मेम्बर बने :-

Wednesday, February 22, 2017

समरथ के नहीं दोष गोसाई - भाग -1

समरथ के नहीं दोष गोसाई 


“समरथ के नहीं दोष गोसाई” गोस्वामी तुलसीदास जी ने किस मंशा से यह दोहा लिखा और इसका अर्थ क्या है इस विवाद में मैं नहीं पड़ने जा रहा और ना ही ये मेरा विषय-वस्तु है। परन्तु हाँ! मेरा पूरा यकीन है कि समर्थ लोगों में कोई दोष नहीं होता है, होगा भी कैसे? हम जैसे लोग उनके कीर्ति बखान करने के लिए जो बैठे हैं। इनका दोष हमें तब दिखाई या सुनाई पड़ता है जब इनके समकक्षी या इनसे बड़ा समर्थवान अपने हित के लिए इन पर दोषारोपण लगाता है और इनके बड़े-से-बड़े अपराध की सजा बहुत ही छोटी होती है क्योंकि तंत्र के हमाम में ये सभी नंगे होते हैं। 

आज के लोकतंत्र में तो हमसभी अपने-आप को किसी न किसी स्तर के समर्थवान समझते हैं, परन्तु जिन लोगों से तंत्र प्रभावित हो वैसे ही समर्थ लोगों में कोई दोष नहीं होता है।  भारत में तंत्र को प्रभावित करने वाले समर्थवानों की संख्या अनगिनत है और इनके द्वारा किए गए अपराधों की फ़ेहरिस्त भी बड़ी लम्बी है और इन अपराधों का हश्र क्या होता है ये आप सब सुधि पाठकजन को मुझे बताने की जरूरत नहीं है। 

मेरा मानना है कि आमलोगों की इज्जत तब ही तक सलामत है जब तक किसी समर्थवान की बुरी नज़र उनकी इज्जत पर ना पड़ी हो। 

इसी तथ्य को उजागर करती श्रीनरसिंह पुराण की एक कथा आपके साथ साँझा करने जा रहा हूँ।  
भाग -1

सब प्रकार के भोगों को भोगने के बाद देवराज इन्द्र को मन में वैराग्य का भाव उत्पन्न हुआ। वे सोचने लगे – “यह निश्चित है कि वैरागी ह्रदय वाले मानव की दृष्टि में स्वर्ग के  राज्य का भी कोई महत्व नहीं होता और सत्ता का सुख विषयों के भोग में निहित है तथा भोग के अंत में कुछ भी नहीं रह जाता। यही सोच कर ज्ञानी जन सदा ही मोक्ष की प्राप्ति  के विषय में ही विचार करते हैं। सामान्य जन सदा भोग के लिए ही तप करते है और भोग के अंत में तप भी नष्ट हो जाता है। परन्तु जो लोग किसी कारण से विषय-भोग से विमुख हो मोक्षाधिकारी हो गए हैं, उन मोक्षभागी पुरुषों को न तप की आवश्यकता होती है न योग की। ”

