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Friday, March 31, 2017

वाक्यांश – भूत


वाक्यांश – भूत   

दीनानाथ जी की बहू को आए दिन भूत चढ़ जाता, जिसके कारण दीनानाथ एवं उनकी पत्नी बहुत परेशान रहते। बहुत टोना-टोटका करवाया, पीर-फक़ीर और दरगाह के गंडे-ताबीज़ भी बहू के गले एवं बाजुओं में बंधवाये, परन्तु बहू की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। थक हार कर दीनानाथ जी दुसरे गाँव के ओझा के पास अपने बहू को ले कर गए। 

ओझा ने दीनानाथ जी को कहा – “बहू का भूत झाड़ कर आता हूँ तब तक आप बाहर बैठिए।”

ओझा जी ने बंद कमरे में बहू से पूछा – “सच-सच बताओ! क्या बात है? मैं तुम्हारे गाँव का भी नहीं हूँ और ना ही मैं तुम्हारे गाँव के किसी व्यक्ति को जानता हूँ।”

इतना सुनकर बहू आश्वस्त हो कर बोली – “ओझा जी ! मेरा परिवार बड़ा है और घर में सास, ननद और जेठानियाँ है पर काम में कोई हाथ नहीं बटाता है।”

इतना सुनकर ओझा जी बाहर आकर दीनानाथ जी को कहा – “दीनानाथ जी आपकी बहू का भूत उतार दिया है, बस ख्याल रखें कि बहू, आग एवं पानी में ज्यादा समय ना बिताएं। 

अब दीनानाथ जी के यहाँ खुशहाली है क्योंकि उनके घर की सारी औरतें मिल-जुल कर काम करती हैं। 

* पढ़िए मेरी एक कहानी वाक्यांश – "इच्छा-मृत्यु"। 

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"






Wednesday, March 29, 2017

वाक्यांश – "इच्छा-मृत्यु"



वाक्यांश – "इच्छा-मृत्यु"


एक दिन सुबह, जब मैं सैर करने निकला तो एक लड़की ने अटकते हुए आवाज़ दी – “अंकल जी !”

मैं उस अनजान, पतली-दुबली और जिसकी उम्र करीब चौदह-पंद्रह साल होगी, लड़की की तरफ मुखातिब होते हुए बोला – “क्या बात है?”

देखने में गरीब परिवार की लग रही थी और डरी हुई भी थी। 

उसने, अपने गले को साफ़ कर, ऊँगली से इशारा कर के बोली – “ वो मुझे कुत्तों से डर लगता है।”

मेरी नज़र उसके इशारे की तरफ मुड़ी । मुझे सुनसान सड़क के किनारे कुछ दूरी पर तीन-चार आवारा कुत्ते दिखे और मैं उसके साथ कुछ दूर चला। जब उसे लगा की कुत्तों से अब कोई खतरा नहीं है तो वह दौड़ कर पास के एक मकान में चली गई। 

तब से अक्सर वो लड़की मुझे वहीँ मिल जाती थी। बात-चीत से पता चला कि उसका नाम सरला है और वो उस घर में नौकरानी का काम करती है। 

एक दिन जब मैं सैर करने उसी रास्ते से जा रहा था तो वहाँ कुछ लोग इक्कठे खड़े थे। मैं उनमें से एक को जानता था। 

मैंने कहा – “शर्मा जी ! आज सुबह-सुबह यहाँ आप लोग इक्कठे क्यूँ हैं, सब खैरियत तो है। 

तब शर्मा जी ने कहा – “ श्रीवास्तव जी ! क्या बताएं, घोर कलयुग आ गया है। मिश्रा जी के यहाँ सरला नाम की बच्ची घर का काम करने आती थी। कल सुबह कुछ दरिंदों ने उसकी इज्ज़त लूटी और जख्मी कर अर्द्ध-नग्न अवस्था में इस सड़क के किनारे छोड़ कर भाग गए।”

मुझे यह सुनकर बहुत दुःख हुआ और साथ में अफ़सोस भी कि कल मैं सैर करने क्यों नहीं आया था। मुझे शर्मा जी से ही पता चला की सरला का ईलाज सिविल अस्पताल में चल रहा है। मैं भागता हुआ उसके पास पहुँचा। 

मुझे देख कर उसने बिलखते हुए कहा – “ अंकल जी ! आप मुझे कल सुबह क्यों नहीं मिले। जब वे कुत्ते मुझ पर झपटे तो मुझे आपकी बहुत याद आ रही थी और जब वह दरिंदे मुझे अर्द्धचेतन अवस्था में छोड़ कर भाग गए तो मेरे मन में इच्छा-मृत्यु की कामना उठ रही थी कि काश सच में गली के कुत्तें कल मुझे नोच खाते तो कितना अच्छा होता।”

