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Wednesday, February 22, 2017

समरथ के नहीं दोष गोसाई - भाग -1

समरथ के नहीं दोष गोसाई 


“समरथ के नहीं दोष गोसाई” गोस्वामी तुलसीदास जी ने किस मंशा से यह दोहा लिखा और इसका अर्थ क्या है इस विवाद में मैं नहीं पड़ने जा रहा और ना ही ये मेरा विषय-वस्तु है। परन्तु हाँ! मेरा पूरा यकीन है कि समर्थ लोगों में कोई दोष नहीं होता है, होगा भी कैसे? हम जैसे लोग उनके कीर्ति बखान करने के लिए जो बैठे हैं। इनका दोष हमें तब दिखाई या सुनाई पड़ता है जब इनके समकक्षी या इनसे बड़ा समर्थवान अपने हित के लिए इन पर दोषारोपण लगाता है और इनके बड़े-से-बड़े अपराध की सजा बहुत ही छोटी होती है क्योंकि तंत्र के हमाम में ये सभी नंगे होते हैं। 

आज के लोकतंत्र में तो हमसभी अपने-आप को किसी न किसी स्तर के समर्थवान समझते हैं, परन्तु जिन लोगों से तंत्र प्रभावित हो वैसे ही समर्थ लोगों में कोई दोष नहीं होता है।  भारत में तंत्र को प्रभावित करने वाले समर्थवानों की संख्या अनगिनत है और इनके द्वारा किए गए अपराधों की फ़ेहरिस्त भी बड़ी लम्बी है और इन अपराधों का हश्र क्या होता है ये आप सब सुधि पाठकजन को मुझे बताने की जरूरत नहीं है। 

मेरा मानना है कि आमलोगों की इज्जत तब ही तक सलामत है जब तक किसी समर्थवान की बुरी नज़र उनकी इज्जत पर ना पड़ी हो। 

इसी तथ्य को उजागर करती श्रीनरसिंह पुराण की एक कथा आपके साथ साँझा करने जा रहा हूँ।  
भाग -1

सब प्रकार के भोगों को भोगने के बाद देवराज इन्द्र को मन में वैराग्य का भाव उत्पन्न हुआ। वे सोचने लगे – “यह निश्चित है कि वैरागी ह्रदय वाले मानव की दृष्टि में स्वर्ग के  राज्य का भी कोई महत्व नहीं होता और सत्ता का सुख विषयों के भोग में निहित है तथा भोग के अंत में कुछ भी नहीं रह जाता। यही सोच कर ज्ञानी जन सदा ही मोक्ष की प्राप्ति  के विषय में ही विचार करते हैं। सामान्य जन सदा भोग के लिए ही तप करते है और भोग के अंत में तप भी नष्ट हो जाता है। परन्तु जो लोग किसी कारण से विषय-भोग से विमुख हो मोक्षाधिकारी हो गए हैं, उन मोक्षभागी पुरुषों को न तप की आवश्यकता होती है न योग की। ”

