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Monday, July 24, 2017

मित्र मंडली - 27




मित्रों ,
"मित्र मंडली" का सताईसवां अंक का पोस्ट प्रस्तुत है। इस पोस्ट में मेरे ब्लॉग के फॉलोवर्स/अनुसरणकर्ताओं के हिंदी पोस्ट की लिंक के साथ उस पोस्ट के प्रति मेरी भावाभिव्यक्ति सलंग्न है। पोस्टों का चयन साप्ताहिक आधार पर किया गया है।  इसमें  दिनांक 17.07.2017  से 23.07.2017  तक के हिंदी पोस्टों का संकलन है।

पुराने मित्र-मंडली पोस्टों को मैंने मित्र-मंडली पेज पर सहेज दिया है और अब से प्रकाशित मित्र-मंडली का पोस्ट 7 दिन के बाद केवल मित्र-मंडली पेज पर ही दिखेगा, जिसका लिंक नीचे दिया जा रहा है  :-
HTTPS://RAKESHKIRACHANAY.BLOGSPOT.IN/P/BLOG-PAGE_25.HTML
मित्र-मंडली के प्रकाशन का उद्देश्य मेरे मित्रों की रचना को ज्यादा से ज्यादा पाठकों  तक पहुँचाना है। 

आप सभी पाठकगण से निवेदन है कि दिए गए लिंक के पोस्ट को पढ़ कर, टिप्पणी  के माध्यम से अपने विचार जरूर लिखें। विश्वास करें ! आपके द्वारा दिए गए विचार लेखकों के लिए अनमोल होगा।  

प्रार्थी 

राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

मित्र मंडली - 27 

इस सप्ताह के पाँच रचनाकार 




हर दौर गुजरता रहा

मीना शर्मा जी 

हमराज की बेवफाई को बेबाक शब्दों से सजाई गई सुंदर ग़ज़ल। आप भी आनंद लें।

अपना सच कह देना अच्छा है ताकि सनद रहे

सदियों से चले आ रहे आम-जन की विवशता को तोड़ने की आग्रह करती रचना। आम जान को जब भी मौका लगे कह दें-लिख दें ताकि सनद रहे ।

कितना खुश है आज परिंदा ...........

ख़त

सुन्दर खत, कुछ हो जाने के बाद के जज़्बात को सुंदर शब्द-शिल्प से सजाई गई रचना। आप भी आनंद लें। 

छांव बेच आया है-क़तआत




आशा है कि मेरा प्रयास आपको अच्छा लगेगा ।  आपका सुझाव अपेक्षित है। अगला अंक 31-07-2017  को प्रकाशित होगा। धन्यवाद ! अंत में ....

मेरी एक लघु-कथा  :-


जीवन की साँझ










Friday, July 21, 2017

जीवन की साँझ

जीवन की साँझ




रामदीन का पुश्तैनी पेशा मिट्टी के बर्तन एवं खिलौने बनाना था और उसके द्वारा बनाए गए सामान, उसके गाँव के पास के हाट में हाथों-हाथ बिक जाते थे। घर-गृहस्थी बड़े आराम से चल रही थी। रमेश उसका एकलौता बेटा था जो पढ़ने में बहुत ही  ज़हीन था। 

रमेश के मास्टर साहब, एक दिन रामदीन से बोले – “रामदीन ! देखना, रमेश एक दिन इस गाँव का नाम रौशन करेगा जैसे कमल ने किया।

रामदीन ने भी रमेश की पढ़ाई के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी और एक दिन रमेश इंजीनियरिंग की पढ़ाई समाप्त कर शहर की एक फैक्ट्री में नौकरी करने लगा। जब रमेश की नौकरी लगी तो वह अपने पिता जी को अपने साथ, शहर ले जाने के लिए घर आया और अपने पिता जी से बोला – “बाबू जी, आप मेरे साथ शहर चलें, वहाँ मुझे बंगला मिला है। आपने मेरे लिए बहुत मेहनत की है, अब आराम करने की बारी आपकी है।”