उसकी बातों को सुनने के बाद मेरी आँखों में आँसू आ गए पर उसको देने के लिए मेरे पास सांत्वना के शब्द भी नहीं थे। 

चित्र  http://www.dnaindia.com/ से साभार

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"





Friday, March 24, 2017

Photography Bird - 1 (फोटोग्राफी - पक्षी-1)

Photography: (dated 19 03 2017 12: 30  AM )

Place : Kapurthala, Punjab, India

Red-wattled lapwing




A famous bird in the category of red-wattled lapwing.


I am not an ornithologist, but I do not know why whenever I see a bird, I am ready to take photographs. It was ready to go for a ride on Sunday. There was also a camera in hand. Only then did the Sharif bird be imprisoned in my camera or if the bird came to hand.

टिट्टिभ(टिटिहरी)(Red-wattled lapwing )वर्ग का एक प्रसिद्ध पक्षी।


मैं कोई पक्षी विज्ञानी नहीं हूँ, परंतु पता नहीं क्यूँ मैं जब भी कोई पक्षी देखता हूँ तो उसकी तस्वीर लेने को मचल उठता हूँ। रविवार को भ्रमण हेतु जाने को तैयार था हाथ में कैमरा भी था तभी ये शरीफ़ पक्षी मेरे कैमरे में कैद हो गया नहीं तो पक्षी कहाँ हाथ आते है। 

 (अन्य भाषा में नाम का स्रोत - http://birds.thenatureweb.net/):-


Assamese: বালিঘোৰা, Bengali: হটটিটি, Gujarati: ટીટોડી, Hindi: टिटहरी, Kannada: ಕೆಂ ಟಿಟ್ಟಿಭ, Malayalam: ചെങ്കണ്ണി തിത്തിരി, Marathi: टिटवी, ताम्रमुखी टिटवी, Nepali: हुटिट्याउँ, Sanskrit: ताम्रमुखी टिट्टिभ, Tamil: சிவப்பு மூக்கு ஆள்காட்டி







- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"







Wednesday, March 22, 2017

खुशी का मन्त्र

















खुशी का मन्त्र 

खुशियाँ फैली यहाँ चारो ओर,
मन क्यों भागता है दुःख की ओर,
जीने का मज़ा तभी आएगा
जब मन देखेगा खुशी की ओर। 

मन में दुख है बस एक कारण से,
पर खुशी मिल सकती हज़ारों से,
तो फिर मत सोचो एक कारण को 
ख़ुशी ले लो! चाहने वालों से। 

खिड़की खोल, तुम प्रकृति को देखो,
फूल, पेड़ औ' पक्षी को देखो,
ख़ुशी से चेहरा खिल जाएगा
रोते हुए को हँसा कर देखो। 

छोड़ो, जाने दो, को मानो तुम, 
निराशा का साथ भी छोड़ो तुम,
दुःख दे जो, उसे तुम नहीं सोचो
खुशियाँ दे, उसके साथ चलो तुम। 

आस व अपेक्षा दुःख देता  है,
जो चाहा, नहीं सदा मिलता है,
खुश रहना है तो खुद को बदलो
सभी बदलें, ये नहीं होता है।

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"




Wednesday, March 15, 2017

भरोसा

("अत्यधिक  भरोसा  खतरे  को  जन्म  देता  है।")

    



         

     

      भरोसा

असहिष्णु शब्द का मर्म खूब जानते हैं वे। 
देश कैसे बंटे? ये खूब जानते हैं वे। 

जब से मैंने ये लिख दिया है अख़बार में,
मुझको ज़िन्दा देखना नहीं चाहते हैं वे।

तथा-कथित देशभक्त भी जानने लगे मुझे,
उनके मुताबिक़ मैं लिखूँ ये चाहते हैं वे। 

अपना दल बनाकर राजा बन बैठें है जो 
गणतंत्र में राज चले कैसे, ये जानते हैं वे। 

उम्र भर उनको शासन करते हुए देखा है,
अब वंश करेगा शासन ये जानते हैं वे। 

भोली वोटर दुविधा में हैं किस दल को चुने,
कुछ नहीं बदलने वाला ये जानते है वे।

जो तमाम उम्र नहीं की माँ-बाप की सेवा,
उनके चित्र से घर सजाना जानते है वे।

आज हाथ जोड़े नेता खड़ा है जो "राही",
कल सर झुकेगा सभी का, ये जानते है वे।


- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"