ऐसा सोच कर ह्रदय में एक मात्र मोक्ष की कामना लिए देवराज इन्द्र क्षुद्रघंटिकाओं की ध्वनि से युक्त विमान पर आरूढ़ हो भगवान् शंकर की आराधना के लिए कैलाश पर्वत पर चले आए। एक दिन देवराज इन्द्र बिना किसी उद्देश्य के कैलाश पर्वत पर भ्रमण करते हुए मानसरोवर पहुँचे।  मानसरोवर के तट पर उन्होंने यक्षराज कुबेर की पत्नी  चित्रसेना को पार्वती जी का अराधना करते हुए देखा, उसकी काया  अनंग (कामदेव) के रथ की फहराती ध्वजा सी जान पड़ती थी . उसके अंग प्रसिद्ध “जम्बूनद” नामक सुवर्ण जैसी प्रभा बिखेर रही थी . उसके कटीले नयन मनोहर थीं, जो कानों के पास तक पहुँच गई थी. महीन वस्त्रों के भीतर से उसके मनोहर अंग इस प्रकार झलक रहे थे, मानो निहारिका के भीतर से चन्द्रलेखा दिख रही हो। इन्द्र ने अपने हज़ार नेत्रों से उस देवी को मुग्ध होकर निहारते रहे। वे उस स्त्री को देख इतने काम आसक्त हो गए कि दूर अपने आश्रम जाने का ख्याल ही नहीं रहा और देवराज इन्द्र विषयाभिलाषी होकर वहीँ खड़े हो गए। वे सोचने लगे – “पहले सर्वांग-सौन्दर्य के साथ उत्तम कुल में जन्म पा जाना ही बड़ी बात है, और उस पर भी धन तो सर्वथा ही दुर्लभ है। इन सब के बाद धनाधिप होना तो पुण्य से ही संभव है. स्वर्गलोक पर मेरा आधिपत्य है, फिर भी मेरे भाग्य में भोग भोगना नहीं है, इसलिए मेरे चित्त में मुक्ति की इच्छा उत्पन्न हुई। मोक्ष-सुख तो इस राज्य-भोग द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, परन्तु क्या मोक्ष भी राज्य प्राप्ति का कारण हो सकता है? भला कोई अपने द्वार पर पके अन्न को छोड़ कर कोई जंगल में खेती करने क्यों जाएगा? जो सांसारिक दुःख से मारे-मारे फिरते हैं और कुछ भी करने की शक्ति नहीं रखते, वे अकर्मण्य, भाग्यहीन एवं मूढ़जन मोक्षमार्ग की इच्छा करते हैं। ”

बार-बार ऐसा विचार करके इन्द्र धनाधिप की पत्नी चित्रसेन के रूप पर मोहित हो गए। काम-वेदना से व्याकुल वे मानसिक धैर्य खो कर कामदेव का स्मरण करने लगे। इन्द्र के स्मरण करने पर अत्यंत कामनाओं से व्याप्त चित्तवृतिवाला कामदेव बहुत धीरे-धीरे डरता हुआ वहाँ आया, क्योंकि वहीँ पूर्वकाल में शंकर जी ने उसके शरीर को जला कर भस्म कर दिया था. जब किसी स्थान पर प्राण संकट में हो तो धीरतापूर्वक और निर्भय हो कर वहाँ कौन जा सकता है?

कामदेव ने आकर कहा – कौन आपका शत्रु बना हुआ है? शीघ्र आदेश दे विलम्ब ना करे, मैं अभी उसे आपत्ति में डालता हूँ।”

उस समय कामदेव के उस मनोभिराम वचन को सुन कर मन-ही-मन उस पर विचार कर के इन्द्र बहुत संतुष्ट हुए. अपने मनोरथ को सहसा सिद्ध होते जान वीरवर इन्द्र ने हँस कर कहा- “कामदेव! अनंग बन जाने पर भी तुम ने जब शंकर जी को भी आधे शरीर का बना दिया, तब संसार में दूसरा कौन तुम्हारे घात को सह सकता है? अनंग! जो गिरिजा पूजन में एकाग्रचित होने पर भी मेरे मन को आकर्षित कर रही है, उस विशाल नयनों वाली सुंदरी को तुम तुम एकमात्र मेरे अंग-संग की सरस भावना से युक्त कर दो।”
सुरराज इन्द्र के यों कहने पर उत्तम बुद्धि वाले कामदेव ने भी अपने पुष्पमय धनुष पर बाण रख कर मोहन मन्त्र का स्मरण किया। तब कामदेव द्वारा पुष्प-बाण से मोहित की हुई चन्द्रसेना काम के मद से विह्वल हो गई और पूजा छोड़ इन्द्र की ओर देख कर मुस्काने लगी. भला, कामदेव के धनुष की टंकार को कौन सह सकता है। इन्द्र उसको अपनी ओर आतुरता से देखने के कारण बोले – “चंचल नेत्रों वाली बाले! तुम कौन हो, जो पुरुषों के मन को इस प्रकार मोहे लेती हो? बताओ तो, तुम किस पुण्यात्मा की पत्नी हो?” इन्द्र के इस प्रकार पूछने पर उसके अंग काम-मद से विह्वल हो उठे। शरीर में रोमांच, स्वेद और कम्प होने लगे। वह कामबाण से व्याकुल हो गद्गद कंठ से धीरे-धीरे इस प्रकार बोली – “नाथ ! मैं धनाधिप कुबेर की पत्नी एक यक्ष-कन्या हूँ। पार्वती जी के चरणों की पूजा करने के लिए यहाँ आई थी। आप अपना कार्य बताइये; आप कौन हैं? जो साक्षात् कामदेव के समान रूप धारण किये यहाँ खड़े हैं?”

