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Wednesday, March 11, 2015

कसक

कसक


अँधेरों में खुशियों की तलाश कबतक,
उँगलियों के स्पर्श से सुख की तलाश कबतक.

हमसफ़र गर तेरे एहसासों को ना समझे तो,
बेचैनियों के साथ जिन्दगीं बिताओगी कबतक.

अपने हिस्से की खुशियों को दफ़न करके,
झूठी मुस्कान से दर्द छुपाओगी कबतक.

अँधेरे में जो दर्द बह गए, बन कर आंसू,
सूनी आँखों को काजल से सजाओगी कबतक.

जख्म हो शरीर पर तो इलाज़ है उसका,
जख्मी दिल के साथ रिश्ता निभाओगी कबतक.

जिस रस्मों-रिवाजों की वजह से ठुकराया था मुझे
उन रस्मों-रिवाजों के सितम तुम सहोगी कबतक.

तेरे हालात को देखकर ये ख्याल आया है मुझे,
आखिर तेरे प्यार का इंतज़ार , "राही" करे कबतक.
- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"


Wednesday, February 25, 2015

इश्क


इश्क

इश्क और आशिकी पर मुझे, कभी यकीं नहीं था,
किसी पर मर-मिटने पर मेरा, कभी यकीं नहीं था.

मैं तो था खुदगर्ज बड़ा, मैं खुदगर्जी में जीता था,
बे-वजह किसी को चाहने में, मेरा यकीं नहीं था.

समाज के दायरे में, सुकून से जी रहा था मैं,
रस्मों-रिवाजों को तोड़ने में, मेरा यकीं नहीं था.

नज़रें जब तुम से मिली, इश्क से मुलाकात हुई,
बिना हवस के इश्क पर मुझे, पहले यकीं नहीं था.

इश्क ही मजहब, इश्क इबादत, इश्क ही सब कुछ हो गया,
इश्क में ही रब दिखने लगा, जिस में मेरा यकीं नहीं था.

इश्क की चादर जिसने ओढ़ी, हर बला से महफूज रहे,
इश्क में होगी इतनी शक्ति, इस पर यकीं नहीं था.

इश्क खुदा की देन है “राही”, क्यूँ इससे महरूम रहें,
इश्क के असर को मैंने माना, जिस पर यकीं नहीं था.


- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

Wednesday, February 11, 2015

तुम्हारा साथ








तुम्हारा साथ - 1


तूने मेरा साथ जब से दिया है,
मेरा जीवन तूने  बदल दिया है.

जी रहा था चैन से,
ये तूने क्या कर दिया है,
तू मेरे जिंदगी में आई,
मैंने चैन गवां दिया है। 

आसां सी जिंदगी को,
मैंने मुश्किल बना दिया है,
तुमसे लड़ी हैं आँखे जब से,
मैंने नींद गवां दिया है। 

साँसों में बस गई हो तुम,
दिल तुझ को दे दिया है,
जिंदा रहूँगा तेरे बगैर,
ये हक मैंने खो दिया है.

प्यार मिला है जब से तेरा,
तूने मुझे दीवाना कर दिया है,
उदासी, बेचैनी, निराशा को,
तब से मैंने भुला दिया है.

आँचल में बाँध कर प्यार मेरा,
जीवन रौशन कर दिया है,
” राही” का घर था वीराना,
तूने  खुशियों से भर दिया है.
- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"



Friday, January 30, 2015

यादें

                       




                    

      यादें


जीवन कैसे पल-पल बीता, याद नहीं कुछ आज तक,
चंद खट्टी-मीठी यादों के साये में, जी रहा हूँ आज तक। 

बेफिक्री में जीवन बीता, जब तक माँ का साया था,
अब ममतामयी माँ की यादों में, जी रहा हूँ आज तक। 

मेरा जीवन बेहतर करने को, पापा फटकार लगाते थे,
मुझे बचाने में, फिक्रमंद माँ, याद मुझे है आज तक। 

बड़ी बहन का प्यार अनोखा, संबल मुझको देता था,
मेरे लिए सबसे लड़ती-भिड़ती, याद मुझे है आज तक। 

पढ़-लिख कर जब मिली नौकरी, वो भी क्षण अनोखा था,
पिता ने गर्व से मुझे गले लगाया, याद मुझे है आज तक। 

सेहरा बाँध जब घोड़ी पर चढ़ने को, जैसे मैं तैयार हुआ,
गले लगाकर माँ का रोना, याद मुझे है आज तक। 

हुई शादी, मिला चाँद का टुकड़ा, खुशियों की सौगात मिली,
चाँद का साथ मिला जीवन में, निभा रही है साथ आज तक। 

अब अशक्त सा पड़ा हुआ हूँ, जीवन से अब डरा हुआ हूँ,
रंजो-गम से क्यों भरा है जीवन, नहीं समझा हूँ आज तक। 
                                                  - © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

Thursday, January 1, 2015

सच

       






      सच


आँखों से मैंने जो भी देखा,
उसको सच माना मगर,
वो हमेशा सच ही होगा,
ऐसा भला होता है क्या?

जमीं और आसमां क्षितिज पर,
मिलते नज़र आते हैं मगर,
क्षितिज के पार नई दुनिया मिलेगी,
ऐसा भला होता है क्या?

रहते हैं वो इस फ़िराक में,
पड़ोसियों का घर कैसे जले, मगर,
घर जलेगा और वो बचेंगे,
ऐसा भला होता है क्या?

करनी ऐसी कि देखिए,
बोया है पेड़ बबूल का, मगर,
आशा करते हैं कि आम होगा,
ऐसा भला होता है क्या?

ज्ञान का अभाव है उनमें,
अँधेरे में तीर चलाते हैं मगर,
तीर हमेशा निशाने पर लगेगा,
ऐसा भला होता है क्या?

सुख-दुःख में कभी हम साथ थे,
अब वो दूर हो गए मगर,
नज़रें मिले और दिल में कसक न हो,
ऐसा भला होता है क्या?

वो जो चाहते हैं ,
उनको मिल जाता है मगर,
सब का नसीब उनके जैसा ही हो,
ऐसा भला होता है क्या?

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"