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Wednesday, March 25, 2015

कशिश

कशिश 

न जाने वो कशिश कैसे कम हो गई,
जिंदगी मेरी जैसे ठहर सी गई। 

मैं भी हूँ वही, तुम भी हो वही,
बस उम्र ही हाथों से फिसल सी गई। 

न शिकवा मैंने किया, न शिकायत तुमने किया,
बस हम दोनों के बीच गुफ्तगू बंद हो गई। 

जीवन के जंजाल में तुम इस कदर खो गए,
छोटी-छोटी खुशियाँ जैसे बिसर सी गई। 

मैंने माना कि सब करते हो मेरी खातिर ही तुम,
पर सहमति ही मेरी अनदेखी रह गई। 

मेरे होठों पर हँसी, तेरे चहरे पर खुशी,
बस यही माँगा था मगर किस्मत दगा दे गई। 

एक-दूसरे की जरूरतों को पूरा करते हैं हम,
पर मोहब्बत ही एक-दूसरे के लिए कम हो गई। 

ऐशो-आराम की सभी चीजें बेकार हैं,
एक-दूसरे के लिए ही चाहत जब कम हो गई। 

मुद्दतों के बाद “राही” तुमने, प्यार से देखा मुझे,
अब मिला है सुकून मगर साँसें थम सी गई। 

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"


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 9. Rakesh ki Rachanay

In this country, it is often seen that for the happiness of our parents and respect in society we often take steps which may not give us the joy that we deserve. People sacrifice their lives for their ‘name’ in the society and keep on leading an unhappy life. To marry the ‘perfect’ groom who is approved by the society, we sometimes leave behind the perfect person who loves us unconditionally. This poem ‘Kasak’ is about that lover who has lost his love to another and now has to watch his love suffer while he himself has to stand outside observing everything because without the permission of his love he is not able to do anything and his hands are tied.
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