इन्द्र बोले –प्रिये! मैं स्वर्ग का राजा इन्द्र हूँ। तुम मेरे पास आओ और मुझे अपनाओ तथा चिरकाल तक मेरे अंग-संग रहने का शीघ्र ही अपनी सहमति दो, नहीं तो तुम्हारे बिना मेरा यह जीवन और स्वर्ग का विशाल राज्य भी व्यर्थ जाएगा। 

इन्द्र ने मधुर वाणी में जब इस प्रकार कहा, तब उसका सुन्दर शरीर कामवेदना से पीड़ित होने लगा और वह फहराती हुई पताकाओं से सुशोभित विमान पर आरूढ़ हो देवराज इन्द्र के कंठ से लग गई। तब स्वर्ग के राजा इन्द्र शीघ्र ही उसके साथ मन्दराचल की उन कंदराओं में चले गए, जहाँ का मार्ग देवता और असुर दोनों के लिए अभी तक अज्ञात था और जो रत्नों की प्रभा से प्रकाशित थी। आश्चर्य है कि देवताओं के राज्य के प्रति आदर न रखते हुए भी उदार पराकर्मी इन्द्र उस सुन्दर यक्ष-बाला के साथ वहाँ रमण करने लगे तथा काम के वशीभूत हो परम चतुर इन्द्र ने अपने हाथों से चित्रसेना के लिए शीघ्रतापूर्वक छोटी सी पुष्प शय्या तैयार की। कामोपभोग में चतुर देवराज इन्द्र चित्रसेना के समागम के स्वप्नमात्र से कृतार्थ का अनुभव करने लगे। स्नेहरस से अत्यंत मधुर प्रतीत होने वाला वह परस्त्री के आलिंगन और समागम का सुख उन्हें मोक्ष से भी बढ़ कर लगा। 


(कामदेव को अनंग भी कहा जाता है।
शची, इन्द्र की पत्नी हैं। )

क्रमशः  (शेष अगले भाग में )

गीता प्रेस के "श्रीनरसिंह पुराण" से साभार।

भाग - 2 (अंतिम भाग ) पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक को क्लिक करें :-

http://rakeshkirachanay.blogspot.in/2017/02/2.html



Friday, February 17, 2017

कलम की आवाज़










कलम की आवाज़ 

ना तुम बनना साहित्यकार,
नहीं तुम बनना रचनाकार,
रोजी-रोटी ये ना देगी 
नहीं सपना होगा साकार,
ना तुम बनना साहित्यकार ......

पेशा कोई चल जाएगा,
तुम को सब कुछ मिल जाएगा,
सुख-समृद्धि तब घर में होगी 
होगा नौकर बंगला कार 
नहीं तुम बनना साहित्यकार ......