रामदीन बोला – “ बेटा, हमलोग मजदूर आदमी है, बिना मेहनत किए हम कहीं नहीं रह सकते।

रमेश जिद्द करके बोला – “बाबू जी, आप चलिए, वहाँ आपके मित्र, कमल के पिता जी भी तो रहते ही हैं।”

बेटे के जिद्द के आगे रामदीन को झुकना पड़ा और अपनी पत्नी एवं बेटे के साथ शहर में आ गया। अभी दो दिन ही बीते थे कि रामदीन ने अपने बेटे से कहा – “ बेटा ! बिना मेहनत किए मैं रह नहीं सकता, बैठे-बैठे मेरा सारा बदन टूट रहा है।”

रमेश ने कहा - “बाबू जी ! दिन भर आप अकेले रहते है इसलिए आपका यहाँ मन नहीं लग रहा। ऐसा करते है, कल रविवार की छुट्टी है। मैं आपको अपने प्रिय मित्र कमल के पिता जी, सुरजचंद जी से मिलवाने ले चलूँगा।” 

रमेश अपने पिता जी को को ले कर कमल के यहाँ पहुँचा। रामदीन ने एक लॉन के बीच बंगले को देखकर अपने बेटे से पूछा – “सुरजचंद यहीं रहता है?”

रमेश ने कहा - “हाँ बाबू जी ! कमल जी ही मेरे बॉस हैं।”

न चाहते हुए भी रामदीन को सुरजचंद की किस्मत पर रश्क हो आया। बंगले में प्रवेश करते ही कमल ने नमस्ते काका कह कर रामदीन का स्वागत किया, तो आशीर्वाद देकर चहकते हुए कमल से कहा – “ बेटा ! अब जल्दी से सुरजचंद को बुलाओ, लगभग दस साल के बाद उससे मिलूँगा।”

कमल ने कहा – “पिता जी को घुटनों में दर्द रहता है इसलिए उनको चलने-फिरने में तकलीफ़ होती है।”

कमल ने आवाज़ लगाई- “रामू काका!”

रामदीन की ही उम्र एक आदमी आया और कमल के सामने खड़ा हो कर कहा – “जी साहेब !”

कमल ने कहा - “देखो ! चाचा जी को पिता जी के कमरे में ले जाओ।” 
रामदीन, रामू के पीछे-पीछे हो लिए। एक कमरे की ओर इशारा कर रामू वहाँ से चला गया। रामदीन ने जब कमरे में प्रवेश किया तो एक जीर्ण-शीर्ण शरीर वाला व्यक्ति बिस्तर पर लेटा हुआ था। पास जाने पर मुश्किल से सुरजचंद को पहचाना तभी सुरजचंद बोल पड़े – “अरे ! रामदीन भाई, यहाँ कैसे?”
(सुरजचंद का चेहरा खिल उठा।) 

“ लोहे को तपा कर अपने मन-मुताबिक ढालने वाले सुरजचंद, ये क्या हाल बना लिया है?”- रोते हुए रामदीन ने कहा। 

“क्या बताऊँ ? जब मैं यहाँ आया तो कमल ने जैसे मुझे इस महल में कैद ही कर दिया। यहाँ किसी चीज़ की कमी नहीं है, परन्तु, स्वेच्छा से कोई काम नहीं कर सकता था। शुरू में तो बदन दर्द करता था फिर घुटनों में दर्द, अब तो चलना-फिरना भी मुहाल हो गया है।” ये कहते हुए सुरजचंद के आँखों से आँसू निकल पड़े। 

भारी मन से रामदीन अपने बेटे के साथ लौटे। अगली सुबह रामदीन ने अपने बेटे से कहा कि मैं सुरजचंद जैसी ज़िन्दगी नहीं जी सकता। मुझे यहाँ अपना काम करने दो या मुझे गाँव छोड़ दो। 

“कैसी बात करते हैं बाबू जी! यहाँ पर कुम्हार का काम करेंगे तो लोग क्या कहेँगे।”- रमेश ने कहा।  

बाप-बेटे में अभी बहस चल ही रही थी तभी घर में प्रवेश करते हुए कमल ने कहा - “लो काका! आपका चश्मा मेरे यहाँ छूट गया था, वही देने आया हूँ, परन्तु यहाँ किस विषय पर, आप दोनों में बहस छिड़ी हुई है?

