मेम्बर बने :-

Thursday, November 1, 2012

जीवन का अस्तित्व-एक विचार


जीवन का अस्तित्व-एक विचार 

पानी की बूंद की उत्पत्ति का रहस्य भी अजीब है | मैंने बहुत  सोचा, परन्तु समझ न सका , कहाँ से आया और इसका क्या हश्र होगा? खैर ! बूंद, जिसकी शायद नियति ही थी उसकी  उत्पत्ति का कारण|

  बूंद तो अपने आप में मग्न थी क्योंकि वह अपने आप को बादल का एक सदस्य समझ कर अनेक बूंदों के साथ आकाश में विचरण कर रही थी  परन्तु एक दिन अचानक अपने आप को धरती की तरफ गिरते हुए  महसूस किया  और इस गिरने में भी, वह अपने आप में आनन्द की अनुभूति  महसूस कर रही  थी। बूंद वाकई भाग्यशाली थी  कि वह नदी में जा गिरी   एवं लहरों के साथ ऐसे जा मिली  कि यह  भूल गई कि वह बादलों के साथ कभी आकाश में विचरण करती  थी | नदी  के मध्य, लहरों में हिलोरें लेते हुए अभी आगे बढ़ रही थी। अचानक वह किनारे कि तरफ चली गई  और अपने आप को एक पत्थर से टकराते हुए महसूस किया और उछल कर फिर नदी के मध्य में जा मिली | आश्चर्य! बूंद फिर भी नहीं टुटी , लेकिन  बूंद को पाँच-दस पत्थर से टक्कर के बाद वह समझ गई  कि अब उसकी नियति पत्थरों से टकरा कर फिर नदी में मिल जाना ही है | फिर एक  दिन नदी के किनारे किसी महापुरुष के वाणी से पता चला कि नदी की  मुक्ति, सागर में मिलने पर ही है|बूंद अब इस एहसास के साथ समय बिताने लगी  कि सागर में किसी प्रकार जा कर मिले तो शायद उसे  भी मुक्ति मिले, चूँकि नदी भी उन  जैसों से ही तो बनी  है ।

एक दिन ऐसा आया, बूंद ने अपने आप को अथाह सागर की  गोद में पाया परन्तु बूंद की किस्मत फिर भी नहीं सुधरी उसकी हालत पहले से और खराब हो गई पहले लहरों की आपस की लड़ाई फिर चट्टानों से टकरा-टकरा कर अपना सर फोडती  रही ,  फिर भी वह नहीं टूटी  लेकिन अंदर ही अंदर काफी टूट चुकी थी | वह संवेदनहीन हो कर सागर की  लहरों में शामिल होती  और चट्टानों से टकराती।

एक दिन वह अपने आप को बहुत हल्का महसूस कर रही थी  कि उसने थकी हुई आँखों से देखा तो उसे विश्वाश  न हुआ कि उसकी आकृति बूंद की तरह न होकर लम्बी धुँए की तरह हो गई और वह धरती से आकाश की ओर उड़ रही थी । असीम  शांति ! इस आनन्द की अनुभूति में कब आँखें बंद हो गई पता ही नहीं चला | जब ऑंखें खोली तो उसने  अपने आप को बादलों के बीच  पाया |

उफ्फ ! यह सफ़र कब तक ......    अपना जीवन भी निरंतर ऐसे ही चलता  रहता  है| जब हम बचपन में माँ-बाप के साथ रहते हैं तो   मजे की जिन्दगी जीते हैं| जब जवानी आती है तो कुछ दिन मज़े में काटते हैं, फिर जिम्मेदारी को निर्वाह करने हेतु अपने ही जैसे लोगों से प्रतिस्पर्धा करते हैं, एवं अधिक पाने के लिए गला-काट प्रतिस्पर्धा के बीच संवेदनहीन जीवन जीते हुए मौत को गले लगाकर इस दुनिया में फिर जन्म लेते है..................

बूंद की  परिणति अब सब ने है जानी,
जम गई तो बर्फ,
उड़ गई तो वाष्प
नहीं तो पानी ।
जीवन की  भी कुछ ऐसी ही है कहानी,
जड़ हो गए तो तमोगुणी,
सम हो गए तो सतोगुणी
और रम गए तो रजोगुणी|

-राकेश कुमार श्रीवास्तव

Thursday, October 25, 2012

जीवन साथी



       (पृष्ठभूमि :- स्त्री-पुरुष परस्पर पति-पत्नी के संबंध में जीवन  के बहुमूल्य समय व्यतीत करते है, पत्नी अपनी पुराने सभी संबंधो  को भुलाकर   नए संबंधो को आत्मसात  करने में  शेष जीवन  गुजार  देती है | विडंबना  यह है  कि  उसके जीवन  के अंतिम समय में केवल उसका   पति ही उसके होने या खोने का अर्थ जान पाता है | )