ब्लैक-मनी, रिश्वतखोरी की
अलग से  एक अलख जगाना,
भोग-विलास के सभी साधन
तुमको भी, घर में है लाना,
कोई भी भूखे मर जाए या
या कोई भी अस्मत लूटे  
तुम को इससे क्या लेना है
इसके लिए है रचनाकार,
नहीं तुम बनना साहित्यकार ......

अगर तुम फिर भी नहीं माने,
तो तब सुन लो फिर क्या होगा,
महफ़िल में तालियां बजेगी 
पर घर इससे नहीं चलेगा .

जगत की सारी समस्या पर 
कागज़ काला करते रहना 
भैसों के आगे बीन बजा
अपना सिर ही धुनते रहना 
फिर भी हौसला बचा हो तो 
फिर तुम बनना साहित्यकार.

दिखाते रहो आईना तुम
अब तुम्हीं समाज को जगाना
गरीब और मजलूम की भी
तुम को आवाज़ है उठाना 
तुम्हारी कलम ही है इनकी
मौन चीत्कार  की पहचान  
तुम ही बनना साहित्यकार......

समाजवाद का परचम कभी
जब आसमान पर लहरेगा,
ना किसी की अस्मत लुटेगी,
नहीं कोई भूखा मरेगा, 
सब सपने होंगे साकार,
तुम ही बनना साहित्यकार......

कभी तेरी कलम से इक दिन
इंसाफ़ का सूरज निकलेगा,
बेईमानों-रिश्वतखोरों 
को अवश्य ही सज़ा मिलेगा .
तुम ही बनना साहित्यकार......

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"


Tuesday, February 14, 2017

प्रेम-गीत









प्रेम-गीत 

जी ना सकूँगा तुम बिन मैं यारा,
गर तुने मुझको प्यार से पुकारा,
मैं तुमसे प्यार करूँगा,
ना इंकार करूँगा,
हो जाऊँगा मैं तुम्हारा ,
सुन ले तू ये मेरे यारा .

हम साथ चलें जैसे नदी और किनारा,
नहीं साथ छूटे कभी हमारा-तुम्हारा,
तुम बिन अब जी ना सकूंगा,
मैं तुमसे प्यार करूँगा,
हो जाऊँगा मैं तुम्हारा ,
सुन ले तू ये मेरे यारा .

जब तक है आसमां में चाँद और सितारा,
रौशन रहेगा तब तक प्यार हमारा,
मैं तुझे नाज़ से रखूंगा,
मैं तुमसे प्यार करूँगा,
हो जाऊँगा मैं तुम्हारा ,
सुन ले तू ये मेरे यारा .

मजे में चलेगी मेरे जीवन की धारा,
जबसे मिलेगा मुझे साथ तुम्हारा,
दिल में तुझे छुपा लूँगा,
मैं तुमसे प्यार करूँगा,
हो जाऊँगा मैं तुम्हारा ,
सुन ले तू ये मेरे यारा .

लो आ गई, तेरी बाहों में यारा,
नहीं छोड़ना कभी दामन हमारा,
मैं तुमसे प्यार करूँगी,
ना इंकार करूँगी,
हो जाऊँगी मैं तुम्हारी ,
सुन ले तू ये मेरे यारा .

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"



Thursday, February 9, 2017

पुस्तक समीक्षा-1

पुस्तक समीक्षा- “ज़िन्दा है मन्टो”



केदारनाथ ‘शब्द मसीह’ एवं के.बी.एस. प्रकाशन, दिल्ली की पुस्तक “ज़िन्दा है मन्टो” एक लघु-कथा संग्रह है। मन्टो का नाम ज़ेहन में आते ही एक बेबाक अफसानानिगार की छवि उभरती है और इस पुस्तक में लिखी सभी लघु-कथाओं को पढ़ते हुए शब्द मसीहा जी को पाठक, मन्टो के सांचे में ढलते हुए महसूस करते हैं। इसको कहने में मुझे कोई अतिश्योक्ति नहीं लगती कि शब्द मसीहा जी ने मन्टो की विचार-धारा को आगे बढ़ाने का काम इस पुस्तक के माध्यम से किया है। 