रमेश ने नाराजगी दिखाते हुए कहा - “ देखिए ना ! बाबू जी अपनी जिद्द पर अड़े हैं कि या तो मुझे यहाँ कुम्हार का काम करने दो या फिर गाँव भेज दो।  

यह सुनकर कमल गंभीर स्वर में बोला - “काका सही कह रहे हैं, मैंने अपने बाबू जी को अपाहिज बना दिया और मैं नहीं चाहता कि काका का भी यही हाल हो। रमेश ! हमें समझना होगा कि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता, जिस काम को करने में हमें ख़ुशी मिले, उसी काम को करना चाहिए।

परन्तु लोग क्या कहेंगे ?” - रमेश ने झुँझलाते हुए कहा। 

इस समस्या का भी हल है मेरे पास। काश ! मेरी ये सोच पाँच साल पहले होती तो आज मेरे बाबू जी का ये हाल नहीं होता। ” - कमल ने कहा। 

रामदीन और रमेश आशाभरी नज़रों से कमल को देख रहे थे। 

कमल ने कहा - “ आजकल बच्चों की गर्मियों की छुट्टियाँ चल रही हैं, क्यों ना हम एक पॉटरी एवं क्ले टॉय का वर्कशॉप लगाए, जिसमें काका बच्चों को मिट्टी के बर्तन एवं खिलौने बनाना सिखाएंगे।” 

यह सुनकर, रामदीन और रमेश का चेहरा खिल उठा। रमेश ने चहकते हुए कहा - “यह सुझाव बहुत ही अच्छा है।” (यह कहते हुए, रमेश ने  भावुक होकर कमल को गले से लगा लिया।)

रमेश के  दस-पंद्रह दिन की  कड़ी मेहनत ने रंग दिखाया और पॉटरी एवं क्ले टॉय का वर्कशॉप खुल गया, जिसका उदघाटन करने सूरजचंद जी आए थे। 

वर्कशॉप में पॉटरी एवं क्ले टॉय को सीखने आए बच्चों को देख कर रामदीन एवं सूरजचंद की आँखों में ख़ुशी के आंसू आ गए। सूरजचंद ने रामदीन को गले लगाते हुए कहा - “रामदीन ! जीवन की इस ढलती साँझ में सूरज तो डूब रहा है, परन्तु, आज से तुम्हारे जीवन में पूर्णिमा का चाँद निकला है और साथ में तारे रुपी बच्चे तुम्हारे जीने की उम्मीद को जगमगाते रहेंगे। 

“सही कहा है, सूरजचंद भाई !” - रामदीन ने ख़ुशी के आंसू पोछते हुए कहा। 

©  राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"






Friday, July 14, 2017

फोटोग्राफी : पक्षी 18 (Photography : Bird 18 )

Photography: (dated 15 05 2017 07: 10 AM )

Place : Kapurthala, Punjab, India

Eurasian collared dove

The Eurasian collared dove, most often simply called the collared dove, is a species of dove native to warm temperate and subtropical Asia.

Scientific name:  Streptopelia decaocto
Photographer :   Rakesh kumar srivastava

ढोर फाख्ता, कबूतर की एक प्रजाति है जो गर्म शीतोष्ण और उपोष्णकटिबंधीय एशियामें पाया जाता है।  


वैज्ञानिक नाम: कोलाबा लिविया
फोटोग्राफर: राकेश कुमार श्रीवास्तव

अन्य भाषा में नाम :-
Bengali: ইউরেশীয় কণ্ঠীঘুঘু; Gujarati: ધોળ હોલો; Hindi: ढोर फाख्ता; Malayalam: പൊട്ടൻ ചെങ്ങാലി; Marathi: पठाणी होला, कंठी होला, रान होला, पिठोळ होला; Nepali: कण्ठे ढुकुर; Punjabi: ਗਾਨੀ ਵਾਲੀ ਘੁੱਗੀ












©  राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"