चिंत हो जाते हैं तो मनौती याद आती है और इस तरह मनौती को पूरा करने में वर्षों लग जाते हैं। 

मैंने यहाँ मनौती का जिक्र इसलिए किया कि मेरी इस यात्रा का संबंध भी मनौती से है।  हुआ यूँ कि जब मेरी शादी तय हुई तो मेरे श्वसुर जी ने यह मनौती मानी कि शादी के बाद वे सपरिवार, अपनी इकलौती बेटी अर्थात् मेरी श्रीमति जी एवं दामाद अर्थात् मैं, बाबा बैधनाथ के समक्ष हाज़िर होंगे।  और जैसा मैंने ऊपर अपनी धारणा के बारे में लिखा है उसी के अनुरूप जब उनके दोनों बेटों की भी शादी और उनके भी बच्चे हो गए तो मनौती को पूर्ण करने का मौका मिला और इसी मंशा को लेकर मैंने अपनी यात्रा का शुभ-आरंभ पंजाब से 15 जून को शुरू किया।  18 जून को मुजफ्फरपुर से देवघर का सफ़र, निजी वाहन से प्रातः 7 बजे प्रारंभ हुई।  बिहार की राष्ट्रीय-राज्य मार्ग की स्थिति अच्छी होने के कारण सफ़र आरामदायक रहा।  रास्ते में बारिश होने के कारण मौसम भी सुहाना हो गया।  गर्मी एवं धूल के कारण जो पेड़ मुरझाये से लग रहे थे बारिश से धुल जाने पर वही पेड़ चमक रहे थे और ऐसा लग रहा था मानो बारिश होने की ख़ुशी में वे हमलोगों के साथ झूम रहे हैं।  झमाझम बारिश में चमकती काली सड़क पर सरपट दौड़ती गाड़ी में से प्रकृति को गोल-गोल नाचते हुए देखना एक सुखद अनुभव होता है। यात्रा के दौरान हमलोग राष्ट्र कवि रामधारी सिंह “दिनकर” के जन्म-स्थली सिमरिया से गुजरे। यहाँ से गुजरते वक्त मेरा कवि ह्रदय और हिंदी प्रेमी मन वहाँ रुकने को बेचैन हो रहा था। परंतु समयाभाव के कारण ऐसा संभव न हो सका।  तभी थोड़ी देर बाद दिनकर चौक (जीरो माइल, बेगुसराय एन.एच. 31) पर राष्ट्र कवि रामधारी सिंह “दिनकर” की आदम कद प्रतिमा को देखा तो वहाँ उनको नमन करने का लोभ सवाँर न सका।  वहाँ कुछ पल के लिए रुके  मैं तो भावुक हो रहा था।  इसी बीच मेरे पुत्र कृष्ण ने उनकी कुछ तस्वीरें ली। 

 इसके कुछ देर बाद ही गंगा नदी का दर्शन और उसके ऊपर दो तले राजेन्द्र सेतु से गुजरने का अनुभव अनोखा था।  नीचे के तले पर रेलगाड़ी के गुजरने से हो रही कंपन को हमलोग ऊपर के तले जा रही अपनी गाडी में महसूस कर रोमांचित हो रहे थे और उतनी ऊचाई से गंगा नदी का विहंगम दृश्य का अवलोकन करना अपने-आप में अदभुत था।  इसके बाद झारखंड राज्य में प्रवेश किया तो ऐसा लगा जैसे प्रकृति ने करवट ले ली हो।  मैदानी इलाका पथरीले टीलों, पहाड़ों एवं जंगलों में तबदील हो गए।  बस्तियां सघन से विरल होती चली गई।  कई-कई किलोमीटर की दूरी पर घर, होटल या पेट्रोल-पंप दिखाई दे रहे थे परंतु हरियाली का साथ यदा-कदा ही छूट पाया। इन्हीं नजारों में खोए शाम को 5 बजे देवघर पहुँचे।  जहाँ हमलोग रुके थे वहाँ से मंदिर का प्रांगन 300 मीटर की दुरी पर था अतः हमलोग तैयार हो कर बाबा बैधनाथ का श्रृंगार देखने को निकल पड़े। बाबा का श्रृंगार संध्या के समय शुरू होता है।  बाबा का अद्वितीय स्वरूप के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ।  शिवलिंग के ऊपर फूलों का मुकुट और मुकुट के ऊपर फूलों से ही बनी शेषनाग की आकृति, कलात्मक रूप से बनाई गई थी।  फूलों का यह मुकुट वहाँ के कैदियों द्वारा बनाया जाता है और वह बाबा के श्रृंगार का हिस्सा बनता है। 

