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Wednesday, November 4, 2015

बे-फ़िक्रे

बे-फ़िक्रे


बे-फ़िक्र हुआ “जाना”,
जब से तुम को जाना,
सजदे में रहता हूँ,
तुम को ही रब माना। 

मद-मस्त सा रहता हूँ,
तेरे ख्यालों में जीता हूँ,
तन्हाइयों में अक्सर तुझको,
अपने अन्दर ही पाता हूँ। 

न कुछ खोना है,   पाना  है,
तेरी राज़ी-ब-रज़ा में जीना है,
जब फ़िक्र करे तू मेरी,
तो बे-फ़िक्र हो, मुझे जीना है। 

न भुला हूँ, न भटका हूँ,
जब तेरे दिल में ही बसता हूँ,
तो क्यूँ फ़िक्र करूँ मैं अपनी,
बे-फ़िक्र हो कर जीता हूँ। 

जब आसमां-जमीं है तेरी,
और जब प्यार में है तू मेरी,
तो बे-फ़िक्र क्यों न हो जाऊं,
जब सारी कायनात है तेरी। 
                     - © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"
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