ऐसा सोच कर ह्रदय में एक मात्र मोक्ष की कामना लिए देवराज इन्द्र क्षुद्रघंटिकाओं की ध्वनि से युक्त विमान पर आरूढ़ हो भगवान् शंकर की आराधना के लिए कैलाश पर्वत पर चले आए। एक दिन देवराज इन्द्र बिना किसी उद्देश्य के कैलाश पर्वत पर भ्रमण करते हुए मानसरोवर पहुँचे।  मानसरोवर के तट पर उन्होंने यक्षराज कुबेर की पत्नी  चित्रसेना को पार्वती जी का अराधना करते हुए देखा, उसकी काया  अनंग (कामदेव) के रथ की फहराती ध्वजा सी जान पड़ती थी . उसके अंग प्रसिद्ध “जम्बूनद” नामक सुवर्ण जैसी प्रभा बिखेर रही थी . उसके कटीले नयन मनोहर थीं, जो कानों के पास तक पहुँच गई थी. महीन वस्त्रों के भीतर से उसके मनोहर अंग इस प्रकार झलक रहे थे, मानो निहारिका के भीतर से चन्द्रलेखा दिख रही हो। इन्द्र ने अपने हज़ार नेत्रों से उस देवी को मुग्ध होकर निहारते रहे। वे उस स्त्री को देख इतने काम आसक्त हो गए कि दूर अपने आश्रम जाने का ख्याल ही नहीं रहा और देवराज इन्द्र विषयाभिलाषी होकर वहीँ खड़े हो गए। वे सोचने लगे – “पहले सर्वांग-सौन्दर्य के साथ उत्तम कुल में जन्म पा जाना ही बड़ी बात है, और उस पर भी धन तो सर्वथा ही दुर्लभ है। इन सब के बाद धनाधिप होना तो पुण्य से ही संभव है. स्वर्गलोक पर मेरा आधिपत्य है, फिर भी मेरे भाग्य में भोग भोगना नहीं है, इसलिए मेरे चित्त में मुक्ति की इच्छा उत्पन्न हुई। मोक्ष-सुख तो इस राज्य-भोग द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, परन्तु क्या मोक्ष भी राज्य प्राप्ति का कारण हो सकता है? भला कोई अपने द्वार पर पके अन्न को छोड़ कर कोई जंगल में खेती करने क्यों जाएगा? जो सांसारिक दुःख से मारे-मारे फिरते हैं और कुछ भी करने की शक्ति नहीं रखते, वे अकर्मण्य, भाग्यहीन एवं मूढ़जन मोक्षमार्ग की इच्छा करते हैं। ”

बार-बार ऐसा विचार करके इन्द्र धनाधिप की पत्नी चित्रसेन के रूप पर मोहित हो गए। काम-वेदना से व्याकुल वे मानसिक धैर्य खो कर कामदेव का स्मरण करने लगे। इन्द्र के स्मरण करने पर अत्यंत कामनाओं से व्याप्त चित्तवृतिवाला कामदेव बहुत धीरे-धीरे डरता हुआ वहाँ आया, क्योंकि वहीँ पूर्वकाल में शंकर जी ने उसके शरीर को जला कर भस्म कर दिया था. जब किसी स्थान पर प्राण संकट में हो तो धीरतापूर्वक और निर्भय हो कर वहाँ कौन जा सकता है?

कामदेव ने आकर कहा – कौन आपका शत्रु बना हुआ है? शीघ्र आदेश दे विलम्ब ना करे, मैं अभी उसे आपत्ति में डालता हूँ।”

उस समय कामदेव के उस मनोभिराम वचन को सुन कर मन-ही-मन उस पर विचार कर के इन्द्र बहुत संतुष्ट हुए. अपने मनोरथ को सहसा सिद्ध होते जान वीरवर इन्द्र ने हँस कर कहा- “कामदेव! अनंग बन जाने पर भी तुम ने जब शंकर जी को भी आधे शरीर का बना दिया, तब संसार में दूसरा कौन तुम्हारे घात को सह सकता है? अनंग! जो गिरिजा पूजन में एकाग्रचित होने पर भी मेरे मन को आकर्षित कर रही है, उस विशाल नयनों वाली सुंदरी को तुम तुम एकमात्र मेरे अंग-संग की सरस भावना से युक्त कर दो।”
सुरराज इन्द्र के यों कहने पर उत्तम बुद्धि वाले कामदेव ने भी अपने पुष्पमय धनुष पर बाण रख कर मोहन मन्त्र का स्मरण किया। तब कामदेव द्वारा पुष्प-बाण से मोहित की हुई चन्द्रसेना काम के मद से विह्वल हो गई और पूजा छोड़ इन्द्र की ओर देख कर मुस्काने लगी. भला, कामदेव के धनुष की टंकार को कौन सह सकता है। इन्द्र उसको अपनी ओर आतुरता से देखने के कारण बोले – “चंचल नेत्रों वाली बाले! तुम कौन हो, जो पुरुषों के मन को इस प्रकार मोहे लेती हो? बताओ तो, तुम किस पुण्यात्मा की पत्नी हो?” इन्द्र के इस प्रकार पूछने पर उसके अंग काम-मद से विह्वल हो उठे। शरीर में रोमांच, स्वेद और कम्प होने लगे। वह कामबाण से व्याकुल हो गद्गद कंठ से धीरे-धीरे इस प्रकार बोली – “नाथ ! मैं धनाधिप कुबेर की पत्नी एक यक्ष-कन्या हूँ। पार्वती जी के चरणों की पूजा करने के लिए यहाँ आई थी। आप अपना कार्य बताइये; आप कौन हैं? जो साक्षात् कामदेव के समान रूप धारण किये यहाँ खड़े हैं?”