19 जून को सुबह हमलोग तैयार होकर बाबा को जल चढाने लिए चल दिए। मंदिर में काफी चहल-पहल थी।  जगह-जगह पर माली फूल, माला, बेलपत्र आदि से सजे पत्ते के दोने बेच रहे थे।  जगह-जगह पर पंडे थे। कहीं श्रृंगार का सामान बिक रहा था, कहीं हवन हो रहा था। बाबा के मुख्य द्वार के सामने ऊँचे स्थान पर विशेष हवन हो रहा था। फोटोग्राफर बहुतायत की संख्या में मौजूद थे, जो फोटो खींच कर आपको पाँच मिनट में फोटो का प्रिंट भी दे जाते हैं। सुबह हो या शाम बाबा के दरबार में मेला लगा ही रहता है। 

 हमलोगों ने फूल, माला, बेलपत्र आदि से सजे पत्ते के दोने ख़रीदे और लोटे में जल भरकर चल पड़े बाबा को जल चढाने। कतारबद्ध हो कर सभी मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश कर रहे थे। कतार में कोई मंत्र का जाप कर रहा था तो कोई बम-बम भोले का नारा लगा रहा था। बाबा का साक्षात् दर्शन बिना कष्ट के संभव नहीं था। अतः मुझे थोड़ा सा धक्का लगा और जब मैं चेतन अवस्था में आया तो साक्षात् शिव जी मेरे सामने दिख रहे थे। मैंने जल और फूल, माला, बेलपत्र आदि चढ़ा कर भाव-विभोर होते हुए बाबा का दर्शन कर माता सती एवं दुर्गा जी का दर्शन किया और मंदिर की परिक्रमा कर उत्तर द्वार जिसे सिंह द्वार भी कहते हैं से होते हुए शिव-गंगा सरोवर को देखा। सुबह 8 बजे हमलोग बाबा बासुकी नाथ के लिए चल पड़े जो देवघर से 46 कि.मी. पर स्थित है। कहते हैं कि बाबा बैधनाथ धाम यात्रा का संपूर्ण लाभ तब तक नहीं मिलता जब तक बाबा बासुकी नाथ का दर्शन न हो जाए। बाबा बासुकी नाथ के मंदिर की संरचना थोड़ी सी बाबा बैधनाथ से भिन्न थी परंतु अन्य सभी स्थिति बाबा बैधनाथ मंदिर के सामान थी। 

हमलोगों ने बाबा बासुकी नाथ जी एवं पार्वती जी का दर्शन किया और मंदिर की परिक्रमा कर बाहर आ गए। वहीँ स्थानीय व्यंजन का लुत्फ़ उठा कर त्रिकुट पर्वत के लिए चल पड़े जो लौटने में देवघर के रास्ते में पड़ता है। 

