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Thursday, October 25, 2012

सफ़र 



  (पृष्ठभूमि :- नायक अपनी नायिका को छोड़ कर किसी विशेष कार्य हेतु रेलगाड़ी  से  लम्बी  यात्रा  पर  निकलता   है   और  विरह  कि  आग  मै  जल  रहा   है |  इस जलन को  कम करने लिए नायक , नायिका  को याद   करते   हुए   अपने  मनोभाव को व्यक्त करता है | )


सफ़र 

तुझे छोड़ कर मै, सफ़र कर रहा हूँ,
मगर मेरे साथ, सदा चल रही है|
सुबह मै चला था, तू मेरे संग थी,
तेरी यादों में खोया , दिन भर  चला हूँ|
शाम हो रही है, सूरज ढल चुका  है,
मगर तू मेरे संग, चली जा रही है|
तेरे ख्यालों में , जिए जा रहा हूँ,
कभी हँस रहा हूँ, कभी मुस्कुरांऊँ   |
मुझे देख कर, लोग कर रहे इशारे,
मैं हो गया दीवाना, ये समझा रहे हैं|
चाँद आ गया, मगर तू वहीं है,
चाँद में भी बस, तुम्ही नजर आ रही हो|
तुझे भूलने की, जतन   मैंने की है,
सम्पूर्ण क्षितिज पर, तू छा गई है|
आँखें मूंदकर मैं, अब सोने लगा हूँ,
तेरी याद और भी, गहरा गई है|
अब मैं सो रहा हूँ, नींद आ गई है,
सपनों  में, तुम्हारी  याद आ रही है|
सुबह हो गई है, मैं जग गया हूँ,
चादर के सलवटों पे, तुझे ढूंढ़ रहा हूँ| 
अभी तू कहीं है, मगर मेरे दिल में,
मेरे साथ तू भी, सफ़र कर रही है|
तेरी याद न जाएगी, तू कहीं भी चली जा,
तेरी याद के बगैर, मैं जी न सकूँगा|
तुझे भूलाने का अब, जतन  न करूँगा,
तुझे छोड़ कर, अब सफ़र न करूँगा|
-राकेश कुमार श्रीवास्तव
(२९/०४/२००७)
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