इन्द्र बोले –प्रिये! मैं स्वर्ग का राजा इन्द्र हूँ। तुम मेरे पास आओ और मुझे अपनाओ तथा चिरकाल तक मेरे अंग-संग रहने का शीघ्र ही अपनी सहमति दो, नहीं तो तुम्हारे बिना मेरा यह जीवन और स्वर्ग का विशाल राज्य भी व्यर्थ जाएगा। 

इन्द्र ने मधुर वाणी में जब इस प्रकार कहा, तब उसका सुन्दर शरीर कामवेदना से पीड़ित होने लगा और वह फहराती हुई पताकाओं से सुशोभित विमान पर आरूढ़ हो देवराज इन्द्र के कंठ से लग गई। तब स्वर्ग के राजा इन्द्र शीघ्र ही उसके साथ मन्दराचल की उन कंदराओं में चले गए, जहाँ का मार्ग देवता और असुर दोनों के लिए अभी तक अज्ञात था और जो रत्नों की प्रभा से प्रकाशित थी। आश्चर्य है कि देवताओं के राज्य के प्रति आदर न रखते हुए भी उदार पराकर्मी इन्द्र उस सुन्दर यक्ष-बाला के साथ वहाँ रमण करने लगे तथा काम के वशीभूत हो परम चतुर इन्द्र ने अपने हाथों से चित्रसेना के लिए शीघ्रतापूर्वक छोटी सी पुष्प शय्या तैयार की। कामोपभोग में चतुर देवराज इन्द्र चित्रसेना के समागम के स्वप्नमात्र से कृतार्थ का अनुभव करने लगे। स्नेहरस से अत्यंत मधुर प्रतीत होने वाला वह परस्त्री के आलिंगन और समागम का सुख उन्हें मोक्ष से भी बढ़ कर लगा। 


(कामदेव को अनंग भी कहा जाता है।
शची, इन्द्र की पत्नी हैं। )

क्रमशः  (शेष अगले भाग में )

गीता प्रेस के "श्रीनरसिंह पुराण" से साभार।



Monday, February 20, 2017

मित्र मंडली - 7



मित्रों ,

"मित्र मंडली" की सातवीं कड़ी का पोस्ट प्रस्तुत है। इस पोस्ट में मेरे ब्लॉग फॉलोवर/अनुसरणकर्ता के हिंदी पोस्ट के लिंक के साथ उस पोस्ट के प्रति मेरी भावाभिव्यक्ति सलंग्न है। पोस्ट का चयन साप्ताहिक आधार पर है।  इसमें  दिनांक 13.02.2017  से 19.02.2017  के हिंदी पोस्ट का संकलन है।

इसका उद्देश्य मेरे मित्रों की रचना को ज्यादा से ज्यादा पाठकों  तक पहुँचाना है। 

आप सभी पाठकगण से निवेदन है कि दिए गए लिंक के पोस्ट को पढ़ कर टिपण्णी के माध्यम से अपने विचार जरूर लिखें। यकीं करें ! आपके द्वारा दिया गया विचार लेखकों के लिए अनमोल होगा।  

प्रार्थी 

राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

                                  मित्र मंडली - 7 



1. जलसेना विद्रोह (मुम्बई) - १८-२३ फ़रवरी सन् १९४६




2. दर्पण





3. "जब तक मैंने समझा,जीवन क्या है?जीवन बीत गया" !- पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-समीक्षक)



4. मधुबाला की ८४ वीं जयंती





आशा है कि मेरा प्रयास आपको अच्छा लगेगा ।  आपका सुझाव आपेक्षित है। अगला अंक 27-02-2017  को प्रकाशित होगी। धन्यवाद ! अंत में ....

मेरी दो कविताएँ 


5. प्रेम-गीत



http://rakeshkirachanay.blogspot.in/2017/02/blog-post_14.html



6. कलम की आवाज़


http://rakeshkirachanay.blogspot.in/2017/02/blog-post_17.html

Friday, February 17, 2017

कलम की आवाज़










कलम की आवाज़ 

नहीं तुम बनना साहित्यकार,
नहीं तुम बनना रचनाकार,
रोजी-रोटी ये नहीं देगी 
ना कोई सपना होगा साकार,
नहीं तुम बनना साहित्यकार ......

