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Friday, June 14, 2013

उत्तरी एवं पूर्वी सिक्किम की यात्रा (पार्ट-3)

उत्तरी एवं पूर्वी सिक्किम की यात्रा (पार्ट-3)



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गतांक से आगे.......


नाथुला पास  - एक अंतर्राष्ट्रीय सीमा   

                                               ट्रेवल एजेंट के निर्देशानुसार  हम लोगों को सुबह 6:30 बजे, नाथुला पास के लिए निकलना था। उसकी गाड़ी ठीक समय पर आ गई लेकिन थकान होने के कारण हम लोगों ने 15 मिनट विलंब से अर्थात् सुबह 6:45  पर यात्रा प्रारंभ की। 

सभी नए उमंग एवं उत्साह के साथ यात्रा कर रहे थे। अपने आप को, मैं थोड़ा ज्यादा ही रोमांचित महसूस कर रहा था।  क्योंकि, भारत से लगी अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं से मुझे खास लगाव है और किस्मत से मेरा जीवन इन्हीं सीमाओं के आस-पास बीता हैं मेरा बचपन भारत-नेपाल सीमा के पास बीता, जीविकोपार्जन हेतु  पंजाब आना हुआ तो यहाँ भारत-पाकिस्तान सीमा से रु-ब-रु हुआ। कपूरथला भारत-पाकिस्तान के दो अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं के मध्य स्थित है। एक तरफ वाघा बोर्डर एवं दूसरी तरफ हुसैनीवाला बार्डर है। इन अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं कि चर्चा फिर कभी। 


               अब जब हमलोग भारत-चीन सीमा की ओर बढ़ रहे थे, तो जोश और उत्साह का बढ़ना स्वाभाविक था। देशभक्ति की भावना स्वतः  बलवती होती जा रही थी। बच्चे खासे उत्साहित थे, वे अपने भूगोल के किताबों में पढ़े "नाथुला पास" की जानकारी को साक्षात् आँखों के सामने देखने को उतावले हो रहे थे। नाथुला पास कभी सिल्क-रूट का अभिन्न अंग हुआ करता था। क्योंकि, चीन के सिल्क कपड़ों के साथ-साथ दोनों देशों के बीच आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक रिश्तों को बनाए रखने का एक मात्र रास्ता था। इस रास्ते को 1962 में बंद कर दिया गया था और  दुबारा 6 जुलाई 2006 को खोला गया। संयोगवश!  यह दिन वर्तमान दलाई लामा श्री ल्हामो थोंदुप का जन्मदिन भी है। 

गंगटोक से नाथुला की दूरी 56 की.मी. है एवं समुन्द्र तल से 14200 फीट की उचाई पर स्थित है हमलोग अभी लगभग 5 कि.मी. ही चले  थे कि ड्राईवर ने गाड़ी रोक दी।
 यहाँ पर नाथुला के लिए यात्रा परमिट की जाँच होती है एवं प्रवेश शुल्क भी लगता है। ड्राईवर ने इन सब कामों को निपटाने में 15 मिनट का समय लिया तब तक हम लोग सुबह के प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ वहाँ के वास्तुशिल्प को देख कर काफी प्रभावित हुए। सिक्किम के पहाड़ों एवं घाटियों में बने भव्य इमारतें किसी को भी सम्मोहित करने में सक्षम हैं।

 सुबह का समय, प्राकृतिक नजारों के साथ सुन्दर वास्तुशिल्प मन को अद्-भुत शांति प्रदान कर रहे थे। यहाँ से आगे बढ़ने पर , पहाड़ पर हरे-भरे पेड़ एवं घाटी में बसे छुट-पुट भवनों  एवं उसके ऊपर से उमड़ते-घुमड़ते बादलों का समूह स्वप्न लोक का आभास दे रहे थे।

 इन नजारों के साथ-साथ खराब  सर्पीले मार्ग के एक तरफ पहाड़ एवं दूसरी तरफ खाई, भय और रोमांच का एक साथ अनुभव करा रहे  थे। थोड़ी दूर बढ़ने पर पर्वतों ने अपना रूप बदलना शुरू कर दिया 
©photo by R K SRIVASTAVA

सफ़ेद लिबासों पर भूरे रंग के कलात्मक छीट(print) में लिपटे पहाड़ मनमोहक लग रहे थे इन्हीं नज़ारों को देखते हुए सफ़र मजे में कट रहा था तभी ड्राईवर ने गाड़ी रोक दी और कहा कि आप लोग चाय-नाश्ता कर लें फिर आगे बढेंगें। मोमोज का स्वाद सबकी  जुबान पर अभी भी सर चढ़ कर बोल रहा था अतः दुकान पर पहुँचते ही सभी ने मोमोज के साथ गरमा-गर्म चाय की चुस्की ली। यहीं पर गमबूट भाड़े पर लेकर नाथुला पास के लिए चल पड़े। 

