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Thursday, September 11, 2014

आख़िरी उम्मीद

   
चित्र इन्टरनेट से साभार 
           

आख़िरी उम्मीद 


आज तन्हाइयों में फिर, रात मेरी गुजरेगी। 

तुम मिलोगी कभी, इस आस में रात गुजरेगी।

 तुम ने किया था कभी वादा कि हम मिलेंगे कभी,
उसी वादे पे यकीं करके, ये चाँद-रात गुजरेगी।

 तेरे बग़ैर जीने का कभी सोचा ही नहीं,
तेरी यादों के सहारे,सितारों से सजी ये रात गुजरेगी।

 अब ख़बर ये मिली, ज़ीनत बनोगी किसी और की तुम,
कभी सोचा है कि मेरे दिल पे क्या-क्या गुजरेगी। 

जब बन गई हो नूर किसी के जीवन की,

अब तो ज़िन्दगी  मेरी  स्याह रातों में यूँ ही गुजरेगी।

आख़िरी उम्मीद है मुझे, मेरे चाँद का दीदार हो जाए,
जब अर्थी मेरी, तेरी गलियों से हो कर गुजरेगी। 


© राकेश कुमार श्रीवास्तव



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