पेशा कोई भी चल जाएगा,
तुम को सब कुछ मिल जाएगा,
सुख-समृद्धि तेरे घर में होगा 
होगा नौकर बंगला मोटर कार 
नहीं तुम बनना साहित्यकार ......

ब्लैक-मनी, रिश्वतखोरी का अलग से अलख जगाना,
भोग-विलास के सभी साधन तुमको घर में है लाना,
कोई भूख से मर जाए या कोई किसी की अस्मत लूटे  
तुम को इससे क्या लेना इसके लिए है साहित्यकार,
नहीं तुम बनना साहित्यकार ......

गर तुम फिर भी नहीं माने,
तो सुन लो फिर क्या होगा,
महफ़िल में वाह-वाही होगी
पर घर इससे नहीं चलेगा .

दुनियाँ की सारी समस्या पर 
कागज़ काला करते ही रहना 
भैंस के आगे बीन बजाकर
अपना सिर ही धुनते रहना 
फिर भी हौसला है तुम में 
तो ही बनना साहित्यकार.

समाज को दिखाते रहो तुम ही आईना
गरीब और मजलूम की आवाज़ उठाना 
तुम्हारी कलम ही है अब इनकी आस 
कहीं खो ना जाए इनकी मौन चीत्कार   
तुम जरूर बनना साहित्यकार......

समाजवाद का परचम लहरेगा,
ना कोई भूखा मरेगा, 
ना किसी की अस्मत ही लुटेगी,
जियेंगे फिर सभी शान से 
सबका सपना होगा साकार,
तुम जरूर बनना साहित्यकार......

तेरी कलम से इक दिन भैया 
इंक़लाब का सूरज भी निकलेगा,
बेईमानों और रिश्वतखोरों को 
उनके करतूतों की सज़ा मिलेगी.
तुम जरूर बनना साहित्यकार......

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

Tuesday, February 14, 2017

प्रेम-गीत









प्रेम-गीत 

जी ना सकूँगा तुम बिन मैं यारा,
गर तुने मुझको प्यार से पुकारा,
मैं तुमसे प्यार करूँगा,
ना इंकार करूँगा,
हो जाऊँगा मैं तुम्हारा ,
सुन ले तू ये मेरे यारा .

हम साथ चलें जैसे नदी और किनारा,
नहीं साथ छूटे कभी हमारा-तुम्हारा,
तुम बिन अब जी ना सकूंगा,
मैं तुमसे प्यार करूँगा,
हो जाऊँगा मैं तुम्हारा ,
सुन ले तू ये मेरे यारा .

जब तक है आसमां में चाँद और सितारा,
रौशन रहेगा तब तक प्यार हमारा,
मैं तुझे नाज़ से रखूंगा,
मैं तुमसे प्यार करूँगा,
हो जाऊँगा मैं तुम्हारा ,
सुन ले तू ये मेरे यारा .

मजे में चलेगी मेरे जीवन की धारा,
जबसे मिलेगा मुझे साथ तुम्हारा,
दिल में तुझे छुपा लूँगा,
मैं तुमसे प्यार करूँगा,
हो जाऊँगा मैं तुम्हारा ,
सुन ले तू ये मेरे यारा .

लो आ गई, तेरी बाहों में यारा,
नहीं छोड़ना कभी दामन हमारा,
मैं तुमसे प्यार करूँगी,
ना इंकार करूँगी,
हो जाऊँगी मैं तुम्हारी ,
सुन ले तू ये मेरे यारा .