इस पुस्तक के शीर्षक की सार्थकता इसकी कथाओं को पढ़कर सहज ही महसूस की जा सकती हैं। तथाकथित बोल्ड विषय पर लिखना कहाँ आसान होता है परन्तु शब्द मसीहा जी ने फूहड़ता से परहेज करते हुए इस विषय पर अपनी लेखनी से एक अलग ही छाप छोड़ी जो कहीं न कहीं पात्रों के मनोभाव को पाठक अपने अंतर्मन से महसूस करता है। बात जब बोल्ड विषयों पर लिखने की हो तो फूहड़ता का आरोप लगता रहा है और इससे मन्टो भी बच नहीं पाए थे परन्तु शब्द मसीहा जी ने अपने पात्रों की पीड़ा को संतुलित शब्दों का ज़ामा सभी कथाओं में पहनाया है।

इस लघु-कथा संग्रह में कुल 104 कथाएं हैं जो बिना रुके आपके चेहरे पर भिन्न-भिन्न भाव-भंगिमा उकेरने में सक्षम है और सभी कथाओं को पढ़ने के बाद भी कथाओं के पात्र बार-बार आपको फिर से इस पुस्तक को पढ़ने के लिए मजबूर करते हैं।

16 शब्दों की कथा अगर आपके ज़ेहन में सदा घूमती रहे तो ये कमाल करने का माद्दा शब्द मसीहां जी की लेखनी में है। इनकी कथा “सच” को पढ़ कर इस कमाल को महसूस कर सकते हैं।


केदारनाथ जी की दो काव्य संग्रह पूर्व में प्रकाशित हो चुके है और ‘ज़िन्दा है मन्टो’ इनका पहला कहानी संग्रह है जिसको पाठकों का भरपूर प्यार मिल रहा है।
नई पीढ़ी को अपनी लेखनी से मन्टो को परिचय कराने के लिए शब्द मसीहा जी को साधुवाद है।
पुस्तक खरीदने के लिए निचे दिए गए लिंक को क्लिक करें।

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

Wednesday, February 1, 2017

श्रम एवं परिश्रम












 

श्रम एवं परिश्रम 

माँ ! मुझको तो आसमान में चाँद, गेंद जैसा दिखता है,
फिर क्यूँ ? रामू काका को यही चाँद, रोटी सा दिखता है।

माँ ! मुझको तो केवल, साफ़-सुथरा कपड़ा ही अच्छा लगता है,
फिर क्यूँ ? उनको  सिर्फ मैला व कुचैला कपड़ा अच्छा लगता है।

बेटा ! परिश्रम और श्रम करने में बहुत अंतर होता है,
साक्षर हो कर मेहनत करे जो वो सदा सुखी होता है।

बेटा ! श्रम करने वाले को केवल गेहूँ ही मिलता है,
परिश्रम करने वाले को गेहूँ और गुलाब मिलता है।

सरस्वती माँ की जो आराधना तन व मन से करता है,
विद्या पाकर वही  मानव सुखी जीवन-यापन  करता है।

माँ ! मैं तो रामू काका को लिखना पढ़ना सिखाऊंगा,
अज्ञानता का अँधेरा उनके जीवन से मिटाऊंगा।

श्रम किए बगैर किसी का  जीवन को जीना ही मुश्किल है,
किन्तु परिश्रम करने वालों का ही भविष्य भी उज्ज्वल है।



नोट-श्रम का तात्पर्य शारीरिक श्रम से होता है
        परिश्रम का तात्पर्य जिसमे शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार का श्रम से होता है

        गेहूँ हम खाते हैं, गुलाब सूँघते हैं। एक से शरीर की पुष्टि होती है, दूसरे से मानस तृप्‍त होता है।- "रामवृक्ष बेनीपुरी "

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"