त्रिकुट पर्वत, देवघर से 18 कि.मी. पर स्थित है और मुख्य मार्ग से उतर कर लगभग 1 कि.मी. जाना पड़ता है। पर्यटक को पहाड़ के ऊपर जाने की लिए रोप-वे. बनाया गया है, जिसका प्रति सवारी आने-जाने का किराया 80 रु है। बच्चे रोप-वे पर चढ़ने के लिए अति उत्साहित हो रहे थे। परन्तु जब हमलोग सुबह करीब 11 बजे त्रिकुट पर्वत के टैक्सी स्टैंड पर पहुँचे तो वहाँ आकाश में काले मेघों का साम्राज्य था। ठंडी हवाएँ जोरो से चल रही थी।  वहाँ का नज़ारा बहुत ही लुभावना लग रहा था परन्तु बच्चे आशंकित थे कि कहीं बारिश हुई तो रोप-वे कार्यक्रम पर पानी फिर जाएगा। बच्चे तब और निराश हो गए जब वहाँ के स्थानीय लोगों ने कहा कि मौसम खराब होने पर रोप-वे की सेवा बंद हो जाती है। श्रीमती जी भी स्थानीय लोगों की बात से सहमत थी और वे रोप-वे की सवारी करने से इनकार कर दी। इतना नजदीक आकर दर्शनीय स्थल ना देखूं ये मेरे घुमाक्करी स्वभाव के विपरीत था। इसलिए मैंने कहा कि रोप-वे स्टेशन चलते है अगर बंद हुआ तो हमलोग वापस आ जायेंगे। यह सुनकर बच्चों में उत्साह की लहर दौर पड़ी।  हमलोग अभी चलना शुरू किए थे कि बूंदा-बांदी शुरू हो गई। सब जल्दी-से-जल्दी रोप-वे स्टेशन पहुँचना चाह रहे थे।  परन्तु अभी दस कदम ही बढ़े थे कि मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। करीब आधे घंटे के बाद बारिश बंद हुई तो हमलोग रोप-वे की तरफ चल पड़े। रोप-वे की सेवा चल रही थी। अतः हमलोग टिकट ले कर त्रिकुट पर्वत पर आ गए। वहाँ के स्थानीय गाईड ने कहा कि गाईड के बिना आपलोग सभी जगह घूम नहीं पाएँगे। मैं किसी भी पर्यटक स्थल पर गाईड लेना पसंद नहीं करता हूँ। अतः मैंने मना कर दिया परन्तु मेरे साले साहब ने 100 रु. में उसी गाईड को साथ ले लिया क्योंकि रोप-वे के नियमानुसार 1 घंटे के अन्दर रोप-वे से नीचे उतरना भी था। जंगल में पगडंडी पर चलना, भ्रमण को रोमांचकारी बना रहा था। वहाँ सात मुख्य दर्शनीय स्थल हैं।  दो स्थान देखने के बाद लगा कि गाईड को बेकार ही साथ लिए। ऐसे गाईड बहुत ही व्यवहारिक एवं खुश मिज़ाज के साथ बढ़िया फोटोग्राफर भी था। उसने बहुत सी कलात्मक तस्वीरें भी खींची। ऐसे त्रिकुट पर्वत एक रमणीक स्थल है और घूमने में आनंद आ रहा था। गाईड के प्रति मेरा उस समय नजरिया बदल गया जब उसके सहारे 100 फुट ऊँचे पहाड़ पर हमलोग चढ़ पाए अन्यथा हमलोग वहाँ पहुँच नहीं पाते और पर्वतारोहण का रोमांचक एहसास से वंचित रह जाते। 

अतः आप जब भी त्रिकुट पर्वत जाएं तो गाईड को अवश्य साथ लें। बच्चों के साथ-साथ हम बड़े भी त्रिकुट पर्वत के सैर का आनंद लेकर वापस नीचे आए और नौलखा मंदिर के लिए चल पड़े जो देवघर से 1.5 कि. मी. पर स्थित है। रथ के आकार का यह कृष्ण का मंदिर बेलूर के रामकृष्ण मंदिर से मिलता-जुलता है। देखने में मंदिर बहुत ही भव्य है और इसके प्रांगण में बैठने पर आत्मिक शान्ति का अनुभव हो रहा था। 
20
मई को मेरी शादी का सालगिरह थी अतः सुबह नियत प्रोग्राम के तहत हमलोग बाबा को जल चढ़ा कर वापस अपने घर को चल दिए। 


देवघर के लिए मुख्य रेलवे स्टेशन जसीडिह है. अगर काँवर लेकर नहीं जाना हो तो श्रावण के महीने में देवघर न जाए क्योंकि इन दिनों लाखों कि संख्या में शिव-भक्त बाबा को जल चढ़ाने पहुँचते है। 

अगले अंक में आप पढेंगे कि क्यूँ रावण कैलाश पर्वत से भगवान शिव को लंका लाना चाहता था एवं श्री वैधनाथ धाम की स्थापना कैसे हुई? 

बम-बम भोले आप सभी पर कृपा करें.

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव