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Wednesday, September 14, 2016

वाक्यांश- खुशहाली

चित्र http://www.hotelsinmahabaleshwar.net.in/ से साभार 

वाक्यांश- खुशहाली 

मेरे मित्र श्यामचरण जी  ने आधी से अधिक उम्र किराये के एक ही मकान में गुजार दी। दो कमरों के उस मकान में अपने बच्चों के साथ उनके यहाँ आने वाले मेहमानों के लिए भी जगह मिल जाती थी। आर्थिक परेशानियों के बावजूद उनके मकान में आने वाले मेहमानों का स्वागत स्वादिष्ट व्यंजनों से होता, यही कारण था कि मेहमान भी स्वाद लोलुपता को त्याग नहीं कर पाते और यात्रा कहीं का भी हो बीच में विश्राम स्थल श्यामचरण जी के घर के लिए बना ही लेते थे।  हँसी-ठहाको से उनका मकान सदा गुंजायमान रहता था। अपनी पत्नी की ज़िद के कारण सेवानिवृति उपरांत मिले पैसों से एक मकान बनाकर रहने लगे। अपनी इकलौती बेटी की शादी वे पहले ही कर चुके थे और नौकरी लगते ही बेटों की भी शादी कर दिए और जल्द ही उनके दोनों बेटे अपनी पत्नीयों को ले कर अपने-अपने शहर चले गए। श्यामचरण जी का मकान शहर से दूर होने के कारण मेहमानों का आना-जाना बंद हो गया और बच्चों के नहीं रहने के कारण पाँच कमरों का मकान में सन्नाटा पसरा रहता। इस नई कॉलोनी में बुजुर्गों की संख्या ना  के बराबर थी और नई पीढ़ी को बुजुर्गों से बात करने के लिए ना समय था ना ही जरुरत। एक दिन मैं श्यामचरण जी से मिलने उनके घर चला गया तो उनकी पत्नी ने कहा- "श्रीवास्तव भाई साहब क्या बताऊँ यहाँ किसी से बात न करने के कारण मुँह दुखने लगता है जबड़ों में जकड़न सी आ गई है।"


 इस वाक़िया के बीते अभी दो महीने भी नहीं हुए थे कि पता चला श्यामचरण जी की पत्नी परलोक सिधार गई। श्यामचरण जी अपने बड़े बेटे के पास गुडगौंव चले गए और यहाँ खाली पड़े मकान में दरारें पड़ने लगी थी। 

किसी कार्यवश मुझे गुडगौंव जाने का मौका मिला तो शाम के वक्त उनके बेटे के घर पहुँचा।  घर क्या था महल था, दरवाजे पर दरबान को मैंने अपना परिचय दिया तो उसने इण्टरकॉम से बात कर मुझे अंदर जाने दिया। लॉन पार करते ही बरामदे में दिवाकर खड़ा मिला।  उसने नमस्ते चाचा जी कह कर गर्म जोशी से स्वागत किया। हमलोग गेस्ट रूम में बैठ कर एक दूसरे का हालचाल पूछ रहे थे तभी मैंने श्यामचरण से मिलने की इच्छा जताई।  उसने कहा कि मैं पता करता हूँ। 

मैंने पूछा - पता करता हूँ  का क्या मतलब है दिवाकर!

दिवाकर ने कहा - "ऐसा है चाचा जी मैं नीचे ऑफिस में काम करता हूँ और मोनिका क्लब गई हुई है और बच्चे स्कूल से सीधा ट्यूशन चले जाते है और वे रात को घर पहुँचते हैं। ऐसे में पिता जी घर में है या लॉन के किसी पेड़ के नीचे बैठे है पता करके बताता हूँ।"

उसने घंटी बजाई और वहाँ एक सुंदर स्त्री उपस्थित हुई। उसने रौबदार आवाज़ में आदेश दिया- "देखो  ! पिता जी कहाँ हैं पता करो और उनसे कहो की उनसे कोई मिलने आया है।"

 वो चली गई।  मैं स्तब्ध था और उस सुंदर स्त्री को जाते देख मैं उलझन में था तभी दिवाकर ने कहा - "ये मेरी परिचारिका है।" 

थोड़ी देर में परिचारिका हांफती हुई उपस्थित हुई और बोली पापा जी बंगले के पीछे पेड़ के नीचे बैठे है और कह रहें है कि जिसे भी मिलना हो वो यहाँ पर आये। दिवाकर का चेहरा थोड़ा उतर सा गया और झेपते हुए बोला चाचा जी मैं जाकर बुलाता हूँ। 

मैंने कहा - "रहने दो मैं श्याम से वहीं मिल लेता हूँ।"

 उसने परिचारिका को इशारे में मुझे श्यामचरण के पास ले जाने को कह कर सामने ऑफिस रूम में चला गया। मैं भी परिचारिका के पीछे-पीछे चल पड़ा। पहले स्टडी रूम, डाइनिंग रूम, किचेन रूम, स्विमिंग पूल और बिलियर्ड रूम के बाद लॉन दिखा। कुछ कदम चलने पर एक पेड़ के नीचे कुर्सी पर श्याम चुपचाप प्रकृति को निहार रहा था। मैंने जैसे ही आवाज दी वह पलट कर देखा और खिल पड़ा। लगभग दौड़ता हुआ आ कर गले लगा और रोते हुए बोला - "श्रीवास्तव! मुद्दतों बाद किसी ने मुझे प्यार से पुकारा है और मुझे किसी की प्राइवेसी में दखल देने की इज़ाज़त नहीं है, इस लिए मैं अक्सर यहीं बैठ जाता हूँ इन बेजुबां पेड़-पौधों और चिड़ियों से बात करने।"

 मेरी आँखें भर आई और मैं खो गया उन ठहाकों भरी महफ़िल के शोर में जो अकसर श्याम के घर की खिड़की से सुनाई देती थी जब भी मैं गुजरता था उसके घर के गली से।


वाक्यांश - "शब्द–समूह के लिए एक शब्द"


- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

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