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

Monday, February 13, 2017

मित्र मंडली - 6



मित्रों ,
इस पोस्ट में शामिल रचनाओं के  चुनाव का दो आधार हैं :- 
1.  रचनाकार मित्रों का मेरे ब्लॉग का अनुसरणकर्ता/फॉलोवर होना अनिवार्य है।
2. पोस्ट का कंटेंट अश्लील या किसी भी व्यक्ति की भावनाओं पर चोट न पहुंचाती हो। 

"मित्र मंडली" की छठी  कड़ी का पोस्ट प्रस्तुत है। इस पोस्ट में मेरे ब्लॉग फॉलोवर/अनुसरणकर्ता के हिंदी पोस्ट के लिंक के साथ उस पोस्ट के प्रति मेरी भावाभिव्यक्ति सलंग्न है। पोस्ट का चयन साप्ताहिक आधार पर है।  इसमें  दिनांक 06.02.2017  से 12.02.2017  के हिंदी पोस्ट का संकलन है।

इसका उद्देश्य मेरे मित्रों की रचना को ज्यादा से ज्यादा पाठकों  तक पहुँचाना है। 

आप सभी पाठकगण से निवेदन है कि दिए गए लिंक के पोस्ट को पढ़ कर टिपण्णी के माध्यम से अपने विचार जरूर लिखें। यकीं करें ! आपके द्वारा दिया गया विचार लेखकों के लिए अनमोल होगा।  

प्रार्थी 

राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

                                  मित्र मंडली - 6


1. "पहले आप - पहले आप "सुधरो ! - पीताम्बर दत्त शर्मा (स्वतन्त्र टिप्पणीकार)मो.न. 9414657511


"पहले आप - पहले आप "सुधरो ! - पीताम्बर दत्त शर्मा की पोस्ट विचारणीय है। जैसा की इन्होंने लिखा है कि सब कुछ संविधान के अनुसार हो रहा है तो ऐसे हालात में क्या किया जाए। भारत के सभी बुद्धिजीवी इस बात से आहत है कि भारत का संविधान कुछ कहता है और हमारी सरकारें और नेता लोग कुछ और कहते है।  मसलन जाति, लिंग, भाषा, धर्मऔर रंग के आधार पर भेद-भाव नहीं कर सकते परंतु वास्तविकता कुछ और है। मेरा तो मनना है की देश में पार्टी की ही प्रथा गलत है इससे परिवारवाद को बढ़ावा मिलता है या राजतंत्र की बू आती है। भारत को नेता नहीं अपितु समाजसेवक चाहिए जो हम किसी से भी उम्मीद नहीं कर सकते क्योंकि लाखों-करोड़ों खर्च कर कोई आपकी सेवा करने तो नहीं आयेगा। 



2. धीरे - धीरे ज़ख़्म सारे






3. भोपाल उत्सव मेले की रंगत में




4. योजनाओं का लाभ उठाया कैसे जाए ?इसपर भी जोर दो !- पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) मो.न.- ९४१४६५७५११






5. मानवीय प्रतिरक्षा शक्ति : सतीश सक्सेना



6. हमे भी सोचना होगा, तुम्हें भी सोचना होगा ---------

राजेश जी की कविता "हमे भी सोचना होगा, तुम्हें भी सोचना होगा ---------" समाज को सन्देश देती कविता है कि अगर हमें शांति और सदभाव  के साथ जीना है तो आज के दौर में जीने के तरीके के बारे में सभी को चिंतन करने की आवश्यकता है। 




7. ग़ज़ल सम्राट स्व॰ जगजीत सिंह साहब की ७६ वीं जयंती






8. आदमी सोचते रहने से आदमी नहीं हुआ जाता है ‘उलूक’





9. हम ब्लॉक माइंड देसी लोग : सतीश सक्सेना





10. Ye kahaan se aa gayee bahar hai.


11. प्राण साहब की ९७ वीं जयंती




आशा है कि मेरा प्रयास आपको अच्छा लगेगा ।  आपका सुझाव आपेक्षित है। अगला अंक 20-02-2017  को प्रकाशित होगी। धन्यवाद ! अंत में ....




12. पुस्तक समीक्षा-1







Thursday, February 9, 2017

पुस्तक समीक्षा-1

पुस्तक समीक्षा- “ज़िन्दा है मन्टो”



केदारनाथ ‘शब्द मसीह’ एवं के.बी.एस. प्रकाशन, दिल्ली की पुस्तक “ज़िन्दा है मन्टो” एक लघु-कथा संग्रह है। मन्टो का नाम ज़ेहन में आते ही एक बेबाक अफसानानिगार की छवि उभरती है और इस पुस्तक में लिखी सभी लघु-कथाओं को पढ़ते हुए शब्द मसीहा जी को पाठक, मन्टो के सांचे में ढलते हुए महसूस करते हैं। इसको कहने में मुझे कोई अतिश्योक्ति नहीं लगती कि शब्द मसीहा जी ने मन्टो की विचार-धारा को आगे बढ़ाने का काम इस पुस्तक के माध्यम से किया है। 