जीवन साथी

मेरे अंधेरे जीवन में,
तुम हो  सूरज की पहली किरण।
जब  भी गमों ने  घेरा है,
तुम ही लाई हो ख़ुशी  के  क्षण।
मैं भटका हूँ  पथ से कभी ,
तुमने दिखाया है मुझको दर्पण।
जब भी माँगा साथ तुम्हारा,
सदा दिया है मुझको समर्थन।
मेरे जीवन में खुशियों की  खातिर,
तुमने किया है जीवन अर्पण।
अब  तुम नहीं हो  नश्वर जगत में ,
कैसे आओगी खुश करने मेरा मन।
मैं तो कठोर अभिमानी  था,
तेरा मर्म न जान  सका,
मुझको तुम  तो माफ ही करना,
मैं तो हूँ अब तेरी शरण।
-राकेश कुमार श्रीवास्तव

सफ़र 



  (पृष्ठभूमि :- नायक अपनी नायिका को छोड़ कर किसी विशेष कार्य हेतु रेलगाड़ी  से  लम्बी  यात्रा  पर  निकलता   है   और  विरह  कि  आग  मै  जल  रहा   है |  इस जलन को  कम करने लिए नायक , नायिका  को याद   करते   हुए   अपने  मनोभाव को व्यक्त करता है | )


सफ़र 

तुझे छोड़ कर मै, सफ़र कर रहा हूँ,
मगर मेरे साथ, सदा चल रही है|
सुबह मै चला था, तू मेरे संग थी,
तेरी यादों में खोया , दिन भर  चला हूँ|
शाम हो रही है, सूरज ढल चुका  है,
मगर तू मेरे संग, चली जा रही है|
तेरे ख्यालों में , जिए जा रहा हूँ,
कभी हँस रहा हूँ, कभी मुस्कुरांऊँ   |
मुझे देख कर, लोग कर रहे इशारे,
मैं हो गया दीवाना, ये समझा रहे हैं|
चाँद आ गया, मगर तू वहीं है,
चाँद में भी बस, तुम्ही नजर आ रही हो|
तुझे भूलने की, जतन   मैंने की है,
सम्पूर्ण क्षितिज पर, तू छा गई है|
आँखें मूंदकर मैं, अब सोने लगा हूँ,
तेरी याद और भी, गहरा गई है|
अब मैं सो रहा हूँ, नींद आ गई है,
सपनों  में, तुम्हारी  याद आ रही है|
सुबह हो गई है, मैं जग गया हूँ,
चादर के सलवटों पे, तुझे ढूंढ़ रहा हूँ| 
अभी तू कहीं है, मगर मेरे दिल में,
मेरे साथ तू भी, सफ़र कर रही है|
तेरी याद न जाएगी, तू कहीं भी चली जा,
तेरी याद के बगैर, मैं जी न सकूँगा|
तुझे भूलाने का अब, जतन  न करूँगा,
तुझे छोड़ कर, अब सफ़र न करूँगा|
-राकेश कुमार श्रीवास्तव
(२९/०४/२००७)
३.

Monday, October 22, 2012

आशा


                      आशा 


तुम तो  इंसां     हो,
फिर भी  परेशां हो|
पा जाओ इससे   मुक्ति,
कर लो आशा से दोस्ती ।।
                                           राह न असां  हो,
                                           घोर निराशा हो।
                                           करना नहीं कोई गलती ,
                                           कर लो आशा से दोस्ती ।
बुरी संगति जीवन में,
मत पड़ो    व्यसन में ।
सुधार कर  अपनी संगति ,
कर लो     आशा से दोस्ती ।।
                                           मुश्किल डगर में ,
                                           नौका फंसी भंवर में।
                                           काम आए प्रभु की भक्ति ,
                                           कर लो आशा  से दोस्ती ।।
अनमोल    जीवन    है,
कुछ भी नहीं कठिन है।
तुम में है   बहुत   शक्ति ,
कर लो आशा से दोस्ती ।।


                                           

Tuesday, October 16, 2012

तन्हां

तन्हां

तन्हां तन्हां रह गया हूँ मैं।
आकर तन्हाईयों को दूर करो।।

मैं अँधेरों से घिरा रहता हूँ ।
प्यार का दीप जलाकर इसे गुलज़ार करो ।।

तेरी जज्बातों से मैं खेला हूँ ।
मेरी गुस्ताखियों को माफ़ करो ।।

लौट आओं हमारी दूनियाँ में ।
मौका देकर मुझ पे एहसान करो।।

जी नहीं सकता हूँ अब तेरे बगैर ।
आकर जीने का इंतजाम करो ।।

यकीं मुझ पे करो, ये असां तो नहीं ।
लौट आओं , मेरे एहसास को जिन्दा कर दो ।।