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Wednesday, December 3, 2014

बेईमान

               
  
               













                 बेईमान

भ्रष्टाचार से लड़ने चले वो , खुद ही भ्रष्ट हो गए,
पहले वे भी आम जन थे, अब वो शासक हो गए। 

उनके रग-रग में बसी है, बला की हैवानियत
भीड़ के आगे जब भी आए, वो सफेदपोश हो गए। 

विश्वास करके अपनी अस्मत, जिसने उनको सौप दी,
उन सभी के  सम्मान अब सरेआम, तार-तार हो गए। 

खैरात में जो मिली थी, ग़रीबों में बांटने के वास्ते,
उसी खैरात को हड़प कर, वो मालामाल हो गए। 

जाति-धर्म के नाम पर, जो बाँटते है आवाम को,
ग़रीबों पर शासन करे और अमीरों के मित्र हो गए। 

दोनों की तक़रीर सुन कर, हिन्दू-मुस्लिम लड़ मरे,
दोनों गले अब मिल रहें हैं, वे रिश्तेदार हो गए। 

सबकी ज़मीर मर गई, सब कर रहे बकवास है,
जिसको जब मौका मिला, वो बेईमान हो गए। 

क्यों ढूँढते हो “राही”, देशभक्तों को इस दौर में,
मातृभूमि पर मर मिटने वाले सभी, स्वर्गवासी हो गए। 
- © राकेश कुमार श्रीवास्तव  "राही "

Wednesday, November 19, 2014

लिव-इन-रिलेशनशिप



लिव-इन-रिलेशनशिप

एक ही छत के नीचे रहना, सीख लिया था हमने,
अपनी ही शर्तों पर जीना, सीख लिया था हमने।

अपने सपनों को सच करने की, हठ हमने थी ठानी,
तभी इस महानगर की क्रूर संस्कृति को, अपनाया था हमने।

पर क्या इतना आसां होता है, भावनाओं को बस में करना,
धीरे-धीरे सभी शर्तों को, मिलकर तोड़ा था हमने।

मेरे बिन तुम जी नहीं सकती, जब तुमने कहा था मुझसे,
लड़-झगड़ कर अलग हुए, सभी रिश्तों को  तोडा  था  हमने।

तुम्हारे बाद कई आई, जीवन-साथी बनने को,
प्यार-समर्पण तुम जैसा, किसी में नहीं देखा मैंने।

अब तुम साथ नहीं हो मेरे, ये जीवन सूना लगता है,
तुमको ठुकराने की, बड़ी भूल किया था मैंने।

मैं तुम्हारा अपराधी हूँ, माफ़ करो इस “राही” को,
नारी मन की व्यथा क्या होती है, अब जाना है हमने।


- © राकेश कुमार श्रीवास्तव  "राही "

Thursday, October 30, 2014

दूरियाँ

              

    

          








    

               दूरियाँ

फासले हमने जो बनाएआओ इसे दूर करें

दूरियाँ कम होइसके लिएकोई जतन तो करें। 


दो क़दम तुम जो बढ़ो दौड़ करहम गले से लगें

फासले हमने जो बनाएआओ इसे दूर करें।


तेरे स्वाभिमान कोचोटपहुँचाया था कभी

कभी मिलो तोइस बात काइकरार करें।


झूठे अहंकार में आकरतुझे सताया था कभी

पुरानी भूलों काएहसास अबबेचैन करे


सभी गुनाहों का हिसाब न दे पाउँगा मैं

मेरा ज़मीर ही, मुझको हर घड़ी शर्मसार करे.


तुम मुझे किसी दिन माफ करोगी, ऐसा लगता तो नहीं

मेरा दिल फिर भी, उस दिन का इंतज़ार करे। 


आज मिल गई हो, बहुत फासले हैं मगर

मैं गुनाहगार हूँ तेरा, तुम मुझे अब माफ करो। 



जब तुम ने कर लिया क़ुबूल, अपने गुनाहों को

फिर हम दोनों क्यों, वक्त यूँ बरबाद करें। 


पुराने ज़ख्मों को न कुरेदो "राही"

आओ नए सिरे से, ज़िंदगी की शुरुआत करें।


© राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

Saturday, October 4, 2014

गुरु वंदना

               










                          गुरु वंदना



उनकी नज़रें इनायत की, जरूरत है मुझे

बिगड़ा हुआ हूँ, सुधरने की, जरुरत है मुझे।


उनकी सोहबत का असर, कुछ हुआ इस कदर

नेक राह पर चलूँ ये, ख्याल आया है मुझे।


देने को बहुत कुछ था, दिया भी बहुत कुछ

झोली ही अपनी तंग थी, अब समझ आया है मुझे।


नूर था उनके चेहरे पर, की नज़र हटती थी नहीं

बंदगी का ख्याल कभी, आया नहीं मुझे।


प्यार इतना दिया मुझको, जिसके लायक न था मैं

मैं अधम था फिर भी गले से, लगाया था मुझे।


जीवन के हरेक मोड़ पर, उनका सहारा मिल गया

कठिन से कठिन हाल से, उबारा है मुझे।


उनके रहमों करम को, कौन जानता नहीं

उनके रहमों करम से, सबकुछ मिला है मुझे।


आज वो नहीं हैं ये, मैं मानता ही नहीं

आज भी वो ही रास्ता, दिखाते हैं मुझे।


अगर वो न होते तो, मुझे जानता ही कौन

उनके ही बदौलत, आप सब जानते है मुझे।


© राकेश कुमार श्रीवास्तव



Thursday, September 11, 2014

आख़िरी उम्मीद

   
चित्र इन्टरनेट से साभार 
           

आख़िरी उम्मीद 


आज तन्हाइयों में फिर, रात मेरी गुजरेगी। 

तुम मिलोगी कभी, इस आस में रात गुजरेगी।

 तुम ने किया था कभी वादा कि हम मिलेंगे कभी,
उसी वादे पे यकीं करके, ये चाँद-रात गुजरेगी।

 तेरे बग़ैर जीने का कभी सोचा ही नहीं,
तेरी यादों के सहारे,सितारों से सजी ये रात गुजरेगी।

 अब ख़बर ये मिली, ज़ीनत बनोगी किसी और की तुम,
कभी सोचा है कि मेरे दिल पे क्या-क्या गुजरेगी। 

जब बन गई हो नूर किसी के जीवन की,

अब तो ज़िन्दगी  मेरी  स्याह रातों में यूँ ही गुजरेगी।

आख़िरी उम्मीद है मुझे, मेरे चाँद का दीदार हो जाए,
जब अर्थी मेरी, तेरी गलियों से हो कर गुजरेगी। 


© राकेश कुमार श्रीवास्तव