थोड़ी दूर पर छांगू लेक मिला। इसका नजारा अविस्मरणीय था। झील की ऊपरी सतह आईना का काम कर रही थी, ऐसा लग रहा था मानो झील अपने दामन में पहाड़ों को समेट लेना चाहती हो।


 इसके आगे एक और झील थी जिसकी ऊपरी सतह जमी हुई थी। थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर कुपुप लेक जो हाथी के आकार के होने के कारण इसका नाम एलिफैंट लेक भी है।

इसी के पास ही विश्व का सबसे ऊँचे स्थान पर गोल्फ ग्राउंड है, जिसका नाम याक गोल्फ ग्राउंड है। और अंत में, हम सब को तिरंगा लहराते हुए नजर आया।
 जिसको देख कर मन में जोश एवं देशभक्ति की भावना उमड़ पड़ी। चारों तरफ श्वेत हिम का साम्राज्य था। 
बर्फीली हवा चल रही थी। इन विकट परिस्थितियों में भी हमारे बहादुर सैनिक चौबीसों घंटे सीमा की सुरक्षा में लगे हुए थे। सिक्किम का यह इलाका 'नो मेंस लैंड' के नाम से जाना जाता है। जाड़ों के दिनों में यहाँ का तापमान -25 डिग्री सेल्सिअस हो जाता है।

 सैनिकों की कर्तव्यनिष्ठा एवं पर्यटकों के साथ सहृदयतापूर्वक व्यवहार को देख कर मैं उनके सामने नत-मस्तक था। मैं उन सैनिकों को तहे-दिल से धन्यवाद दिया जिनकी वजह से हमारी सरहदें एवं हम सुरक्षित हैं। दोनों देशों की सरहदों बीच मात्र दो कँटीले तारों का एक घेरा है। जून-जुलाई में यहाँ का मार्ग व्यापार के लिए खुलता है।

 इसके लिए यहाँ पर सीमा-शुल्क विभाग का एक भवन भी है। सीमा पर दोनों देश के अपने-अपने सम्मेलन हॉल हैं।
                                               बच्चों ने अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं का जायजा ले लिया तथा वहाँ के भारतीय सैनिकों के साथ हाथ मिलाते हुए अपने फोटो खिंचवा लिये, तब उन्हें चारों तरफ श्वेत हिम की चादरें बिछी दिखीं। उसके बाद उन्होंने बर्फ पर खूब उधम मचाई और तब तक मचाई जब तक की उनकी साँसे  फूलने न लगी।

 फिर हम लोगों ने सैनिकों द्वारा चलाये जा रहे कॉफी हाउस में कॉफी पी फिर हम लोग बाबा हरभजन मंदिर गए।
 यह एक वीर सैनिक की याद में बनाया गया है श्रद्धा और आस्था के कारण सैलानियों में इसके प्रति विशेष आकर्षण है। यहाँ कुछ समय बिताने के बाद हम लोग छांगू लेक आए। वहाँ सभी ने याक पर बैठ कर तस्वीरें खिचवाई। छांगू लेक पहुँचते ही बादलों ने झील एवं पहाड़ों को अपने आगोश में ले लिया। थोड़ी देर बाद प्रकृति का नजारा ऐसे बदला जैसे किसी ने प्राकृतिक नजारों पर पड़े परदे को हटा दिया हो। वापस छांगु  टैक्सी स्टैंड पर आकर, किराये का सामान वापिस कर, खाना खाया और गंगटोक के लिए चल पड़े। गंगटोक लगभग दोपहर तीन बजे पहुँचकर  देवराली टैक्सी स्टैंड से न्यू जलपाईगुड़ी के लिए रवाना हुए।
                                                           हम लोग करीब रात को आठ बजे न्यू जलपाईगुड़ी पहुंचे। हम लोगों की ट्रेन दस बजे रात में थी। अतः रात्रि भोजन कर हम लोग ट्रेन में सवार हो गए। लगातार पहाड़ी रास्तों पर टैक्सी द्वारा सफ़र करने के कारण सभी की कमर टूट रही थी, इस लिए सब अपनी-अपनी सीटों पर लेट गए। थकान होने के कारण और रेल की लंबी-चौड़ी सीट पाकर कब नींद के आगोश में चले गए पता ही नहीं चला। रेल के आरामदायक सफ़र के कारण सुबह दस बजे उठे तो सभी के चेहरे से थकान मिट चुकी थी। उसके बाद, इस यात्रा की जो चर्चा छिड़ी वो अभी तक जारी है। यकीन मानिए, यह यात्रा हम लोगों के लिए अविस्मरणीय  बन कर दिल में बस  गई
क्रमशः ...........................
- © राकेश कुमार श्रीवास्तव 


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