इस पुस्तक के शीर्षक की सार्थकता इसकी कथाओं को पढ़कर सहज ही महसूस की जा सकती हैं। तथाकथित बोल्ड विषय पर लिखना कहाँ आसान होता है परन्तु शब्द मसीहा जी ने फूहड़ता से परहेज करते हुए इस विषय पर अपनी लेखनी से एक अलग ही छाप छोड़ी जो कहीं न कहीं पात्रों के मनोभाव को पाठक अपने अंतर्मन से महसूस करता है। बात जब बोल्ड विषयों पर लिखने की हो तो फूहड़ता का आरोप लगता रहा है और इससे मन्टो भी बच नहीं पाए थे परन्तु शब्द मसीहा जी ने अपने पात्रों की पीड़ा को संतुलित शब्दों का ज़ामा सभी कथाओं में पहनाया है।

इस लघु-कथा संग्रह में कुल 104 कथाएं हैं जो बिना रुके आपके चेहरे पर भिन्न-भिन्न भाव-भंगिमा उकेरने में सक्षम है और सभी कथाओं को पढ़ने के बाद भी कथाओं के पात्र बार-बार आपको फिर से इस पुस्तक को पढ़ने के लिए मजबूर करते हैं।

16 शब्दों की कथा अगर आपके ज़ेहन में सदा घूमती रहे तो ये कमाल करने का माद्दा शब्द मसीहां जी की लेखनी में है। इनकी कथा “सच” को पढ़ कर इस कमाल को महसूस कर सकते हैं।


केदारनाथ जी की दो काव्य संग्रह पूर्व में प्रकाशित हो चुके है और ‘ज़िन्दा है मन्टो’ इनका पहला कहानी संग्रह है जिसको पाठकों का भरपूर प्यार मिल रहा है।
नई पीढ़ी को अपनी लेखनी से मन्टो को परिचय कराने के लिए शब्द मसीहा जी को साधुवाद है।
पुस्तक खरीदने के लिए निचे दिए गए लिंक को क्लिक करें।

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

Monday, February 6, 2017

मित्र मंडली - 5



मित्रों ,
इस पोस्ट में शामिल रचनाओं के  चुनाव का दो आधार हैं :- 
1.  रचनाकार मित्रों का मेरे ब्लॉग का अनुसरणकर्ता/फॉलोवर होना अनिवार्य है।
2. पोस्ट का कंटेंट अश्लील या किसी भी व्यक्ति की भावनाओं पर चोट न पहुंचाती हो। 

"मित्र मंडली" की पाँचवीं कड़ी का पोस्ट प्रस्तुत है। इस पोस्ट में मेरे ब्लॉग फॉलोवर/अनुसरणकर्ता के हिंदी पोस्ट के लिंक के साथ उस पोस्ट के प्रति मेरी भावाभिव्यक्ति सलंग्न है। पोस्ट का चयन साप्ताहिक आधार पर है।  इसमें  दिनांक 30.01.2017  से 05.02.2017  के हिंदी पोस्ट का संकलन है।

इसका उद्देश्य मेरे मित्रों की रचना को ज्यादा से ज्यादा पाठकों  तक पहुँचाना है। 

आप सभी पाठकगण से निवेदन है कि दिए गए लिंक के पोस्ट को पढ़ कर टिपण्णी के माध्यम से अपने विचार जरूर लिखें। यकीं करें ! आपके द्वारा दिया गया विचार लेखकों के लिए अनमोल होगा।  

प्रार्थी 

राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

                                  मित्र मंडली - 5


1. वफ़ा





2. दो मिनट का मौन सायरन का तीस जनवरी के ग्यारह बजे





3. ओस





त्त्वपूर्ण हो जाती है। 








9. मां करती हूँ तुम्हें नमन !!







आशा है कि मेरा प्रयास आपको अच्छा लगेगा ।  आपका सुझाव आपेक्षित है। अगला अंक 13-02-2017  को प्रकाशित होगी। धन्यवाद ! अंत में ....

12. श्रम एवं परिश्रम